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महापंडित राहुल सांकृत्यायन : जिन्होंने 20वीं सदी में भारतीय ज्ञान परंपरा को विश्व पटल पर किया पुनर्जीवित

(कुमार कृष्णन-विनायक फीचर्स)  महापंडित राहुल सांकृत्यायन...एक ऐसा व्यक्तित्व जिन्होंने 20वीं सदी में भारतीय ज्ञान परंपरा को विश्व पटल पर पुनर्जीवित किया। महापंडित राहुल सांकृत्यायन (1896-1963) न केवल एक अथक यात्री थे, बल्कि एक विपुल लेखक भी थे जिन्होने 13 साल की उम्र में पहली बार घर छोड़कर अपनी यात्रा शुरु की। उन्होंने यात्रा वृतांत को 'साहित्यिक रूप' दिया इसलिए राहुल सांकृत्यायन को हिंदी यात्रा साहित्य का जनक कहा जाता है। उन्होंने अपने जीवन के 45 वर्ष अपने घर से दूर अन्वेषण में बिताए।

 अपने जीवन के विभिन्न चरणों में राहुल सांकृत्यायन एक वैष्णव मठ के महंत, किसान आंदोलन कारी, बौद्ध भिक्षु, स्वतंत्रता सेनानी और क्रांतिकारी थे। हालांकि उनका सबसे बड़ा योगदान अपनी यात्राओं के माध्यम से भारत और तिब्बत के बीच प्राचीन संबंधों को फिर से उजागर करना और प्रचुर सामग्री भारत वापस लाना था।

मिन्हाजू सिराज ने अपनी पुस्तक 'तबकात -ए-नासरी' में 12वीं शताब्दी के अंत में नालंदा, विक्रमशिला और उदवंतपुरी के प्राचीन विश्वविद्यालयों के विध्वंस का वर्णन किया है। मुख्य रूप से बौद्ध शाक्य सम्प्रदाय के मठों में संग्रहित कई अमूल्य पांडुलिपियों को तिब्बत से वापस लाए। इन ग्रन्थों को पलायनकारी भिक्क्षु अपने साथ तिब्बत ले गए थे। तिब्बत के मौसम ने यह सुनिश्चित किया कि ये प्रकृति की अनिश्चितताओं से नष्ट न हो।महापंडित ने संस्कृत, पाली और अन्य भाषाओं में दुर्लभ पांडुलिपियों को प्राप्त करने के लिए तिब्बत में लगातार चार अभियानों का नेतृत्व किया और उनके प्रयासों ने बुद्ध की शिक्षाओं को पुनर्जीवित किया जो विलुप्तता के कगार पर थीं। अपने प्रयासों से वह न केवल इन दुर्लभ हिंदू और बौद्ध ग्रंथो की प्रतियां वापस लाए बल्कि उपमहाद्वीप की भूली हुई विरासत और इतिहास पर भी प्रकाश डाला।

राहुल सांकृत्यायन ने स्वयं पाली सीखी और बौद्ध ग्रंथ “मध्यम निकाय” का अध्ययन किया जिसमें बौद्ध प्रवचनों का वर्णन है। राहुल सांकृत्यायन के अनुसार, तिब्बत की उनकी यात्राएं अच्छे और बुरे दोनों अनुभवों से पूर्ण थी। जहां उन्होंने भारी कठिनाइयों का सामना किया, वहीं कुछ अनुभव बहुत अच्छे थे। उन्हें प्राचीन ताड़ के पत्तों की पांडुलिपियों के साथ-साथ भारतीय शैली की अमूल्य स्क्रॉल पेंटिंग भी मिली।

 1926 में राहुल जी ने अपनी पहली तिब्बत यात्रा ज्यादातर पैदल तय की। उस यात्रा में उनका साथी केवल एक कुत्ता था। तिब्बत की उनकी बाद की यात्राओं में घोड़े तथा खच्चर यात्रा के साधन थे। उन्होंने लिखा है कि उनके पास जो पैसे थे उनमें से ज्यादातर यात्रा खर्च के लिए भी पर्याप्त नहीं थे। वह आगे लिखते हैं कि उन्हें कभी दूसरों से पैसा उधार लेना पसंद नहीं था, लेकिन तिब्बत में उन्हें इस व्यक्तिगत प्रवृत्ति को छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा।

