महासमुंद : 551 ग्राम पंचायतों में जल संरक्षण संरचनाओं का निर्माण, पहली बारिश में 31 करोड़ लीटर जल भंडारण की क्षमता विकसित
551 ग्राम पंचायतों में जल संरक्षण संरचनाओं का निर्माण, पहली बारिश में 31 करोड़ लीटर जल भंडारण की क्षमता विकसित
महासमुंद। जिले में भू-जल स्तर बढ़ाने और वर्षा जल के अधिकतम संरक्षण के उद्देश्य से जिला प्रशासन द्वारा 'मोर गांव मोर पानी अभियान 2.0' एवं महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के प्रभावी समन्वय से व्यापक स्तर पर जल संरक्षण एवं संवर्धन के कार्य किए गए हैं। इन प्रयासों से महासमुंद जिले में जल संरक्षण को नई दिशा मिली है।
जिला कलेक्टर विनय कुमार लंगेह के मार्गदर्शन में जिले की सभी 551 ग्राम पंचायतों में जनभागीदारी के साथ भू-जल संवर्धन एवं प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन से जुड़े कार्यों को प्राथमिकता दी गई। अभियान के तहत बोरी बंधान, डब्ल्यू.ए.टी., एस.सी.टी., प्रधानमंत्री आवासों में सोख्ता गड्ढे, 5 प्रतिशत मॉडल, ब्रश वुड जैसी लघु जल संरक्षण संरचनाओं का निर्माण कराया गया। वहीं मनरेगा के माध्यम से गेबियन, एल.बी.सी.डी., डाइक, आजीविका डबरी, नवा तरिया, जल अवशोषण खंती, सतत कंटूर ट्रेंच, कुएं निर्माण, रेन वॉटर हार्वेस्टिंग एवं बोरवेल रिचार्ज जैसे कार्यों को प्राथमिकता से स्वीकृत एवं क्रियान्वित किया गया।
मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत हेमंत नंदनवार के मार्गदर्शन में एक ही वित्तीय वर्ष में 36 हजार जल अवशोषण खंतियां, 8,200 स्टैगर्ड ट्रेंच, 30 हजार सतत कंटूर ट्रेंच, 51 डाइक, 52 गेबियन, 800 आजीविका डबरी सहित विभिन्न जल संरक्षण कार्य पूर्ण किए गए। मानसून की पहली ही बारिश में इन सभी संरचनाओं में पर्याप्त जल भराव हो गया, जिससे वर्षा जल का अपव्यय रुककर उसका भू-जल में पुनर्भरण सुनिश्चित हो रहा है।
इन सभी जल संरक्षण संरचनाओं के माध्यम से जिले में लगभग 31 करोड़ लीटर पानी के एकमुश्त भंडारण की क्षमता विकसित हुई है, जिससे आने वाले समय में भू-जल स्तर में उल्लेखनीय सुधार होने की उम्मीद है।
मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत हेमंत नंदनवार ने कहा कि जिले की 551 ग्राम पंचायतों में जल संकट की समस्या के स्थायी समाधान के लिए मोर गांव मोर पानी अभियान 2.0 एवं महात्मा गांधी मनरेगा के माध्यम से जल संरक्षण एवं संवर्धन के कार्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है। उन्होंने कहा कि मानसून की पहली बारिश से इन संरचनाओं में जल भराव होना इस अभियान की सफलता का प्रमाण है तथा यह भू-जल पुनर्भरण की दिशा में मील का पत्थर सिद्ध होगा