महासमुंद : नए आका को खुश करने की अंधी दौड़ में ‘अपराधी’ बन गई खाकी;? क्या कप्तान को खबर है या सिर्फ ‘दरबारियों’ का पहरा है?
जिले के पुलिस महकमे में इन दिनों कानून व्यवस्था की नहीं, बल्कि 'जी-हुजुरी' और 'उगाही' की हवाबाजी की खबरें चल रही है। खाकी वर्दी की चमक अब आम जनता के भरोसे से नहीं, बल्कि बेगुनाहों के आंसू और रसूखदारों के चंदे से चमकने लगी है। हालात ऐसे हो गए हैं कि विभाग के कुछ 'वर्दीधारी सौदागर' अपने वरिष्ठों की नजरों में नंबर बढ़ाने के लिए फर्जी कार्यवाहियों की ऐसी पटकथा लिख रहे हैं, जिससे विभाग की फजीहत पूरे प्रदेश में होने लगी है।
ताजा मामला विभाग के भीतर की व्यवस्था की खामियां को उजागर करता है। खबर है कि विभाग के ही एक 3 सितारा कर्मी ने एक होटल वाले व्यक्ति से ऐसी नाजायज डिमांड रखी गई, जिसे पूरा करने में उसने असमर्थता जताई। बस फिर क्या था? खाकी का अहंकार जाग उठा और प्रतिशोध की आग में उस व्यक्ति पर अनुचित एफआईआर ठोंक दी गई। वाहन मांगनी मे लें गए कर्मचारी को सहायक आरोपी बता मालिक पर ही कील ठोक अपने अहंकार को भुना दिया।
अब पीड़ित परिवार न्याय की गुहार लगाने प्रदेश के गृहमंत्री के द्वार खटखटाने को मजबूर है। सवाल यह है कि क्या रक्षक ही अब भक्षक बनकर अपनी ईगो की संतुष्टि के लिए किसी का भविष्य बर्बाद करेंगे?
एक मामला ऐसा सामने आया जहाँ अपने पति के साथ मायके आई महिला के पति पर अवैध महुआ शराब की कार्यवाही हो गई, महिला का कहना था कि उसकी माँ ने अपने दामाद के लिए मुर्गा और देशी शराब पौवा की व्यवस्था की थी, जहाँ पुलिस पहुंची और कार्यवाही ना करने की एवज के डिमांड करने लगी, डिमांड पूरी ना होने पर उसके खिलाफ देशी महुआ शराब की कार्यवाही कर दी गई।
पुराने दागियों पर मेहरबानी, नए चेहरों पर ‘बाजीगरी’
जिले में अवैध शराब और तस्करी के विरुद्ध कार्यवाही का जो शोर मचाया जा रहा है, उसकी हकीकत बेहद शर्मनाक है। विभाग की 'विशेष कृपा' उन पुराने खिलाड़ियों पर बनी हुई है जो सालों से अवैध धंधों में लिप्त हैं, लेकिन नए कप्तान को खुश करने की अंधी दौड़ में निर्दोषों और नए लोगों को आरोपी बनाकर जेल भेजा जा रहा है।
पिथौरा से लेकर बसना तक हुई हालिया कार्यवाहियों पर उठते प्रश्नचिह्न चीख-चीख कर कह रहे हैं कि यह न्याय नहीं, बल्कि आंकड़ों की बाजीगरी है।
जिले के आला अधिकारियों ने विभाग को 'प्राइवेट लिमिटेड कंपनी' बना दिया है। नए कप्तान के नाम का खौफ दिखाकर लाखों-करोड़ों का चंदा उगाहे जाने की खबरें आम हैं। विडंबना देखिए कि जहां पुराने कप्तानों के दौर में अनुशासन था, वहीं आज कप्तान और आम जनता के बीच 'द्वारपालों' और 'मंत्रियों' की ऐसी दीवार खड़ी कर दी गई है कि आम आदमी का उन तक पहुंचना दूभर हो गया है। मीडिया से दूरी और संवादहीनता ने जिले के इन स्वयंभू आकाओं के हौसले और बुलंद कर दिए हैं।
अन्य मामले मे जिले के हृदय स्थल बुंदेली में एक महिला सरपंच के साथ मारपीट होती है, लेकिन आरोप है कि 'मोटी भेंट' लेने के बाद खाकी ने चुप्पी साध ली है। क्या अब अपराधियों को संरक्षण देना ही पुलिस का धर्म रह गया है?
सूबे मे परिवर्तन के बाद ही तय था की गौवध के विरुद्ध शासन ने ऐतिहासिक कदम उठा कर तस्करो के विरुद्ध जोरदार कार्यवाही की बात कही अन्य जिलों मे शासन के निर्देशों का प्रभाव भी देखा जा रहा हैं लेकिन महासमुंद मे गौसेवक लगातार साक्ष्य दे रहे हैं, सोशल मीडिया पर तस्करी के प्रमाण तैर रहे हैं, लेकिन पुलिस की कार्रवाई करने में रूह कांप रही है।
एक स्थानीय और विशेष वर्ग से ताल्लुक रखने वाला कथित वसूली एजेंट ट्रांसपोर्टरों से जमकर वसूली कर रहा है पूर्व मे भी पटेवा मे उगाही की मशहूर दास्तान उसने बनाई थी । उगाही न देने वालों को सबक सिखाने की धमकियां दी जा रही हैं ताकि अपने 'आकाओं' की झोली भरी जा सके।
अब सवाल है की विभाग की साख गिर रही है, क्या कप्तान जागेंगे?
खाकी की छवि अब रक्षक की नहीं, बल्कि 'ब्लैकमेलर' और 'चंदाखोरों' की बनती जा रही है। जिले की जनता यह पूछ रही है कि क्या कप्तान साहब को जमीनी हकीकत का पता है? क्या उन्हें मालूम है कि उनके नाम पर कौन-कौन अपनी तिजोरियां भर रहा है?
उम्मीद है कि यह समाचार उन बंद कमरों तक पहुंचेगा जहाँ नीतियां बनती हैं। वक्त आ गया है कि कप्तान साहब इन 'दरबारियों' के घेरे से बाहर निकलें और देखें कि कार्यवाही पुराने नामी गुंडों पर हो रही है या सिर्फ ईगो सैटिस्फाई करने के लिए बेगुनाहों को बलि का बकरा बनाया जा रहा है।
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