 1933-34 में अपनी दूसरी यात्रा के दौरान उन्होंने अपने उल्लेखनीय साथी, मित्र, दार्शनिक, कलाकार और भिक्षु ‘गेदुन चोफेल’ से मुलाकात की। राहुलजी के अनुसार तिब्बत एक सुनहरा पुल था जिस पर वे एक-दूसरे से मिले थे। उनकी दोस्ती पारस्परिक सम्मान पर आधारित थी और दोनों ने एक-दूसरे की सोच और दृष्टिकोण को प्रभावित किया। वह गेदुन चोफेल को लेकर भारत वापिस लौटे जिसे तिब्बती विद्वान ने अपने सपने का साकार होना बताया।भारत और तिब्बत के बीच के प्रगाढ़ संबंधों को उजागर करना है। उनकी तिब्बत से 22 खच्चर भर लाई गई पांडुलिपियां अनमोल हैं।महापंडित ने अपने गांव के स्कूल में केवल उर्दू का अध्ययन किया था, लेकिन 30 से अधिक भाषाओं में स्व-शिक्षित थे और 12 से अधिक में पारंगत थे। उन्होंने यात्रा वृतांत से लेकर उपन्यास तक 140 से अधिक ग्रंथ लिखे। उनका सबसे बड़ा योगदान आम जनता के लिए प्राचीन बौद्ध ग्रंथों का सरल हिंदी में अनुवाद करना रहा, जिससे यह सर्वसुलभ हो गया। उन्होंने तिब्बती-हिन्दी शब्दकोश भी लिखा। मूल बौद्ध सिद्धांतों को पढ़ने के लिए उन्होंने स्वयं पाली सीखी। बाद में वे श्रीलंका गये जहां उन्होंने संस्कृत पढ़ाई। राहुल सांकृत्यायन द्वारा लाई गईं अधिकांश पांडुलिपियां काशी प्रसाद जायसवाल संस्थान, पटना में संरक्षित हैं। श्री जयसवाल स्वयं एक प्रसिद्ध इतिहासकार और वकील थे जिन्होंने महापंडित को उनकी यात्राओं के वित्तपोषण और पांडुलिपियों के अनुवाद में सहायता की।राहुल सांकृत्यायन को साहित्य अकादमी और पद्म भूषण सहित कई पुरस्कारों से सम्मानित किया गया । उन्होंने त्रिपटक ग्रंथ का गहन अध्ययन किया और उन्हें’ त्रिपटकाचार्य’ की उपाधि दी गई । उनकी रचनाएं मुख्य रूप से हिंदी में हैं, जिसके कारण अंग्रेजी भाषी अभिजात वर्ग द्वारा इसे नजरअंदाज कर दिया गया है। उनके समकालीन ज्ञानी उन्हें विलक्षण प्रतिभा का धनी मानते थे। पं. जवाहर लाल नेहरू ने कहा था, ‘मैं केवल एक ही राहुल को जानता हूं जो विलक्षण हैं।’हमारा देश वर्तमान में ‘सांस्कृतिक पुनरुद्धार’ पर की ओर अग्रसर है। हमें महापंडित जैसे लोगों का अध्ययन करने और उनके योगदान से सीखने की जरूरत है। राहुल सांकृत्यायन ने जनमानस की चेतना से मिटाए गए ग्रंथों को फिर से खोजा।

