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महासमुंद वनमण्डल में वन अग्नि रोकथाम हेतु एक दिवसीय कार्यशाला का सफल आयोजन

जंगलों को अग्नि से सुरक्षित रखने तथा आगामी अग्नि मौसम की प्रभावी तैयारी सुनिश्चित करने के उद्देश्य से दिनांक 23 जनवरी 2026 को वन विद्यालय, महासमुंद में वनमण्डल स्तरीय एक दिवसीय वन अग्नि रोकथाम एवं बचाव कार्यशाला का आयोजन सफलतापूर्वक किया गया। यह कार्यशाला माननीय मयंक पाण्डेय, वनमण्डलाधिकारी महासमुंद के कुशल मार्गदर्शन में संपन्न हुई।

कार्यशाला में गोविंद सिंह, उपवनमण्डल अधिकारी महासमुंद, डिम्पी बैस, उपवनमण्डल अधिकारी पिथौरा, उदेराम बसंत, उपवनमण्डल अधिकारी सरायपाली, निखिल पैकरा, अनुदेशक वन विद्यालय, सहित वनमण्डल के समस्त परिक्षेत्र अधिकारी, क्षेत्रीय अधिकारी, कर्मचारी, फायर वॉचर, वन चौकीदार एवं समिति सदस्यगण गरिमामयी रूप से उपस्थित रहे।

कार्यशाला के दौरान आगामी अग्नि मौसम को दृष्टिगत रखते हुए वनाग्नि की रोकथाम, पूर्व तैयारी, त्वरित प्रतिक्रिया प्रणाली तथा जन-जागरूकता के विभिन्न पहलुओं पर विस्तृत एवं गंभीर चर्चा की गई। इस अवसर पर माननीय वनमण्डलाधिकारी महोदय द्वारा सभी अधिकारियों एवं कर्मचारियों को निर्देशित किया गया कि अग्नि मौसम प्रारंभ होने से पूर्व फायर लाइनों का निर्माण, संवेदनशील वन क्षेत्रों की सतत निगरानी, तथा प्राप्त प्रत्येक सूचना पर त्वरित एवं प्रभावी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।

माननीय वनमण्डलाधिकारी महोदय ने अपने उद्बोधन में बताया कि जंगलों में आग लगने के प्रमुख कारणों में महुआ संग्रहण, तेंदूपत्ता बुटा छोपाई, खेत एवं बाड़ी की सफाई, पिकनिक के दौरान लापरवाही, बीड़ी-सिगरेट का अनुचित उपयोग, विद्युत तारों से उत्पन्न चिंगारी तथा होली पर्व के समय असावधानी सम्मिलित हैं। इन कारणों पर प्रभावी नियंत्रण एवं आमजन को जागरूक करने हेतु निरंतर प्रयास किए जाने पर विशेष बल दिया गया।

कार्यशाला में यह भी स्पष्ट किया गया कि वनाग्नि से वन संपदा को गंभीर क्षति, मृदा की उर्वरता एवं नमी में कमी, वन्य जीवों के प्राकृतिक आवासों को नुकसान तथा पर्यावरणीय संतुलन में अव्यवस्था उत्पन्न होती है। अतः आग की सूचना प्राप्त होते ही उसे शीघ्र नियंत्रित करना अत्यंत आवश्यक है। इस हेतु कंट्रोल रूम की स्थापना, अस्थायी अग्नि नियंत्रण केंद्रों की तैयारी, आवश्यक उपकरणों की पूर्व उपलब्धता एवं वन सुरक्षा कर्मियों को फायर ब्लोअर जैसे आधुनिक संसाधन उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए।

साथ ही, ग्रामों, हाट-बाजारों, विद्यालयों एवं सार्वजनिक स्थलों पर पोस्टर, दीवार लेखन, जन-जागरूकता प्रतियोगिताएँ एवं नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से नागरिकों को वनाग्नि से होने वाले दुष्परिणामों के प्रति जागरूक करने पर विशेष जोर दिया गया।

अधिकारियों द्वारा यह भी प्रतिपादित किया गया कि वनाग्नि की प्रभावी रोकथाम केवल वन विभाग के प्रयासों से संभव नहीं है, बल्कि इसमें जनसहयोग एवं सामुदायिक सहभागिता की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका है। अंत में समस्त अधिकारियों एवं कर्मचारियों से पूर्ण कर्तव्यनिष्ठा, सतर्कता एवं समर्पण के साथ कार्य करने का आह्वान किया गया, जिससे भविष्य में वनों को अग्नि से सुरक्षित रखा जा सके।

कार्यक्रम का समापन “नो फायर – सुरक्षित वन, सुरक्षित भविष्य” के संकल्प के साथ किया गया।


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