जलवायु परिवर्तन के खतरों पर पहला देशव्यापी अध्ययन...जलवायु परिवर्तन अजन्मे बच्चे पर ऐसे डाल रहा है असर
वैसे तो पूरी दुनिया में जलवायु परिवर्तन से अत्यधिक संवेदनशील हालात वाले
देशों में भारत का भी नाम आता है. 2019 के एक वैश्विक जोखिम सूचकांक में
191 देशों में से भारत की 29वीं रैंक है. भारत के विभिन्न हिस्सों में हर
साल बाढ़, अतिवृष्टि, सूखा, भूस्खलन, भूकंप और चक्रवात जैसी मौसमी आपदाओं
की मार पड़ती है. इनमें से कई मानव निर्मित आपदाएं भी मानी जाती हैं.
गांवों से लेकर शहरों तक बेतहाशा निर्माण, जंगल क्षेत्र में परियोजनाएं और
पेड़ों की कटान और पानी की अत्यधिक खपत वाली खेती ने हालात को और पेचीदा और
गंभीर बना दिया है. इन स्थितियों में सरकार की यह रिपोर्ट एक स्वागतयोग्य
पहल है क्योंकि इससे न सिर्फ संवेदनशील भौगोलिक इलाकों का सहज और सुगम
चिन्हीकरण हो पाएगा बल्कि वहां आवश्यकतानुसार न्यूनीकरण प्रबंध के लिए नीति
क्रियान्वयन के कार्यक्रम जोर पकड़ेंगे.
विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग की विशेष आकलन रिपोर्ट के मुताबिक बिहार,
झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडीसा और पश्चिम बंगाल जैसे पूर्वी राज्यों के अलावा
मिजोरम, असम और अरुणाचल प्रदेश जैसे पूर्वोत्तर राज्य भी जलवायु परिवर्तन
का सबसे अधिक संभावित नुकसान झेलेंगे. ये सभी इलाके अतिसंवेदनशील और
अरक्षित पाए गए हैं. असम, बिहार और झारखंड के 60 प्रतिशत जिले इस श्रेणी
में आते हैं. जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान के खिलाफ असम का करीमगंज
जिला सबसे ज्यादा अरक्षित पाया गया है. अपनी तरह का यह पहला अध्ययन है
जिसमें राज्यवार और जिलावार क्लाइमेट चेंज का वल्नरेबिलिटी इंडेक्स बनाया
गया है और उस आधार पर राज्यों और जिलों को रैकिंग दी गई है. महाराष्ट्र
राज्य पर सबसे कम खतरा है लेकिन उसका जिला नंदरबार, देश के सबसे अधिक
अरक्षित 51 जिलों में से है. बिहार के कटिहार और किशनगंज जिले, ओडीशा का
नौपदा जिला, झारखंड का साहिबगंज, पश्चिम बंगाल का पुरुलिया और कूच बिहार और
जम्मू कश्मीर का रामबन जिला इस श्रेणी में रखे गए हैं.
विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग, डीएसटी के इस प्रोजेक्ट में आईआईटी मंडी और
आईआईटी गुवाहाटी के शोधकर्ताओं के अलावा बंगलुरू स्थित भारतीय विज्ञान
संस्थान, आईआईएस भी शामिल था. अध्ययन के मुताबिक राज्यवार और जिलावार आकलन
से राज्यों को भविष्य में आपदा न्यूनीकरण के कदम उठाने या उससे संबधित नीति
बनाने में मदद मिलेगी. डीएसटी के मुताबिक सभी राज्यों का विभिन्न कारकों
और कारणों और उत्प्रेरकों के लिहाज से अध्ययन किया गया. ये कसौटियां आबादी
के अलावा, लोगों की आय के स्रोत, स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति, परिवहन
नेटवर्क जैसे बिंदुओं पर आधारित थीं. गरीबी रेखा से नीचे बसर करने वाली
प्रतिशत आबादी, संक्रमित पानी से होने वाली और डेंगू और मलेरिया जैसी
बीमारियां, वर्षा-पोषित खेती, कम सघन परिवहन नेटवर्क, छोटे और मझौले भू
स्वामित्व वाले अधिकांश लोग, और आय के लिए प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भरता
के आधार पर राज्यों को उच्च, औसत और निम्न के वल्नरेबिलिटी इंडेक्स की तीन
श्रेणियों में बांटा गया था.