उनका लेखन भारत और तिब्बत के बौद्ध संबंधों और विरासत को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। महापंडित का जीवन ‘चरैवेति -चरैवेति’ वाक्यांश में समाहित है, जिसका अर्थ है निरंतर चलते रहो। ‘बदलाव’ भी उनके जीवन का उपयुक्त वर्णन होगा। राहुल सांकृत्यायन भारतीय ज्ञान तथा परंपरा के प्रतीक हैं जिसे पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। उन्होंने अपना समय एवं ऊर्जा, हमारे प्राचीन ग्रंथों और संस्कृति के अध्ययन की पुनः खोज और उनके माध्यम से भारत और तिब्बत के बीच के संबंधों को और भी प्रगाढ़ करने में समर्पित किया जिसके लिये वह साधुवाद के भागी हैं।करीब 100 साल पहले राहुल सांकृत्यायन द्वारा तिब्बत से लाई गई विश्व प्रसिद्ध पांडुलिपियां आज भी अपने पूर्ण संरक्षण और अनुवाद की प्रतीक्षा कर रही हैं। यह धरोहर न केवल धार्मिक है, बल्कि प्राचीन भारत-चीन और तिब्बत संबंधों का सबसे बड़ा ऐतिहासिक प्रमाण भी है।राहुल सांकृत्यायन ने वर्ष 1929 से 1938 के बीच चार बार तिब्बत की दुर्गम यात्राएं की थीं। उन यात्राओं के दौरान उन्होंने मठों और गांवों का सघन सर्वेक्षण कर करीब 10 हजार ग्रंथ एकत्र किए थे। इस विशाल संग्रह का मुख्य हिस्सा उन्होंने बिहार एंड ओडिशा रिसर्च सोसाइटी, पटना को सौंपा था, जबकि दुर्लभ पांडुलिपियों का एक विशेष हिस्सा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण दिल्ली को दिया गया। दिल्ली के धरोहर भवन में रखी इन पांडुलिपियों में सबसे अद्भुत ‘सेरडे’ संस्करण है, जिसमें 108 पोथियां शामिल हैं। ये पांडुलिपियां हस्तनिर्मित कागज पर शुद्ध सोने की स्याही से लिखी गई हैं, जिन्हें ‘कंजूर’ यानी बुद्ध के प्रत्यक्ष वचन कहा जाता है। ‘भोट’ लिपि में लिखे गए इन 845 ग्रंथों को 20वीं शताब्दी की सबसे महत्वपूर्ण विश्व धरोहरों में गिना जाता है।ये ग्रंथ मात्र धार्मिक दस्तावेज नहीं हैं, बल्कि 7वीं से 11वीं शताब्दी (अर्ली मेडिवल पीरियड) के उस दौर का इतिहास हैं जब लगभग 400 वर्षों तक नालंदा, विक्रमशिला और ओदंतपुरी के विद्वान निरंतर तिब्बत और चीन की यात्रा करते थे। इन ग्रंथों में आचार्य पद्मसंभव, शान्तरक्षित और दीपांकर श्रीज्ञान जैसे विद्वानों के वृत्तांत दर्ज हैं।

महापंडित राहुल सांकृत्यायन का बिहार के भागलपुर के सुल्तानगंज से गहरा संबंध था। उन्होंने 1932 में सुल्तानगंज से प्रकाशित होने वाली प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका "गंगा" के संपादक पंडित रामगोविन्द त्रिवेदी को बहुमूल्य परामर्श दिए थे। उन्होंने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "मेरी जीवन यात्रा" में सुल्तानगंज की 'गंगा' पत्रिका के लिए अनेक ऐतिहासिक व पुरातात्विक लेख लिखने का जिक्र किया है।

सुल्तानगंज (भागलपुर, बिहार) से प्रकाशित "गंगा" पत्रिका में राहुल जी के लेख छपते थे, जिनमें 'महायान की उत्पत्ति' और 'चौरासी सिद्धि' का जिक्र मिलता है।सुल्तानगंज के इसी समय के दौरान, उन्होंने तिब्बत से लाए गए बौद्ध चित्रों को बेचकर प्राप्त धन से नालन्दा महाविहार के पुनरुद्धार का विचार किया था।

महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने 1932 में सुल्तानगंज (बिहार) से निकलने वाली “गंगा” पत्रिका के सम्पादक पंडित रामगोविन्द त्रिवेदी को परामर्श दिया कि गंगा पत्रिका पुरातत्व विशेषांक प्रकाशित करे। 'गंगा' के स्वामी बनैली राज्य नरेश कुमार कृष्णानन्द सिह थे। उन्होने पुरातत्व विशेषांक के लिये प्रचुर धन प्रदान किया, लेकिन उनकी शर्त थी कि राहुलजी इस विशेषांक के अतिथि सम्पादक के दायित्व का निर्वहन करेंगे। 'गंगा' के पुरातत्व विशेषांक के सम्पादन के लिए राहुलजी को कुछ सप्ताह सुल्तानगंज मे रहना पड़ा।

