महामारी की वजह से आई मंदी - ऑटो इंडस्ट्री नया सोचने के लिए बाध्य
महामारी की वजह से आई मंदी साफ तौर पर ऑटो इंडस्ट्री को कुछ नया सोचने के लिए बाध्य कर रही है. हालांकि लीज यानी पट्टे पर कार देना कोई नई बात नहीं है, लेकिन अब दुनियाभर में लीज पर कार देने की योजनाएं लोकप्रिय हो सकती हैं. 2019 में भारत में किराए या लीज पर कार देने का बाजार सिर्फ 4% रहा, लेकिन अब इसके विकसित होने की उम्मीद है. खासकर कोविड-19 के बाद कई लोग टैक्सी, कार-पूलिंग या आने-जाने के लिए शेयरिंग सर्विस से परहेज कर रहे हैं. इसे देखते हुए क्षमता व्यापक है.
कार खरीदें या नहीं खरीदें' देश के लिए बड़ी उलझन है. पिछले साल निर्मला सीतारमण ने ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री में आई गिरावट का ठीकरा मिलेनियल्स (Millennials) यानि नई पीढ़ी के सिर फोड़ा था. इसकी वजह उबर और ओला जैसे 'राइड शेयरिंग ऐप' को पसंद किया जाना बताया था. उनकी चिंता इस तथ्य से पनपी है कि विकास को गति देने वाले संचालकों में ऑटो सेक्टर बेहद अहम है. जीडीपी में इस सेक्टर की भागीदारी 7% है. यह सेक्टर लाखों लोगों को रोजगार देता है और मजबूती से दुनिया की उत्पाद श्रृंखला से जुड़ा है. बात जब 40 करोड़ से ज्यादा मिलेनियल्स यानि मौजूदा पीढ़ी की हो तो खरीदने या नहीं खरीदने का फैसला कंपनियों के लिए अहम हो जाता है. इसीलिए दुनियाभर के ‘पॉलिसीमेकर्स’ हमारी पसंद को समझने के लिए जमीन-आसमान एक कर रहे हैं
इस बारे में बहुत चर्चा हुई है कि नई पीढ़ी कार क्यों नहीं खरीद रही. शायद उनकी बोझ नहीं उठाने वाली जीवनशैली, ज्यादा शुल्क वाली खरीदारी की इजाजत नहीं देती. एक बड़ा घर और एक बड़ी गाड़ी, बेशक सफलता का पारंपरिक मापदंड रहा हो, लेकिन अब ये बात पुरानी हो गई है. अब ऐप के जरिये कैब ऑर्डर करना ज्यादा आसान है. ऐसे में निर्णय लेने के तनाव से जूझना और उसके बाद मेंटनेंस की मुसीबतों से दो-चार होने की जरूरत क्या है.
हालांकि हर बार यह गूढ़ या सिमटी जीवनशैली की पसंद का मामला नहीं हो
सकता. उनके निर्णय के केंद्र में सांसारिक-आर्थिक वजहें जैसे मंदी, नौकरी
की असुरक्षा या हिचकोले खाती अर्थव्यवस्था में अस्थिरता भी हो सकती हैं. हम
पूरी तरह से नहीं समझ सकते कि ऐसा क्यों है, लेकिन इसके इर्द-गिर्द रास्ते
की तलाश जारी रखना अहम है. ऐसे में ऑटो इंडस्ट्री की सलामती के लिए उसे
अनुकूल बनना होगा, क्योंकि बहुत कुछ बदल रहा है और तेजी से बदल रहा है.
ऑटो सेक्टर पिछले कई वर्षों से गर्दिश में है. भारत में बैटरी की गिरती
कीमत और सरकारी समर्थन की वजह से इलेक्ट्रिक कार का मार्केट जोर पकड़ रहा
है. उबर और ओला जैसी कंपनियों की तरफ से दी जा रही सर्विस ने हमारे
घुमने-फिरने की आदत बदल दी है. खासकर शहरी क्षेत्रों में ये बदलाव साफ नजर
आता है.
दुनिया का ट्रेंड बार-बार संकट खड़े कर रहा है, लेकिन इस आपदा में कारोबार को नई शक्ल देने और मजबूत होने का अवसर भी है. कार बनाने वालों को सामाजिक आर्थिक और तकनीकी ट्रेंड के एकीकृत असर को समझना और अपनाना होगा. यही उनका भविष्य निर्धारित करेगा. आमतौर पर हमें एक से दूसरी जगह तक ले जाने वाली कार बदल रही है. अब कार एक ऐसे विशाल मशीन में तब्दील हो रही है जो हमें यात्रा के दौरान पढ़ने, काम करने और मल्टीमीडिया से जुड़ने का मौका देगी. साथ ही घर के संपर्क में भी रखेगी.
हो सकता है कि ऐसी स्कीम चीजों को बड़े पैमाने पर नहीं बदले, लेकिन उभरते हुए बाजार के लिहाज से यह पेशकश खास है. 'फास्ट कार' की स्कीम आगे बढ़े, इसके लिए सिर्फ प्रोडक्ट, फीचर्स और तकनीक को ही अपग्रेड करना अनिवार्य नहीं है, बल्कि सर्विस का भी स्तरीय होना जरूरी है.