बसना : 30 साल से न्याय का इंतजार, फर्जी अनुकंपा नियुक्ति का आरोप असली हकदार आज भी भटक रहा
बसना विकासखंड के शासकीय प्राथमिक शाला गौरटेक में पदस्थ प्रधान पाठक की अनुकंपा नियुक्ति से जुड़ा 30 साल पुराना मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। आरोप है कि नियमों को ताक पर रखकर फर्जी दस्तावेजों के सहारे नौकरी हासिल की गई, जबकि असली हकदार आज भी न्याय के लिए दर-दर भटक रहा है। हैरानी की बात यह है कि इतने बड़े गंभीर मामले में भी शासन-प्रशासन की उदासीनता लगातार सवालों के घेरे में है।
मामला वर्ष 1991 का है जब अविभाजित मध्यप्रदेश के सरायपाली विकासखंड के चकरदा स्कूल में पदस्थ शिक्षक कन्हैया लाल चौहान निवासी नूनपानी सरायपाली का आकस्मिक निधन फरवरी 1991 में हो गया। नियमानुसार उनके आश्रितों को अनुकंपा नियुक्ति मिलनी थी, लेकिन उस समय उनका पुत्र प्रेमसागर चौहान मात्र ढाई वर्ष का था।
आरोप है कि इसी का फायदा उठाकर सिंघनपुर बसना निवासी संतलाल मुखर्जी ने मृतक शिक्षक कन्हैया लाल चौहान की पत्नी रुकमणी चौहान को पेंशन आदि दिलाने का बहाना बनाकर कई कागजातों में हस्ताक्षर करवा लिए, और बाद में स्वयं को रिश्तेदार बताकर फर्जी दस्तावेजों के आधार पर सहायक शिक्षक की नौकरी हासिल कर ली।
जब मृतक शिक्षक की मां कर्मायत बाई को इसकी जानकारी मिली तो उन्होंने 1995 में लोक शिक्षण संचालनालय रायपुर में आवेदन कर न्याय की लड़ाई शुरू की। बहू रुकमणी चौहान के घर छोड़कर चले जाने के बाद छोटे से पोते प्रेमसागर चौहान की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई।
गरीबी और अभाव के बीच उन्होंने दूसरों के घरों में बर्तन मांजकर पोते का पालन-पोषण किया और केस लड़ने के लिए अपनी जमीन तक बेच दी। बड़ी विडंबना है कि कर्मायत बाई आज वृद्ध हो चुकी हैं, पोता जवान हो गया है और बहू दर-दर की ठोकरें खा रही है। इसके बावजूद तीन दशक बीत जाने के बाद भी न जांच पूरी हुई, न दोषियों पर कार्रवाई हुई।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस मामले में शुरू से ही अनियमितताओं के आरोप लगते रहे, उसमें जिम्मेदार अधिकारियों ने आखिर क्यों समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए? फाइलें सालों तक दफ्तरों में दबती रहीं और सिस्टम तमाशबीन बना रहा। उधर आरोपी शिक्षक का करियर लगातार ऊंचाई छूता रहा। सहायक शिक्षक से लेकर प्रधान पाठक और संकुल समन्वयक तक पदोन्नति मिलना इस बात का संकेत है कि व्यवस्था में कहीं न कहीं गंभीर लापरवाही या संरक्षण मिला।
मामले में तब नया मोड़ आया जब सामाजिक कार्यकर्ता फिरोज खान ने सूचना के अधिकार के तहत दस्तावेज निकाले। इनमें नियुक्ति प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताओं के संकेत मिले। इस पर 14 अक्टूबर 2025 को कलेक्टर महासमुंद को शिकायत दी गई लेकिन महीनों तक कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद पुनः 20 जनवरी 2026 को महासमुंद जनदर्शन में आवेदन दिया गया तब जाकर 13 मार्च 2026 को जिला शिक्षा अधिकारी ने बसना विकासखंड शिक्षा अधिकारी बद्रीविशाल जोल्हे को जांच अधिकारी नियुक्त कर जांच के आदेश दिए।
हालांकि यहां भी प्रशासनिक सुस्ती साफ नजर आई। पांच दिन में रिपोर्ट देने के निर्देश के बावजूद एक माह बीत जाने पर भी जांच आगे नहीं बढ़ी। आखिरकार विकासखंड शिक्षा अधिकारी ने आरोपी शिक्षक संतराम मुखर्जी और पीड़ित पक्ष हेमसागर तथा रुकमणी चौहान को 24 अप्रैल 2026 को बयान के लिए बुलाया जहां पीड़ित पक्ष समय पर तपती धूप में न्याय की आस में बीईओ कार्यालय पहुंचा, लेकिन जांच अधिकारी ही कार्यालय से नदारद रहे।
अंततः उन्होंने जांच अधिकारी द्वारा तैयार किए गए 11-11 बिंदुओं पर लिखित बयान शपथ पत्र के साथ कार्यालय में जमा कर दिए, जबकि आरोपी शिक्षक संतराम फिर अनुपस्थित रहा। पीड़ित परिवार का आरोप है कि संतलाल मुखर्जी का उनसे कोई पारिवारिक संबंध नहीं है। उसने छल-कपट और फर्जीवाड़ा कर उनके हक की नौकरी हथिया ली है। उसे तत्काल शिक्षक की नौकरी से बर्खास्त कर कानूनी कार्रवाई की जाए। साथ ही उनका कहना है कि यदि समय रहते निष्पक्ष जांच होती, तो उन्हें वर्षों तक न्याय के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ता।
मामले में विकासखंड शिक्षा अधिकारी बद्रीविशाल जोल्हे का कहना है कि टीएल बैठक होने के कारण वे कार्यालय में अनुपस्थित रहे। पीड़ित पक्ष का बयान ले लिया गया है, जबकि संतराम मुखर्जी आज अनुपस्थित रहे। अगले दिन उसका बयान लिया जाएगा, फिर दोनों पक्षों के बयान और दस्तावेजों के आधार पर रिपोर्ट तैयार कर जिला शिक्षा अधिकारी को सौंपी दी जाएगी।
तीन दशक तक लंबित यह मामला शासन-प्रशासन की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। क्या जिम्मेदारों की लापरवाही पर भी कार्रवाई होगी, या फिर यह मामला एक बार फिर 30 वर्षों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा यह देखना बाकी है।