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कम पानी में अधिक उत्पादन लेने में काफी मददगार है यह स्कीम, किसानों की आय होगी दुगनी

किसानों की आय दोगुना करने के लिए सरकार तरह-तरह से प्रयास कर रही है. कई ऐसी योजनाएं लाई जाती हैं, जिससे किसान आर्थिक लाभ उठा सकते हैं. इसी तरह की एक योजना है जो कम पानी में किसानों को खेती में मदद करती है.

अगर कम पानी वाले क्षेत्र में फसलों  से अच्छा उत्पादन हासिल करना चाहते हैं तो प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना आपके लिए एक कारगर योजना साबित हो सकती है.

योजना से किसानों को मिल रहे लाभ को देखते हुए केंद्र सरकार ने दिसंबर, 2021 में प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना को 5 साल के लिए बढ़ाकर 2026 तक के लिए मंजूरी दे दी थी. योजना को बढ़ाते वक्त सरकार ने जानकारी दी थी कि इससे करीब 22 लाख किसानों को फायदा होगा, जिसमें 2.5 लाख अनुसूचित जाति और 2 लाख अनुसूचित जनजाति वर्ग के किसान हैं. वहीं कुल लागत का अनुमान 93,068 करोड़ रुपए है.

योजना का मकसद हर खेत तक पानी पहुंचाना
देश में करीब 14 करोड़ हेक्टेयर जमीन पर खेती होती है. 2015 में जब प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना शुरू हुई तब 6.5 करोड़ हेक्टेयर जमीन पर ही सिंचाई की सुविधाएं उपलब्ध थीं. इसका मतलब यह हुआ कि आधे से भी ज्यादा खेती की जमीन बारिश के पानी पर निर्भर थी.

जाहिर है वर्षा आधारित क्षेत्रों में पैदावार कम होती है. इस वजह से किसानों को उतना लाभ नहीं मिलता जितना मिलना चाहिए. प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना का असल मकसद हर खेत तक पानी पहुंचाना है. यह एक अम्ब्रेला स्कीम है और इसमें मुख्य रूप से दो घटकों को शामिल किया गया है.

योजना के तहत पानी बचाने पर भी जोर
त्वरित सिंचाई लाभ कार्यक्रम यानी एआईपीपी और हर खेत को पानी के भी चार घटक हैं. इसमें कमांड एरिया डेवलपमेंट, सरफेस माइनर इरीगेशन, जल निकायों की मरम्मत, नवीनीकरण और बहाली तथा चौथा घटक है भूजल विकास. इस सिंचाई योजना में भी दूसरे मंत्रालयों के दो घटकों को शामिल किया गया है. पहला घटक, प्रति बुंद अधिक उपज है. दूसरे घटक का नाम वाटर शेड विकास है.

सिंचाई योजना का उदेश्य खेत तक पानी की पहुंच को बढ़ाना और सुनिश्चित सिंचाई के तहत खेती योग्य भूमि का विस्तार करना है. इसके अलावा खेत में पानी के उपयोग की दक्षता में सुधार करना और स्थायी जल संरक्षण प्रथाओं को पेश करना भी शामिल था.

पानी की बचत भी इस योजना का एक प्रमुख पहलू है. 2020-21 के दौरान इस योजना के तहत 9 लाख 38 हजार हेक्टेयर फसलों को सूक्ष्म सिंचाई के तहत लाया गया है. इसमें टपक और फव्वारा दोनों तरह की विधियां शामिल हैं.


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