महाराष्ट्र के अलावा गोवा, नागालैंड, केरल, तमिलनाडु, हरियाणा, उत्तराखंड, पंजाब, सिक्किम, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश को निम्न वल्नरेबिलिटी इंडेक्स में रखा गया था. रिपोर्ट के मुताबिक इस श्रेणी के राज्य प्राकृतिक संसाधनों पर बहुत अधिक निर्भर नहीं है, उनके यहां बीपीएल आबादी भी अपेक्षाकृत कम है और सड़क और रेल संपर्क बेहतर है. उच्च वल्नरेबलिटी वाले राज्यों के बारे में शोधकर्ताओं का कहना है कि उनके यहां प्रति व्यक्ति आय कम है, और वे मानव विकास सूचकांक में नीचे आते हैं. उन राज्यों में बीमारियां अधिक हैं, स्वास्थ्य सेवाएं स्तरीय नहीं है, बीपीएल आबादी अधिक है और अत्यधिक खेती की जाती है.
शोधकर्ताओं ने जलवायु परिवर्तन और अजन्मे बच्चे की सेहत पर शोध किया. शोध
में कठोर मौसम और जन्म के समय बच्चों के वजन पर ध्यान दिया गया. इस शोध को
ब्रिटेन की लैनकास्टर यूनिवर्सिटी और ब्राजील के फियोक्रूज हेल्थ रिसर्च
इंस्टीट्यूट ने किया है.
उत्तरी अमेजन राज्य में गर्भावस्था के दौरान असाधारण रूप से भारी बारिश और
बाढ़ को जन्म के समय बच्चे के कम वजन से जोड़कर देखा गया. शोधकर्ताओं ने
पिछले 11 सालों में तीन लाख जन्मों की तुलना स्थानीय मौसम डाटा के साथ किया
और पाया कि भारी बारिश से जन्म के समय वजन कम हो सकता है.
जलवायु परिवर्तन और अजन्मे बच्चे के बीच कड़ी को जोड़ता यह शोध नेचर
सस्टेनेबिलिटी पत्रिका में छपा है. जन्म के समय बच्चे के कम वजन के लिए
खराब शिक्षा प्रणाली, लचर स्वास्थ्य सुविधाएं, आर्थिक कमजोरी को कारण बताया
गया है.
शोध में कहा गया कि भारी बारिश नहीं होने पर भी 40 फीसदी नवजातों का वजन कम
रहने का जोखिम रहता है. शोध के सह-लेखक ल्यूक पैरी कहते हैं कि भारी बारिश
और बाढ़ के कारण मलेरिया और संक्रामक बीमारियां होने का खतरा रहता है,
गर्भवती महिलाओं में भोजन और मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे भी कम वजन के लिए
जिम्मेदार हैं.
ल्यूक पैरी कहते हैं कि यह लोग अमेजन के कट रहे जंगलों से बहुत दूर हैं और
यह "जलवायु अन्याय" का उदाहरण है. उनके मुताबिक इस इलाके का पर्यावरण इन
लोगों की वजह से नहीं बदला और पर्यावरण ने सबसे अधिक नुकसान इन्हें
पहुंचाया. वे कहते हैं कि ये प्रभाव कितने गंभीर हैं इससे वे आश्चर्यचकित
हैं.
विज्ञान की पत्रिका साइंस एडवांसेस की 2018 की एक रिपोर्ट कहती है कि कुछ
दशक पहले तक अमेजन नदी में इतनी भयानक बाढ़ नहीं आती थी लेकिन अब गंभीर
बाढ़ की संख्या पांच गुना अधिक हो गई है.