हंसी, हंगामा और स्टार्स की फौज, जानिए कैसी है फिल्म कैसी है ... - CG Sandesh

हंसी, हंगामा और स्टार्स की फौज, जानिए कैसी है फिल्म कैसी है फिल्म वेलकम टू द जंगल

डेस्क। बॉलीवुड में मल्टीस्टारर फिल्में बहुत बनती हैं लेकिन कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जिनका पोस्टर देखकर ही दिमाग कहता है- 'इतने लोग एक फिल्म में हैं या कोई अवॉर्ड फंक्शन चल रहा है?' 'वेलकम टू द जंगल' ठीक वैसी ही फिल्म है। अक्षय कुमार से लेकर सुनील शेट्टी, परेश रावल, जॉनी लीवर, राजपाल यादव, अरशद वारसी, जैकी श्रॉफ और ना जाने कितने चेहरे, इतनी लंबी स्टारकास्ट देखकर लगता है निर्माताओं ने कास्टिंग डायरेक्टर से बोल दिया होगा, 'जो सामने दिखे, सबको साइन कर लो।'

लेकिन मजे की बात यह है कि फिल्म सिर्फ भीड़ इकट्ठा नहीं करती है। हैरानी की बात यह है कि ये पूरी टोली सचमुच काम भी करती है। कई जगह आप सिर पकड़ेंगे, कई जगह जोर से हंसेंगे और दो घंटे पैंतालीस मिनट बाद यही सोचेंगे, 'ठीक है, मजा तो आया।'

कहानी
कहानी एक ऐसे रईस आदमी (जाकिर हुसैन) से शुरू होती है जिसके सिर पर आयकर विभाग की तलवार लटक रही है। समाधान निकलता है कि दो हजार करोड़ रुपये ऐसी फिल्म में झोंक दो जो इतनी खराब बने कि पैसा डूब जाए और हिसाब भी साफ हो जाए। अब यहां से जो प्लानिंग बनती है, वही असली कॉमेडी है। बेटी (जैकलीन फर्नांडिस) खुद निर्माता बनती है और समझदारी दिखाते हुए खुद को नायिका भी बना लेती है जिससे फिल्म के डूबने की संभावना 100 प्रतिशत रहे।

फिर टीम तैयार होती है। फ्लॉप निर्देशक (परेश रावल और राजपाल यादव), एक ऐसा सुपरस्टार (अक्षय कुमार) जिसका करियर ऑक्सीजन पर चल रहा है, उसकी पुरानी प्रेमिका (दिशा पाटनी) , दो डॉन (अरशद वारसी और सुनील शेट्टी), कुछ सनकी लोग और बाकी पूरा चलता-फिरता पागलखाना। फिल्म सेना की पृष्ठभूमि पर है, ऐसे में सबको ट्रेनिंग देने के लिए एक ऐसी महिला प्रशिक्षक (लारा दत्ता) लाई जाती है जिसे देखकर साफ लगता है कि मुस्कुराना उनकी जीवन नीति के खिलाफ है।

मामला तब उलझता है जब शूटिंग के लिए पूरी टीम जंगल पहुंचती है लेकिन वहां आतंकियों (जैकी श्रॉफ और उनकी टीम) ने कब्जा कर रखा है और वह इस फिल्म यूनिट को असली सेना समझ बैठते हैं। अब जिन लोगों को कैमरे के सामने एक्टिंग करनी थी, उन्हें असली गोलियों के बीच जान बचानी पड़ती है। यहीं से फिल्म ऐसी पटरी पकड़ती है जहां समझदारी, तर्क और गंभीरता तीनों हाथ जोड़कर किनारे खड़े हो जाते हैं, जबकि पर्दे पर सिर्फ पागलपन का राज शुरू हो जाता है।

एक्टिंग
अक्षय कुमार को देखकर पहली बात यही दिमाग में आती है, इस आदमी को कॉमेडी करते देखना अभी भी उतना ही मजेदार है जितना कई साल पहले था। वह यहां पूरी फिल्म का इंजन हैं। बाकी लोग इधर-उधर घूम रहे हैं, शोर मचा रहे हैं लेकिन गाड़ी आखिर चलाते वही हैं। सुनील शेट्टी और परेश रावल के साथ आते ही वही पुरानी केमिस्ट्री लौट आती है जिसने कभी इस तरह की फिल्मों को यादगार बनाया था। जॉनी लीवर एक बार फिर साबित करते हैं कि कई साल का अनुभव जब कॉमेडी में उतरता है तो छोटे-छोटे सीन्स भी याद रह जाते हैं। राजपाल यादव, श्रेयस तलपड़े, तुषार कपूर, आफताब शिवदासानी, कृष्णा अभिषेक, किकू शारदा, सब अपनी तरफ से पूरा हंगामा करते हैं। लेकिन सबसे प्यारा सरप्राइज फरीदा जलाल हैं। बिना झिझक कह सकते हैं कि कई जगह उन्होंने बाकी कलाकारों से ज्यादा हंसी बटोरी है। उम्र अनुभव देती है और यहां पर वह साफ दिखता है।

