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बसना : सुप्रीम कोर्ट ने कहा 'पिता की निजता से बड़ा है बच्चे की पहचान का अधिकार', चतुर्भुज प्रधान का होगा डीएनए टेस्ट

देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट और बसना सिविल कोर्ट के उस फैसले को सही ठहराया है, जिसमे सच्चाई का पता लगाने के लिए डीएनए टेस्ट का आदेश जारी किया गया है.

दरअसल पूरा मामला बसना थाना अंतर्गत ग्राम पलसापाली से जुड़ा है, जहाँ के निवासी चतुर्भुज प्रधान को अमर प्रधान ने अपना पिता बताते हुए पैतृक संपत्ति में एक-तिहाई (1/3) हिस्सेदारी और बेटे के रूप में पहचान पाने के लिए एक दीवानी मुकदमा दायर किया.

यह मुक़दमा वर्ष 2023 में दायर किया गया, जिनकी ओर बसना के नीरज अग्रवाल बतौर अधिवक्ता इस मामले में पैरवी कर रहे थे. जब इस मामले की सच्चाई का पता लगाने के लिए चतुर्भुज का डीएनए टेस्ट कराये जाने का आदेश दिया गया तो, चतुर्भुज प्रधान ने इन संबंधों को मानने से पूरी तरह इनकार करते हुए दलील दी कि, उन्हें पहले एक बलात्कार धारा 376 IPC के मामले में बरी किया जा चुका है. इसलिए इसकी कोई आवश्यकता नहीं है.

इसके बाद बसना सिविल कोर्ट के इस फैसले के खिलाफ चतुर्भुज प्रधान बिलासपुर छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट पहुँच गए, जहाँ भी यह आदेश दिया गया कि सच्चाई का पता लगाने के लिए चतुर्भुज का डीएनए टेस्ट कराया जाए, क्योंकि इसके अलावा पितृत्व साबित करने का कोई और ठोस जरिया नहीं है.

इसके बाद इस मामले के आदेश को लेकर उसे चुनौती देने चतुर्भुज प्रधान दिल्ली में देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट पहुँच गए, और निचली अदालतों के उस आदेश को चुनौती दी. जहाँ सर्वोच्च न्यायालय में 29 मई 2026 को न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ द्वारा चतुर्भुज की अपील को खारिज कर आदेश दिया कि डीएनए टेस्ट कराया जाए.

चतुर्भुज प्रधान ने इसे 'निजता का अधिकार'  बताते हुए कहा था कि ​उन्हें डीएनए सैंपल देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता और न ही इसकी कोई तत्काल आवश्यकता है.  

चतुर्भुज के अनुसार भारतीय साक्ष्य अधिनियम  के तहत इस चरण में उनके खिलाफ कोई प्रतिकूल अनुमान नहीं लगाया जाना चाहिए, ​चतुर्भुज की दलील थी कि यह सिविल सूट 'प्राङ्न्याय' के सिद्धांत के कारण खारिज होने योग्य है. 'प्राङ्न्याय' को कानून की भाषा में 'रेस-जुडिकाटा' कहा जाता है जिसका मतलब यह होता है कि जिस मामले पर अदालत पहले ही अंतिम फैसला सुना चुकी है, उसे दोबारा नहीं उठाया जा सकता.

वहीँ अमर प्रधान ने दलील दी कि चूंकि चतुर्भुज लगातार पितृत्व से इनकार कर रहे हैं,  इसलिए सच्चाई जानने के लिए डीएनए टेस्ट के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचा है.

दोनों की दलील पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चतुर्भुज का 'निजता का अधिकार'  असीमित या पूर्ण अधिकार नहीं है. पहले के मामले संक्षिप्त प्रकृति के थे, इसलिए यह नया दीवानी मुकदमा 'प्राङ्न्याय' से बाधित नहीं होता है.

​सर्वोच्च न्यायालय ने डीएनए टेस्ट से जुड़े पिछले महत्वपूर्ण फैसलों के सिद्धांतों को रेखांकित किया और कहा कि एक तरफ व्यक्ति की निजता और प्रतिष्ठा है, तो दूसरी तरफ बच्चे का यह जानने का वैध अधिकार है कि उसका जैविक पिता कौन है.

​सर्वोच्च न्यायालय इन कारणों के आधार पर सुनाया फैसला :

​इस मामले में जन्म और संबंधों का समय (जनवरी से सितंबर 1999) मेल खाता है. चतुर्भुज लगातार इनकार कर रहे हैं और रिकॉर्ड पर ऐसा कोई अन्य साक्ष्य नहीं है जो अंतिम निष्कर्ष दे सके.

​पिछले अदालती आदेश किसी पूर्ण मुकदमे (Full-dress trial) के परिणाम नहीं थे. अमर ने अब बालिग होकर अपने हक का मुकदमा किया है, इसलिए पितृत्व का सवाल सीधे तौर पर इस केस का मुख्य हिस्सा है.

सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि यहाँ चतुर्भुज की 'निजता' से ज्यादा बड़ा सवाल अमर के पूरे जीवन के 'अधिकारों और पहचान' का है. यदि डीएनए टेस्ट नहीं होता, तो अमर हमेशा के लिए उन अधिकारों से वंचित रह सकता है जो उसे चतुर्भुज का बेटा होने के नाते मिल सकते हैं.

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि हितों का संतुलन पूरी तरह से अमर के पक्ष में है. निचली अदालतों के फैसले में कोई गलती नहीं है. अपील को खारिज किया जाता है. साथ ही संबंधित सिविल कोर्ट को निर्देश दिया गया कि वह डीएनए टेस्ट के लिए तारीख तय करे और रिपोर्ट आने के बाद दीवानी मुकदमे को आगे बढ़ाए.


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अविनाश नायक

मैं डिजिटल मीडिया विशेषज्ञ और टेक-सैवी पत्रकार हूँ, जो पिछले 9 वर्षों से छत्तीसगढ़ सहित महासमुंद, सरायपाली, बसना और पिथौरा क्षेत्र की स्थानीय खबरों के साथ, देश-विदेश एवं शासकीय योजनायें, रोजगार अथवा बैंकिंग से सम्बंधित समाचार प्रकाशित करता हूँ। पत्रकारिता के साथ-साथ मुझे Windows VPS सर्वर, IIS कॉन्फ़िगरेशन, SQL सर्वर और MVC, .NET, C# जैसी एडवांस तकनीकों का गहरा व्यावहारिक अनुभव है. इसके पूर्व करीब 6 वर्ष तक का मेरा सॉफ्टवेयर, प्रोग्रामर के रूप में अनुभव रहा है.
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