बलौदाबाजार:- वन विभाग में पदस्थ दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों की माली हालत खराब भूखे मरने की स्थिति ,कारण 7 माह से वेतन नही मिलने का।
बलौदाबाजार जिले के अंर्तगत बार अभ्यारण्य क्षेत्र में पदस्थ दैनिक वेतन भोगी सैकड़ो कर्मचारियों के सामने अब भूखे मरने की भयावह स्थिति आ गई है।इनको विगत सात माह से वेतन नही मिला है।आज की स्थिति बार मे देखा जाय तो शासकीय कर्मचारी की कमी है और दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों का जंगल सुरक्षा में अहम योगदान है।
इसके बावजूद आज प्रशासन इनको अनदेखी कर इनके भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रही है।जिससे कर्मचारियों में आक्रोश है।दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी के अध्यक्ष श्री जितेंद यादव ने हमारे संवाददाता को बताया कि हमको हमारा परिवार का भरण पोषण करना मुश्किल हो रहा है।हमारे बच्चों को पढ़ाई में और साथ मे यदि परिवार के सदस्य का तबियत खराब हो जाय तो इलाज करा पाना मुश्किल है। हम 24 घंटे ड्यूटी पर तैनात रहने के बावजूद सरकार हमारे और हमारे परिवार के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रही है, हमने उप वनमंडलाधिकारी लखन सिन्हा के सामने बात रखी तो ,हमारे साथ बात भी सही ढंग से नही किया और कह दिया वेतन नही मिल रहा है छोड़ दो नोकरी ,हमारे साथ इस ढंग से ब्यवहार किया जाता है,।
जितेंद्र यादव ने बताया कि इस क्षेत्र में लाखों करोड़ों का काम विभाग में आता है,जैसे पुल पुलिया निर्माण सड़क निर्माण ,चारागाह के लिए व के काम आते है,जिसमे विभाग द्वारा गुणवत्ता विहीन निर्माण कार्य किया जाता है जिसकी जांच की किया जाय तो कई अधिकारी पर गाज गिर सकती है , और इन लोगो को समय मे वेतन मिलता है, हम लोग का वेतन भी कम रहता है और पूरी ईमानदारी से कम करते है फिर भी समय पर वेतन नही मिल रहा है।ऊपर से अधिकारियों का अड़ियल रुख ।
यदि हम लोगो ने हमारे रेंजर से वेतन के सम्बंध में बात की तो बताया कि पहले sdo के पास बात करो ,उसके बाद कलेक्टर के पास जाना,अभी लखन सिन्हा का तबादला हो गया है,इनके जगह पे नया sdo आये हुए है ,उनसे बात करके देखते है,यदि समाधान नहीं हो तो सीधा कलेक्टर के पास गुहार लगाएंगे, और वहां भी बात नही बनी तो मंत्रालय में धरना प्रदर्शन करेंगे, ये बात दैनिक वेतन भोगी कर्मचारी के अध्यक्ष जितेंद्र यादव ने बताई।
जंगल की सुरक्षा का दायित्व हमारे ऊपर है,विभाग के कर्मचारी केवल निर्माण कार्य मे ज्यादा ध्यान देते है क्योंकि उसमें ज्यादा पैसा कमाने को मिलता है,कई काम है,जिस पुलिया का निर्माण कार्य मे 2 लाख लगता है ,उस पुलिया निर्माण को 1 लाख में बना दिया जाता है,और बचत राशि का बंदरबाट किया जाता है ।
क्या कहे हम जो ठहरे छोटे कर्मचारी,ज्यादा कुछ कहेंगे तो सीधा नोकरी से निकले जाने का डर उस कर्मचारी से कहा यहां का मामला सब जानते है, नेता लोग आते है ये अधिकारी उन्ही के लिए कमा रहे ,सारा कमाई उन्ही के आव भाव करने में खत्म हो जाता है,बार मे जितने भी रेंजर आते है वो तो यही कहते है,हर समय आज फलाना मंत्री आ रहा है तो कभी उसके नजदीक के ब्यक्ति उनके आदर सम्मान में खर्च करना पड़ता है,और कहा से करे विभागीय काम करवा कर बचत कर कर्तव्य है तो गुणवत्ता कार्य मे कैसे आवेगा। दैनिक वेतन भोगी कर्ममचरियो का रुपये नही आया है तो हम क्या करे। इसी प्रकार दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों का बुरा हाल है।