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बसना : चांदनी रात में गूंजे जयकारे, मामा-भांचा पहाड़ पर आस्था का दिव्य मेला संपन्न

  • प्राकृतिक संपदा, जड़ी-बूटियों और प्राचीन धार्मिक मान्यताओं की अनमोल विरासत समेटे है पर्वत
  • संरक्षण और पर्यटन विकास की वर्षों पुरानी मांग अब भी अधूरी
शरद पूर्णिमा की उजली चांदनी, विशाल चट्टानों के बीच गूंजते जयकारे, पहाड़ी की प्राकृतिक छटा और सदियों पुरानी धार्मिक मान्यताओं का संगम। बसना अंचल में स्थित मामा-भांचा पहाड़ पर रविवार, 25 अक्टूबर 2026 को लगा दिव्य मेला श्रद्धा, रोमांच और लोकसंस्कृति की यादगार छाप छोड़ गया। प्रकृति की गोद में बसी यह धरोहर एक बार फिर हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बनी, लेकिन इसके साथ ही संरक्षण और पर्यटन विकास की उपेक्षित संभावनाएं भी चर्चा में रहीं।

भंवरपुर से लगभग आठ किलोमीटर दूर संतपाली, खोकसा तथा सागरपाली-जमदरहा मार्ग के आसपास स्थित मामा-भांचा पर्वत की तलहटी में सुबह से ही दर्शनार्थियों का पहुंचना शुरू हो गया था। पर्वत के तलहटी स्थित जलाशय में स्नान के बाद श्रद्धालुओं ने श्री मामा मंदिर, भांचा मंदिर, शिव मंदिर, ऋषि सरोवर, मुनि गुफा, भीम बांध, वराह शीला, बारस पीपड़ और भभूत भंडार सहित विभिन्न धार्मिक स्थलों के दर्शन किए। लंबी सुरंग और विशाल चट्टानों के बीच से गुजरने का अनुभव लोगों के लिए रोमांचकारी रहा। 

रात में चांदनी फैलने के साथ ही पर्वत पर श्रद्धालुओं के जयकारे गूंजते रहे। मामा-भांचा पहाड़ केवल धार्मिक आस्था का स्थल नहीं, बल्कि इस अंचल की प्राकृतिक संपदा और पारंपरिक लोकज्ञान से जुड़ी विरासत भी है। पहाड़ी भूभाग, चट्टानें, जलस्रोत, पेड़-पौधे और वनस्पतियां इसकी विशिष्ट पहचान बनाते हैं। स्थानीय वन क्षेत्रों में मिलने वाली पारंपरिक जड़ी-बूटियों और औषधीय वनस्पतियों का ज्ञान पीढ़ियों से ग्रामीण जीवन का हिस्सा रहा है। धार्मिक मान्यताओं से जुड़े वृक्षों, गुफाओं और शिलाओं के प्रति श्रद्धा इस स्थान को सांस्कृतिक दृष्टि से विशिष्ट बनाती है। हालांकि, यहां की औषधीय वनस्पतियों की पहचान, वैज्ञानिक अध्ययन और संरक्षण के लिए व्यवस्थित सर्वेक्षण जरूरी है, ताकि प्राकृतिक विरासत को प्रमाणिकता के साथ अगली पीढ़ियों तक पहुंचाया जा सके।

भक्ति के साथ लोकसंस्कृति की छटा

मेले में अखंड भागवत पाठ, यज्ञ, गायत्री महामंत्र जाप और भजन-कीर्तन से वातावरण भक्तिमय बना रहा। नाचा-गम्मत, और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने ग्रामीण लोकजीवन की रंगत बिखेरी। बच्चों के लिए झूले, रहटोली, जादू के खेल और खिलौनों की दुकानों ने मेले को मनोरंजन का केंद्र बनाया। आयोजन समिति ने श्रद्धालुओं और राहगीरों के लिए नि:शुल्क प्रसाद एवं भोजन की व्यवस्था की। भंवरपुर पुलिस चौकी द्वारा सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए थे। संतपाली, पलसाभांडी, लोहड़ीपुर, जमनीडीह और बम्हनीडीह सहित आसपास के गांवों की भागीदारी ने आयोजन को सामुदायिक उत्सव का स्वरूप दिया।

आस्था की धरोहर, संरक्षण का इंतजार

स्थानीय लोगों की मांग है कि मामा-भांचा पहाड़ को ऐतिहासिक एवं प्राकृतिक धरोहर के रूप में पहचान देकर इसके संरक्षण की ठोस पहल की जाए। वर्षों से जनप्रतिनिधियों और शासन-प्रशासन के समक्ष पहुंच मार्ग सुधारने, सुरक्षित सीढ़ियां बनाने, स्वच्छता, पेयजल और अन्य बुनियादी सुविधाएं विकसित करने की मांग उठती रही है। इसके बावजूद स्थानीय लोगों को ठोस पहल का इंतजार है। यदि योजनाबद्ध तरीके से प्राकृतिक संसाधनों, धार्मिक स्थलों, पारंपरिक औषधीय वनस्पतियों और लोकसंस्कृति का संरक्षण किया जाए, तो मामा-भांचा पहाड़ धार्मिक पर्यटन, प्रकृति भ्रमण और स्थानीय रोजगार का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है। जरूरत है कि आस्था से जुड़ी इस अनमोल विरासत को केवल सालाना मेले तक सीमित न रखकर उसके स्थायी विकास की दिशा में कदम बढ़ाए जाएं।


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सी. डी. बघेल

वरिष्ठ पत्रकार सी.डी. बघेल जी को पत्रकारिता के क्षेत्र में 35 से अधिक वर्षों का लंबा और गौरवशाली अनुभव है। 1990 के दौर से लगातार निष्पक्ष एवं खोजी पत्रकारिता कर रहे सी.डी. बघेल जी बसना एवं पिथौरा क्षेत्र के स्थानीय मुद्दों और आम जनता के हक की आवाज़ को जमीनी स्तर से उठाने के लिए जाने जाते हैं। तीन दशकों से अधिक की विश्वसनीय रिपोर्टिंग के जरिए उन्होंने पाठकों के बीच एक अटूट विश्वास कमाया है। संपर्क: +91 99770 03756
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