 कुमार साहब के राजदरबार में सनातन धर्मावलम्बियों का प्रभुत्व था। सनातनियों को ज्ञात था कि राहुल सांकृत्यायन श्रीलंका के बौद्ध महाविहार में प्रवजित होकर अनीश्वरवादी हो गये। सनातन धर्म के इस तिरस्कार से वे क्षुब्ध थे। उन्होंने कहा, दुनिया के सभी प्रमुख धर्म किसी न किसी रूप में ईश्वर की सत्ता को स्वीकार करते हैं। गुरु नानक, संत कबीर, रामकृष्ण परमहंस, महात्मा गाधी आदि विश्ववंद्य महात्माओं ने भी ईश्वर के अस्तित्व मे आस्था व्यक्त की है, फिर राहुलजी क्यों अनीश्वरवादी हैं? राहुलजी ईश्वर की सत्ता को इसलिए नहीं मानते होंगे क्योंकि बौद्ध धर्म प्रतीत्यसमुत्पाद के नियम, अर्थात कारण-कार्य की श्रृंखला को मानता है।

 बौद्धधर्म कहता है कि सृष्टि का न तो कोई संचालन करने वाला है, न ही कोई सृजन करने वाला है। बौद्धधर्म की धारणा कि ब्रह्माण्ड का न आरंभ है और न अंत, पूर्णतः मिथ्या है, निराधार है।

 एक दिन कुमार साहब के दरबार में पण्डितों ने गंगा सम्पादक त्रिवेदीजी से कहा कि "राहुलजी को कल यहाँ बुला लाइये। इस विषय पर शास्त्रार्थ होगा और हम लोग राहुलजी को ईश्वर मनवाकर दम लेंगे।"

त्रिवेदीजी लिखते है-

 "मैने राहुलजी से सारी कथा कह सुनायी। किन्तु उन्होंने दरबार में जाने की आनाकानी की। राहुल जी राजनैतिक नेताओं और धनपतियों से उदासीन रहते थे। एक बार देशबन्धु चितरंजन दास से आप मिलने गये। थोड़ी देर बैठकर (बुलावा नहीं आने के कारण) बिना मिले ही लौट गये। तिब्बत जाकर दुर्लभ सामग्री आपने पटना-म्यू‌जियम को दी। इससे बिहार का तत्कालीन गवर्नर बड़ा प्रसन्न हुआ। उसने प्रसिद्ध इतिहास-वेत्ता श्री काशीप्रसाद जायसवाल के द्वारा राहुलजी को धन्यवाद दिया और मिलने के लिये राहुलजी को बुलाया। किन्तु राहुलजी नहीं मिले। परन्तु मेरे अत्यधिक आग्रह करने पर कुमार साहब को साहित्यानुरागी जानकर दरबार में चलने और विचार विनिमय करने को राजी हो गये।

प्रातःकाल से ही योद्धा तीरकमान चढाने लगे और धनुर्वाण मांजने लगे। शाम होते-होते सभी मल्लराज अखाड़े में उतर पड़े। राहुलजी भी मुझे लेकर दरबार में पहुँचे। शिष्ट-विधि के अनन्तर तर्क-वितर्क प्रारम्भ हुये। पंडित लोग आस्तिक दर्शनों के प्रमाण, तर्क और उक्तियाँ उपस्थित करते और राहुल जी खण्डन करते। पूर्व पक्ष से न्याय, वेदान्त, उपनिषद और इनके भाष्यों की गहन-गम्भीर युक्तियां दी जाती और राहुलजी बौद्धदर्शन और विज्ञान के तर्कों से उनका खण्डन करते। यह क्रम एक घंटे तक चलने के पश्चात सात्विक विवाद ने तामस रूप ले लिया। हार-जीत के फैसले के लिये बेताब कुछ श्रोता भी शुष्क दार्शनिक तर्क-प्रमाण सुनते-सुनते ऊब चले। वायुमण्डल गम्भीर हो गया। पंडित क्रोधावेश में आकर उबल पडे - यह कुछ नहीं समझता, पूर्वाग्रह-ग्रस्त है, महामूर्ख है।" दूसरे गरजे, "यह कुछ नहीं जानता, पल्लव-ग्राही है। मैं तुम्हें जीवन भर विद्यार्थी बनाकर पढ़ा सकता हूँ। राहुल जी नितान्त शान्त बैठे मुस्कराते हुए बोले- "आप लोगों ने जो कहा वह ठीक हो सकता है। किन्तु मेरे जैसे महामूर्ख से आप ईश्वर नहीं मनवा सकते, मैं विद्यार्थी तो हूं ही, जीवन भर विद्या का अर्थी रहना चाहता हूँ।"

