किसान विरोध प्रदर्शन के 6 माह... देशभर में काला दिवस मनाने का आह्वान...आंदोलन की तैयारी 2024 तक की
संयुक्त किसान मोर्चा ने नए
कृषि कानूनों के खिलाफ आज देशभर में काला दिवस मनाने का आह्वान किया
है, क्योंकि इसी दिन विरोध प्रदर्शन के छह महीने पूरे होने जा रहे हैं।
किसानों ने सभी देशवासियों से समर्थन मांगते हुए उन्हें बुधवार को अपने घर
और वाहन पर काला झंडा लगाने और मोदी सरकार के पुतले जलाने की भी अपील की
है। किसानों के इस आह्वान के मद्देनजर दिल्ली पुलिस भी सतर्क हो गई है।
दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता चिन्मय बिस्वाल ने आईएएनएस से कहा, "हमने किसानों
से अपील की है कि जिस तरह कोरोना में दुर्दशा हुई और लोगों की जान गई है,
इसलिए कोई कार्यक्रम करने या भीड़ जुटने के कारण वो स्थिति फिर से पैदा न
हो। प्रदर्शन करने या लोगों को इकट्ठा करने की इजाजत नहीं है।"उन्होंने
कहा, "यदि कोई व्यक्ति गैरकानूनी काम करेगा या कोरोना नियमों को तोड़ने का
प्रयास करेगा तो हम उस पर सख्त कार्रवाई करेंगे। सीमाओं पर, यानी
धरनास्थलों पर सुरक्षा के लिए दिल्ली पुलिस के जवानों को तैनात किया गया
है। इसके अलावा, हमने एहतियातन सुरक्षा और बढ़ाई है।"दिल्ली की
सीमाओं पर चल रहे किसान आंदोलन के 6 महीने जिस दिन पूरे हो रहे हैं, उसी
दिन केंद्र की मोदी सरकार के 7 साल पूरे हो जाएंगे। इस मौके पर सयुंक्त
किसान मोर्चा ने मोदी सरकार के विरोध स्वरूप काले झंडे लगाने का फैसला किया
है।हालांकि, 26 मई को भगवान बुद्ध के जन्म, निर्वाण और परिनिर्वाण
का उत्सव 'बुद्ध पूर्णिमा' भी पड़ता है, लिहाजा संयुक्त किसान मोर्चा ने
इस दिन सभी धरनास्थलों पर अपने-अपने तरीके से बुद्ध पूर्णिमा मनाने का
फैसला किया है।भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश
टिकैत ने आईएएनएस से कहा, "हमने 26 मई को मोदी सरकार के पुतले जलाने का भी
आह्वान किया गया है और लोग अपने घरों, दुकानों, वाहनों समेत सोशल मीडिया पर
काले झंडे लगाकर किसान विरोधी-जनता विरोधी मोदी सरकार का विरोध करेंगे।"
क्या
दिल्ली की सीमाओं पर इकट्ठा होंगे या दिल्ली के अंदर भी जाने का प्रयास
होगा? इस सवाल के जवाब में टिकैत ने कहा, "जो व्यक्ति जहां है वो वहीं
रहेगा, कोरोना नियमों का पालन करते हुए अपना विरोध दर्ज करेंगे।"संयुक्त
किसान मोर्चा के नेताओं के अनुसार, इस मुहिम का देश के ट्रेड यूनियन,
छात्र संगठन व तमाम जनवादी संगठन खुलकर समर्थन कर रहे हैं।तीन नए
अधिनियमित खेती कानूनों के खिलाफ किसान पिछले साल 26 नवंबर से ही राष्ट्रीय
राजधानी की विभिन्न सीमाओं पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।
--आईएएनएस
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 30 जनवरी 2021 को किसान संगठनों से कहा था, "केंद्र सरकार के प्रस्ताव पर अगर किसान नेता चर्चा करना चाहते हैं तो मैं बस एक फोन कॉल दूर हूँ."
इस बात को चार महीने बीत गए. कोरोना महामारी के बीच सर्दियों के मौसम में शुरू हुए आंदोलन को लेकर गतिरोध जस-का-तस बना हुआ है जबकि देश में कोरोनो की दूसरी लहर और गर्म हवाओं के थपेड़े जारी हैं. कोरोना महामारी में अब बॉर्डर पर डटे किसानों की संख्या ज़रूर कम हुई है लेकिन उनका दावा है कि आंदोलन जारी है और उनकी तैयारी 2024 तक की है.सितंबर में तीन कृषि क़ानून भारत की संसद ने पास किए. उसके बाद उन्हें राष्ट्रपति से मंजूरी भी मिल गई. लेकिन तुरंत ही मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया,कोर्ट ने मामले में चार सदस्य कमेटी का गठन किया गया, जिसे दो महीने में कोर्ट को रिपोर्ट देनी थी. तब तक केंद्र सरकार को क़ानून अमल में न लाने के लिए कहा गया.यानी कोर्ट के फैसले तक क़ानून पर रोक थी. संयुक्त किसान मोर्च ने कमेटी के सदस्यों के नाम पर आपत्ति जताई. कमेटी के सामने वो अपनी गुहार लेकर नहीं गए.एक सदस्य ने इस्तीफा दे दिया. बाकी के तीन सदस्यों ने दूसरे किसान संगठनों के साथ बातचीत के बाद सुप्रीम कोर्ट को अपनी रिपोर्ट सौंप दी है. उस रिपोर्ट को अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है.दूसरी तरफ़, नए कृषि क़ानून के विरोध में 40 किसान संगठनों ने अपना एक मोर्चा बनाया, नाम रखा संयुक्त किसान मोर्चा. इस संगठन के नेताओं की केंद्र सरकार के साथ 11 दौर की बातचीत चली, जो अब तक बेनतीजा ही रही.
संयुक्त किसान मोर्चा के सदस्य योगेंद्र यादव ने कहा, "कोरोना के मद्देनज़र उनका आंदोलन धीमा नहीं पड़ा है. लेकिन एहतियात के तौर पर उन्होंने ख़ुद किसानों से आग्रह किया है कि वो 26 मई को दिल्ली आएं लेकिन जत्थे में नहीं. कुछ समय के लिए आम लोगों का और मीडिया का ध्यान आंदोलन से ज़रूर हटा है, लेकिन किसान अब भी बॉर्डर पर डटा है."
आंदोलन कब और कैसे ख़त्म होगा? इस सवाल के जवाब में वो कहते हैं, "सच तो ये है कि सरकार के पास किसानों को देने के लिए कुछ नहीं है. सरकार की हिम्मत नहीं है ऐसे किसी क़ानून को दोबारा लागू करने की. आज केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट की आड़ में बैठी है. कल कोई और बहाना हो जाएगा. लेकिन अपने घमंड के कारण वो इसे लिखने में कतरा रही है. आंदोलन कैसे ख़त्म हो? इसका रास्ता सरकार को निकालना है. ये ज़िम्मेदारी कुर्सी पर बैठने वाले की होती है. अगर वो कुर्सी पर बैठकर नया प्रस्ताव नहीं दे सकते, तो उतर जाएँ."
संयुक्त किसान मोर्चा के ही दूसरे सदस्य और मध्य प्रदेश के किसान नेता शिव कुमार कक्काजी कहते हैं 26 मई के आगे उनकी तैयारी 2024 तक के लिए हो गई है. लेकिन वो क्या है? इस पर वो ज़्यादा नहीं बताते.