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किसान दिवस विशेष : लाखो की नौकरी और विदेश छोड़ अपनायी खेती, कभी सॉफ्टवेयर इंजीनियर व बड़े अधिकारी अब किसान

आज भारत सरकार खेती से जुड़े व्यक्तियों व किसानो के लिए बहुत साड़ी योजनाए ला चुकी है, खेती परिश्रम भी मांगती और फायदा दोगुना देती है साथ ही साथ प्राकृतिक से जुड़े रहने का अच्छा मौका, आधुनिकीकरण में कभी अपनी महत्व खोता हुआ खेत और बंजर होते जमीन आज बड़ी संख्या में युवा वर्ग भी अपनी मिटटी की तरफ रुझान कर रहा है यह उनलोगो के लिए एक मार्गदर्शन है की जीन्हे लगता यही उनके रोज़गार की कमी है यह जीविका चलने में असमर्थ है उन्हें यह सीखें चाहिए की अवसर से इंसान पैसे नहीं कमाता बल्कि इंसान चाहे तो अवसर कमा सकता है व अपनी तरह के भाई बहनो के लिए अवसर प्रदान करवा सकता है 

महासमुंद के बागबाहरा क्षेत्र के चारभांठा गाँव निवासी मनोज नायडू। मनोज नायडू ने मेटलर्जिकल (मेटल से संबंधित इंजीनियरिंग) इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है। इंजीनियरिंग करने के बाद मनोज की नौकरी सऊदी अरब के कतर में एक सरकारी तेल कंपनी में लगी, जहां उनको सलाना 45 लाख रुपये की आय की नौकरी मिली।

एक अच्छा प्रस्ताव मिलने के कारण मनोज कतर चले गये और अपने चार साल नौकरी को दिये। मगर 45 लाख रुपये सलाना की आय होने के बावजूद मनोज को नौकरी रास नहीं आ रही थी, सिर्फ इसलिए क्योंकि अब उन्हें किसान बनना था। आखिरकार मनोज ने नौकरी छोड़कर अपने गाँव वापस लौट आए।
मनोज ने अपने गाँव में 50 एकत्र कृषि फॉर्म में खेती करने का मन बनाया।

टपक सिंचाई पद्धति से हाईब्रिड बरबटी, करेला, ग्वारफली, बैंगन, टमाटर, गोभी, मिर्च आदि फसलों की खेती करना शुरू कर दी और आज अधिक उत्पादन के साथ मनोज खेती से लाखों रुपये की आमदनी कमा रहे हैँ। कुछ साल पहले जिस जमीन पर घास भी नहीं उगती थी, उसमें मनोज की फसलें लहलहा रही हैं

हरियाणा फतेहाबाद जिले में बीघड़ गांव निवासी एग्रीकल्चर ग्रेजुएट और एमबीए डिग्रीधारी अतुल वालिया को विदेश की नौकरी रास न आई। वतन की मिट्टी के दिल से अपनी माटी की ऐसी सदाएं उठीं कि वो घाना देश की नौकरी छोड़ भारत लौट आए। महज लौट ही नहीं बल्कि इंडिया में ही आधुनिक तकनीक से खेती करने की ठानी। फिर उन्‍होंने ऐसा स्‍टार्ट-अप कायम किया कि अब वो दूसरे किसानों के लिए मिसाल बन गए हैं।

वह कहते हैं कि इंडिया में बदलाव देखकर ही मन बदला। अपने देश में ही कृषि क्षेत्र में अपार संभावनाएं भांपकर ख्‍याल आया कि सब्जी उत्पादन को व्यापक रूप दिया जा सकता है। इस क्रम में हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के ही मित्र डॉ. मनोज भाटिया से बाजार सहित सारा इनपुट जुटाया। चाह को राह मिली और बीघड़ गांव में 10 एकड़ जमीन से स्टार्ट अप लिया।

किसान अपनी कड़ी मेहनत से अगर फसल पैदा भी कर लेता है तो कहीं फसल खराब मौसम के कारण या फसल रोग या अन्य कारणों से उत्पादन अच्छा नहीं दे पाती है। ऐसे ही अन्य कई कारण हैं, जिस वजह से वे खेती-किसानी को अब मुनाफे का सौदा नहीं मानते हैं और कृषि छोड़कर शहरों में नौकरी करने के लिए पलायन करते हैं।


खेती किसानी के मामले में इजरायल को दुनिया का सबसे हाईटेक देश माना जाता है. वहां रेगिस्तान में ओस से सिंचाई होती है, दीवारों पर गेहूं, धान उगाए जाते हैं,

दिल्ली से करीब 300 किलोमीटर दूर राजस्थान के जयपुर जिले में एक गांव है गुड़ा कुमावतान. ये किसान खेमाराम चौधरी (45 वर्ष) का गांव है. खेमाराम ने तकनीकी और अपने ज्ञान का ऐसा तालमेल भिड़ाया कि वो लाखों किसानों के लिए उदाहरण बन गए हैं. आज उनका मुनाफा लाखों रुपए में है. खेमाराम चौधरी ने इजरायल के तर्ज पर चार साल पहले संरक्षित खेती (पॉली हाउस) करने की शुरुआत की थी. आज इनके देखादेखी आसपास लगभग 200 पॉली हाउस बन गए हैं, लोग अब इस क्षेत्र को मिनी इजरायल के नाम से जानते हैं. खेमाराम अपनी खेती से सलाना एक करोड़ का टर्नओवर ले रहे हैं.

लगभग डेढ़ करोड़ रुपये का सालाना टर्नओवर लेने वाले कैलाश चौधरी के मुताबिक, किसानों को सफलता के लिए पांच तरीकों को अपनाना चाहिए- जैविक खेती, बागवानी, औषधीय खेती, प्राइमरी वैल्यू एडिशन और पशुपालन। “लेकिन सबसे बड़ी समस्या यही है कि हमारे किसान मेहनत नहीं करना चाहते। उनका कृषि में कोई टाइम मैनेजमेंट नहीं है।


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