राहुलजी की तर्क-युक्तियों का तो किसी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। परन्तु उनकी असीम सहनशीलता का लोगों पर जबर्दस्त प्रभाव पड़ा। लोग स्तब्ध और विस्मित हो उठे। इन लोगों को क्या मालूम था कि राहुलजी जेल भी गये तो हंसते रहे।

उस दिन मेरे घर पर आकर राहुलजी ने मुझसे ईषद्हास्य के साथ पूछा "यहां के संस्कृत-महाविद्यालय में कितने अगस्त्य-दुर्वासा है?"

 मैंने कहा- अस्मिन अगस्त्य-प्रमुखा प्रदेशे, भूयांस उद्गीथविदो वसन्ति।

 राहुलजी ने झटपट टिप्पणी की "उद्गीथविद (वेद-विज्ञाता) होकर भी पाशुपतास्त्र, आग्नेयास्त्र और ब्रह्मास्त्र चलाने में वे बड़े निपुण हैं।" मैंने कहा- "वशिष्ठ और द्रोणाचार्य की सन्तान जो है।" इस पर एक करारा ठहाका लगा।"

सुल्तानगंज मे अपना कार्य समाप्त करने के बाद राहुलजी पटना गये। पटना स्टेशन पर बैरिस्टर और इतिहासकार काशीप्रसाद जायसवाल जिन्होंने मिर्जापुर मे आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के साथ हाई स्कूल की पढाई पूरी की थी और तदुपरांत ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में इतिहास का अध्ययन किया, उनको लेने आये।

 शाम के समय युवा कवि दिनकर "काव्यशास्त्र विनोद" के लिये जायसवालजी की कोठी पर आये। उन्होने जायसवाल जी से कहा-आप जैसा बोलते हैं, ईश्‍वर पर आपका वैसा ही अविश्वास है या नहीं, इसमें मुझे सन्देह है । अगर ईश्वर-सिद्धि के पक्ष में केवल एक ही दलील हो, तो भी वह काफी है कि कोई था ही नहीं, तो यह सारी सृष्टि आई कहाँ से ?' राहुलजी पास ही बैठे थे। जायसवालजी ने संकेत किया। वे झट बोल उठे--'कौन कहता है कि ईश्वर नहीं था? था जरूर,लेकिन, कुछ दिन हुए, बेचारा मर गया। देखते नहीं दुनिया कितनी दुःखी है?' दिनकर जी ने राहुल सांकृत्यायन के संस्मरण मे लिखा, 'तीर लक्ष्य पर लगे और सुनने वाले का जी भी न दुखे, राहुलजी ऐसे व्यंग्य के धनी हैं।

1934 के भूकम्प के समय पटना में महात्मा गांधी ने राहुलजी को किसी विषय पर विचार-विमर्श करने के लिये बुलाया। गांधीजी से मिलकर जब वे बाहर निकले, मालवीय जी ने उनसे पूछा, क्या बौद्ध धर्म अनीश्वरवादी है? राहुलजी ने कहा, बौद्ध दर्शन के तीन स्तम्भ है: अनीश्वरवाद, अनात्मवाद और क्षणिकवाद। मालवीयजी ने धैर्यपूर्वक राहुलजी की व्याख्या सुनी।

 बौद्ध ग्रंथो में धैर्य या क्षान्ति की बडी महिमा है। हम दूसरे के विचार को स्वीकार करें या न करें, अगर हम विपरीत विचार के प्रति धैर्यवान हैं, यह जग-उद्यान नाना प्रकार के सुन्दर विचार-पुष्प से सुशोभित और सुरभित रहेगा।


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