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बसना : फुलझर राज में 41 वर्षों से किसानों की पहली पसंद बनी सरना धान

2026 - 27 खरीफ सीजन वर्षा संकट

कम बारिश में भी भरपूर उत्पादन, रोग प्रतिरोधक क्षमता बनी किसानों का भरोसा

छत्तीसगढ़ संदेश | सी. डी. बघेल | बसना।      

फुलझरराज में खरीफ धान सीजन की तैयारियां शुरू होते ही किसानों के बीच इस वर्ष कम बारिश की आशंका सबसे बड़ी चिंता बनकर उभर रही है। मौसम वैज्ञानिकों और ओड़िया पंचांग द्वारा सामान्य से कम वर्षा की संभावना जताए जाने के बाद किसान अब ऐसी धान किस्मों की तलाश में हैं, जो विपरीत मौसम में भी बेहतर उत्पादन दे सके। ऐसे दौर में एक बार फिर सरना धान किसानों की पहली पसंद बनकर सामने आई है। किसानों का कहना है कि कम पानी, तेज गर्मी , अत्यधिक रोग प्रतिरोधक क्षमता और अनिश्चित मौसम के बावजूद सरना धान संतोषजनक उत्पादन देने वाली सबसे भरोसेमंद किस्म मानी जाती है।

धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ के फुलझर राज यानी बसना-सरायपाली क्षेत्र में सरना धान पिछले लगभग 41 वर्षों से किसानों की सबसे लोकप्रिय धान किस्म बनी हुई है। बदलते कृषि दौर, नई उन्नत किस्मों और आधुनिक तकनीकों के बावजूद इसकी स्थिर उत्पादन क्षमता, रोग प्रतिरोधक क्षमता, मजबूत दाना और बाजार मांग ने इसे आज भी किसानों की पहली पसंद बनाए रखा है। क्षेत्र के किसानों का कहना है कि आज तक सरना धान जैसी दीर्घकालीन लोकप्रियता किसी अन्य धान किस्म को नहीं मिली। बीते चार दशकों में सैकड़ों नई किस्में आईं, कुछ वर्षों तक चलीं और धीरे-धीरे विलुप्त होती चली गईं। किसानों के अनुसार क्रांति धान भी लगभग 15 से 20 वर्षों तक ही प्रभाव में रही, जबकि सरना धान पिछले 41 वर्षों से लगातार किसानों की सबसे भरोसेमंद धान किस्म बनी हुई है।  यही कारण है कि आज बसना-सरायपाली क्षेत्र के अधिकांश गांवों में बड़े पैमाने पर इसकी परम्परागत खेती की जाती है। 

बीते एक सप्ताह से कम बारिश की संभावना को देखते हुए किसानों के बीच धान बीज चयन को लेकर लगातार चर्चा चल रही है। किसानों ने बताया कि 1965 की हरित क्रांति के दौर में क्षेत्र में क्रांति धान, 1001, सफरी, भुलाउ, गुरमुटिया और महामाया जैसी किस्मों की खेती बड़े पैमाने पर होती थी। उस समय क्रांति धान अधिक उत्पादन देने वाली प्रमुख फसल थी और देश में खाद्यान्न संकट के दौर में लोगों का पेट भरने में इसकी बड़ी भूमिका रही। मजदूर वर्ग को मेहनताना भी धान के रूप में ही देने का प्रचलन था। हालांकि अधिक ऊंचाई, फसल गिरने और खड़ी बाली रोग की समस्या के कारण किसान परेशान रहने लगे थे। वर्ष 1984-85 तक क्रांति धान का प्रभाव बना रहा, लेकिन इसके बाद सरना धान का दौर शुरू हुआ। जानकारी के अनुसार वर्ष 1985 में आंध्रप्रदेश से विकसित सरना धान का बीज इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर पहुंचा, जहां से इसका प्रसार 1986 - 87 में क्षेत्र में प्रारंभ हुआ। किसानों को 5 किलो वाले मिनी किट बीज वितरित किए गए। कम जोखिम, मजबूत पौधे और कम बारिश में भी बेहतर उत्पादन ने किसानों को तेजी से आकर्षित किया और देखते ही देखते सरना धान 1990 में फुलझर राज की प्रमुख फसल बन गई। विगत 15 से 20 वर्षों के धान उपार्जन आंकड़ों में भी सरना धान की हिस्सेदारी सबसे अधिक रही है। जानकारी के अनुसार कुल धान खरीदी में इसकी हिस्सेदारी लगभग 38 से 43 प्रतिशत तक दर्ज की गई, जो किसानों के अटूट विश्वास को दर्शाती है। कृषि विशेषज्ञों के अनुसार सरना धान की सबसे बड़ी विशेषता इसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता और विपरीत मौसम में टिकाऊ उत्पादन है। इससे निकलने वाला चावल पतला, चमकदार, मुलायम और स्वादिष्ट होता है, जिसकी बाजार में लगातार मांग बनी रहती है। किसानों का कहना है कि सामान्य से कम वर्षा में भी सरना धान की फसल संतोषजनक उत्पादन देती है। इसके पौधे मजबूत होते हैं तथा फसल गिरने की संभावना कम रहती है। कृषि जानकारों के मुताबिक यह मध्यम अवधि में पकने वाली किस्म है, जिससे किसान समय पर कटाई कर अगली रबी फसल की तैयारी आसानी से कर लेते हैं।

सरना धान राइस मिलरों की पहली पसंद

राइस मिलरों के अनुसार लाल सरना धान की मिलिंग रिकवरी भी बेहतर मानी जाती है। इससे औसतन 64 से 68 प्रतिशत चावल तथा 22 से 26 प्रतिशत भूसा प्राप्त होता है। दाना मजबूत होने के कारण मिलिंग में टूटन कम होती है, जिससे व्यापारियों और राइस मिलरों के बीच इसकी मांग बनी रहती है।

सरना धान बनी फुलझर राज के खेती संस्कृति का हिस्सा

फुलझर राज क्षेत्र की मिट्टी और जलवायु भी सरना धान के लिए बेहद अनुकूल मानी जाती है। किसान बताते हैं कि अत्यधिक गर्मी और कम बारिश की स्थिति में भी इसका प्रदर्शन संतोषजनक रहता है। विशेषज्ञों का मानना है कि बदलते मौसम और अनिश्चित वर्षा के दौर में सरना धान किसानों के लिए सबसे सुरक्षित और भरोसेमंद विकल्प बनकर उभरी है। स्वाद, उत्पादन क्षमता और विपरीत परिस्थितियों में भी स्थिर प्रदर्शन के दम पर सरना धान आज फुलझरराज सहित पूरे छत्तीसगढ़ की कृषि संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है।


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