धान के खेतों में मकड़ी के जालों की चादर, किसान हैरान - CG Sandesh

धान के खेतों में मकड़ी के जालों की चादर, किसान हैरान

  • सुबह ओस पड़ते ही धान की ऊपरी पत्तियों के बीच चमकने लगते हैं महीन जाले,
  • दूर से खेत का बदला नजर आता है नजारा
  • मकड़ियां फसल की दुश्मन नहीं, बल्कि कई हानिकारक कीटों की प्राकृतिक शिकारी
  • बिना जरूरत कीटनाशक छिड़काव से बचने की सलाह        
बसना अंचल के धान के खेतों में इन दिनों एक अलग ही नजारा देखने को मिल रहा है। धान की फसल के ऊपरी हिस्से में जगह-जगह मकड़ियों ने महीन जाले बुन रखे हैं। सुबह के समय जब जालों पर ओस की बूंदें पड़ती हैं तो पूरा खेत सफेद चमकती महीन जालियों से ढका हुआ दिखाई देता है। दूर से देखने पर ऐसा लगता है मानो धान की हरी फसल के ऊपर किसी ने जाल की चादर बिछा दी हो। खेतों में मकड़ियों की इस तरह बढ़ी गतिविधि को देखकर किसान इसके कारण और फसल पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर उत्सुक भी हैं और चिंतित भी।

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार धान की पत्तियों के बीच दिखाई देने वाले ये जाले अपने आप में धान का कोई रोग नहीं हैं। मकड़ियां सामान्यतः धान के पौधों को नुकसान पहुंचाने वाली नहीं होतीं, बल्कि वे खेत में मौजूद अनेक हानिकारक कीटों का शिकार करती हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अनुसार धान के खेतों में मकड़ियां महत्वपूर्ण प्राकृतिक शत्रुओं में शामिल हैं और विशेष रूप से प्लांट हॉपर जैसे कीटों को नियंत्रित करने में भूमिका निभाती हैं। 

एक अध्ययन में धान के खेतों में प्राकृतिक शत्रुओं की आबादी में मकड़ियों की महत्वपूर्ण हिस्सेदारी बताई गई है। विशेषज्ञों के मुताबिक खेत में मकड़ियों की संख्या बढ़ने के पीछे मौसम और खेत की परिस्थितियां महत्वपूर्ण हो सकती हैं। धान की फसल जब घनी होकर ऊंचाई पकड़ती है तो पौधों के बीच मकड़ियों को जाला बनाने के लिए पर्याप्त सहारा मिलता है। 

खेत में नमी और हवा में उमस के साथ-साथ छोटे-छोटे कीटों की उपलब्धता भी मकड़ियों को खेत में टिके रहने के लिए अनुकूल वातावरण उपलब्ध करा सकती है। खासकर सुबह की ओस जालों को अधिक स्पष्ट कर देती है, जिससे एक ही खेत में बड़ी संख्या में जाले दिखाई देने लगते हैं। किसानों के लिए राहत की बात यह है कि केवल जाले दिखाई देने के कारण धान की फसल को नुकसान होने की आशंका नहीं मानी जानी चाहिए। उलटे मकड़ियां खेत में मौजूद कई हानिकारक कीटों की संख्या कम करने में प्राकृतिक रूप से मदद करती हैं। भारतीय चावल अनुसंधान संस्थान भी धान में प्राकृतिक शत्रुओं के संरक्षण और पर्यावरण आधारित कीट प्रबंधन को महत्वपूर्ण मानता है। 

कृषि विशेषज्ञों ने किसानों को सलाह दी है कि मकड़ी के जाले देखकर घबराकर तत्काल कीटनाशक का छिड़काव न करें। अनावश्यक कीटनाशक से मकड़ियों सहित खेत में मौजूद दूसरे लाभकारी जीव भी प्रभावित हो सकते हैं। आईसीएआर के एकीकृत कीट प्रबंधन सिद्धांत में भी आवश्यकता के अनुसार ही कीट नियंत्रण उपाय अपनाने और प्राकृतिक शत्रुओं के संरक्षण पर जोर दिया गया है। हालांकि किसानों को जालों के साथ धान की पत्तियों और बालियों की भी नियमित निगरानी करनी चाहिए। 

यदि जालों के साथ हानिकारक कीटों की संख्या बढ़ी हुई दिखाई दे, पत्तियां क्षतिग्रस्त हों या पौधों में किसी अन्य प्रकार के रोग अथवा नुकसान के लक्षण नजर आएं तो कृषि विभाग या कृषि विशेषज्ञ से फसल की जांच करानी चाहिए। बिना रोग या कीट की पहचान किए दवा का छिड़काव करने के बजाय पहले कारण की पुष्टि और फिर जरूरत के अनुसार उपचार करना ही फसल और किसान दोनों के हित में है।


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सी. डी. बघेल

वरिष्ठ पत्रकार सी.डी. बघेल जी को पत्रकारिता के क्षेत्र में 35 से अधिक वर्षों का लंबा और गौरवशाली अनुभव है। 1990 के दौर से लगातार निष्पक्ष एवं खोजी पत्रकारिता कर रहे सी.डी. बघेल जी बसना एवं पिथौरा क्षेत्र के स्थानीय मुद्दों और आम जनता के हक की आवाज़ को जमीनी स्तर से उठाने के लिए जाने जाते हैं। तीन दशकों से अधिक की विश्वसनीय रिपोर्टिंग के जरिए उन्होंने पाठकों के बीच एक अटूट विश्वास कमाया है। संपर्क: +91 99770 03756
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