जैकी श्रॉफ अपने अंदाज में हमेशा की तरह प्रभाव डालते हैं लेकिन उनका किरदार थोड़ा और मजबूती से लिखा जाता तो मजा दोगुना हो सकता था। रवीना टंडन, लारा दत्ता, जैकलीन फर्नांडिस और दिशा पाटनी इस पूरे सिनेमाई बवाल में ग्लैमर का तड़का लगाती हैं। हालांकि कहानी ने इस बार पूरा भरोसा कॉमेडी ब्रिगेड पर ही रखा है। बाकी किरण कुमार, सुदेश बेरी, पुनीत इस्सर, फिरोज खान, शरद सक्सेना और दिवंगत पंकज धीर जैसे कलाकारों को पर्दे पर देखकर पुरानी हिंदी फिल्मों वाला वही देसी स्वाद वापस लौट आता है, जो आजकल कम ही देखने को मिलता है।

निर्देशन
अहमद खान ने यहां बिल्कुल वही किया जो उन्हें करना चाहिए था। कुछ भी गंभीर बनाने की कोशिश नहीं की। अच्छी बात यह रही कि फिल्म ने खुद को जरूरत से ज्यादा समझदार साबित करने की गलती नहीं की, वरना यह सारा तमाशा आधे रास्ते में ही ठप हो जाता। निर्देशक ने साफ तय किया कि यहां सिर्फ पागलपन बेचना है और उन्होंने वही किया। हर सीन बड़ा है, हर रिएक्शन जरूरत से ज्यादा है। हर कैरेक्टर सामान्य इंसान की तरह बिहेव करना भूल चुका है। मजेदार बात यह है कि यही फिल्म को एंटरटेनिंग बनाता है।

स्क्रीनप्ले
फिल्म का पहला हिस्सा इतनी तेजी से निकलता है कि लंबाई महसूस ही नहीं होती। सिचुएशन लगातार बदलती रहती हैं और इंटरवल तक फिल्म पकड़ बनाए रखती है। दूसरा हिस्सा आते-आते फिल्म की रफ्तार थोड़ी लड़खड़ा जाती है। कुछ सीन्स इतने आराम से चलते हैं कि लगा कहानी ने अचानक चाय पीने का ब्रेक ले लिया है। हालांकि आखिरी आधा घंटा आते-आते फिल्म अचानक फिर वही पुरानी रफ्तार पकड़ लेती है। उसके बाद पर्दे पर ऐसा सिनेमाई हंगामा शुरू होता है कि दूसरे पार्ट की सारी शिकायतें कुछ देर के लिए पीछे छूट जाती हैं।

म्यूजिक
फिल्म का म्यूजिक कहानी की तरह ही पूरी तरह मसालेदार रखा गया है। टाइटल ट्रैक और पुराने पॉपुलर गाने 'ऊंचा लंबा कद' के नए वर्जन में नॉस्टैल्जिया फैक्टर जरूर काम करता है। ‘दीवाने हैं…’ जैसे गाने पर्दे पर रंग भरते हैं और विजुअल्स की वजह से ध्यान खींचते हैं। हालांकि सच कहा जाए तो फिल्म का कोई भी गीत ऐसा नहीं बनता जो थिएटर से बाहर निकलने के बाद लंबे समय तक जुबान पर टिका रहे।

पॉजिटिव प्वाइंट
सबसे राहत की बात यह है कि फिल्म कभी खुद को गंभीर साबित करने की गलती नहीं करती। यह शुरू से जानती है कि उसका काम सिर्फ दर्शकों को हंसाना है। वह पूरे कॉन्फिडेंस के साथ वही करती भी है। फिल्म में बॉलीवुड पर तंज भी है। यह फिल्म इंडस्ट्री का मजाक उड़ाने वाली पैरोडी भी है, आजकल की पीढ़ी को पसंद आने वाले मीम्स जैसे पल भी इसमें हैं। ऊपर से डायलॉग ऐसे कि कई जगह हंसी अपने आप निकल जाती है।

नेगेटिव प्वाइंट
फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी इसका सेना वाला बैकड्रॉप है। पूरी कहानी जहां बेफिक्र कॉमेडी पर चल रही होती है, वहीं सेना और आतंकवाद वाला ट्रैक कई जगह जबरदस्ती डाला गया महसूस होता है। साथ ही फिल्म का दूसरा हिस्सा साफ तौर पर लंबा महसूस होता है। कुछ सीन्स ऐसे हैं जहां हंसी निकलने के बजाय आप बस स्क्रीन देखकर सोचते हैं, 'अच्छा तो अब ये भी होगा?' सच कहे तो इतने कलाकारों में से कुछ लोग ऐसे लगते हैं जैसे मुकेश तिवारी, यशपाल शर्मा जिन्हें शायद सिर्फ इसलिए रखा गया ताकि पोस्टर देखकर ऑडियंस कहे कि 'अरे ये भी है इसमें?'

देखें या नहीं
अगर आप हर फिल्म में तर्क ढूंढते हैं तो कृपया घर पर रहिए। यह फिल्म आपके धैर्य की परीक्षा ले सकती है। लेकिन अगर आप सिर्फ पॉपकॉर्न के साथ पूरा हंगामा, बेफिक्र कॉमेडी और बिना दिमाग लगाए मनोरंजन चाहते हैं, तो यह फिल्म आपका काम कर देगी। ‘वेलकम टू द जंगल’ बिल्कुल वैसी फिल्म है जहां पर्दे पर क्या चल रहा है यह समझना जरूरी नहीं होता, जरूरी बस इतना होता है कि आप हंस रहे हैं या नहीं। अच्छी बात यह है कि ज्यादातर समय जवाब ‘हां’ में मिलता है।


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