कभी पत्थर समझ कर किया गया था प्रहार ! अब हजारों की संख्या मे... - CG Sandesh

कभी पत्थर समझ कर किया गया था प्रहार ! अब हजारों की संख्या में किया जाता जलाभिषेक, जानिए भंवरपुर के ऐतिहासिक शिव मंदिर की कहानी.

महासमुंद जिले के बसना ब्लाक अंतर्गत ग्राम पंचायत भंवरपुर में एक महादेव शिव का एक ऐतिहासिक मंदिर है. इस मंदिर में सावन मास में सोमवार को भक्तों का तांता लगा रहता है. सावन के अंतिम सोमवार में यहाँ भक्तों का मेला लग जाता है. इस दिन मंदिर में देर शाम तक शिवलिंग का जलाभिषेक होता है.

इस मंदिर में जलाभिषेक करने कुछ श्रद्धालु जैतपुर, चंद्रपुर और महानदी से कांवर में जल लाकर शिवलिंग पर जल अर्पित करते है. तो कुछ कावड़िए ओडिशा स्थित नरसिंहनाथ धाम से भी कांवर में जल लाकर शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं. एक ही दिन में यहां दस हजार से अधिक कावड़ियों द्वारा विभिन्न स्थानों से जल लाकर जलाभिषेक किया जाता है.

इस मंदिर के प्रति लोगों की जितनी आस्था है, उतना ही पुराना और रोचक है यहाँ का इतिहास. गांव के बड़े बुजुर्ग बताते हैं कि भंवरपुर के देव तालाब रानीसागर के किनारे स्थित इस पूर्व मुखी शिव मंदिर में वर्षों पहले मंदिर की जगह पर खेत हुआ करता था.

एक दिन इस खेत के किसान ने अपने खेत पर कुआँ बनाने की सोचकर जमीन की खोदाई करनी शुरू कर दी. जमीन को कुछ देर खोदे जाने पश्चात् किसान को उस जगह पर एक गोल पत्थर मिला जो खोदाई को आगे बढ़ने नहीं दे रहा था. किसान ने उस पत्थर को निकालने बहुत प्रयास किया लेकिन वह असफल रहा.

पत्थर को हटाने के लिए उसने पहले गोल पत्थर की गोलाई में खोदाई की फिर वहां पानी डालकर उसे हिला डुला कर निकालने की कोशिश की, लेकिन उसे वह नहीं निकाल पाया. इसके बाद उसने पत्थर को तोड़ने के लिए कुदाल से जोरदार प्रहार किया. लेकिन पत्थर पर इसका कोई असर नहीं हुआ. जबकि उस कुदाल पर निशान आ गया.

दिनभर की मेहनत के बाद भी जब किसान सफल नहीं हुआ तो दूसरे दिन किसी भी तरह उस पत्थर को निकालने का संकल्प लेकर वह घर आ गया और आराम करने लगा. तब उसे स्वप्न में भगवान शिवजी ने दर्शन देकर कहा कि तुम जिस पत्थर को निकालना चाहते हो वो कोई साधारण पत्थर नहीं है, एक शिवलिंग है. मैं स्वयं वहां शिवलिंग के रूप में प्रगट हो रहा हूं. मेरे विचार से तुम्हें उस जगह की खोदाई बंद करके अन्यत्र खोदाई करनी चाहिए.

सुबह जब किसान उस जगह पर पुनः खोदाई करने पहुंचा तो उसने देखा कि वह पत्थर पहले दिन से बाहर आ गया था. धीरे-धीरे यह शिवलिंग बाहर निकल आया और शिवलिंग की पूजा-अर्चना करनी प्रारंभ कर दी गई गांव वालों के सहयोग से वहां एक छोटा सा मंदिर बनाकर कुएं को अन्यत्र जगह पर खोदा गया.

बताया जाता है कि किसान जिस कुदाल से पत्थर पर प्रहार कर रहा था वह आज भी शिवलिंग पर मौजूद है. जिसे स्पर्श करके महसूस किया जा सकता है. आज जो मंदिर वहां मौजूद है वह जन सहयोग से बड़ा और भव्य हो चुका है. शिवलिंग आज जमीन से लगभग 3 फीट ऊपर आ चुका है और इसकी ऊंचाई दिनों दिन बढ़ती ही जा रही है.

इस मंदिर परिसर में भगवान जगन्नाथ की स्थापना भी की गई है और एक संतोषी माता का मंदिर भी बनवाया गया है. इसके साथ ही दुसरे स्थान पर खोदा गया कुआँ भी आज वहां मौजूद है.  

इस मंदिर का इतिहास कितना पुराना है इसका दावा नहीं किया जा सकता मगर मंदिर के पुजारी बताते हैं कि आज से तकरीबन 30 वर्ष पूर्व 1986 में जब पुराने मंदिर का जीर्णोद्धार करने पूर्व मंदिर को ता़ेडा गया, तब कुछ भक्तों द्वारा शिवलिंग को भूतल से ऊपर उठाकर स्थापना करने के विचार से शिवलिंग को उखाड़ने के लिए उसके चारों ओर खोदाई की.

जब बहुत गहराई तक खोदने पर भी जब उन्हें शिवलिंग का कोई ओर छोर नजर नहीं आया, तब उन्होंने भगवान शिव से अपने कृत्य पर क्षमा याचना कर शिवलिंग को उखाड़ने के विचार का त्याग किया.




अन्य सम्बंधित खबरें