सैर सपाटे दारू मुर्गा,ये सब बाहुबलियों का गुर्गा। - CG Sandesh

सैर सपाटे दारू मुर्गा,ये सब बाहुबलियों का गुर्गा।

चुनाव का मतलब अब बदल गया।चुनाव में जीत उसकी सुनिश्चित हो जाती, जिस प्रत्याशी के द्वारा जनता को आकर्षित कर सके।मतलब विकाश कार्य कोई मुद्दा नही रह गया।अब जनता ये देखती है कौन प्रत्याशी कितना खर्च करता है । कितना दारू मुर्गा बाट सकता है। आज यदि चुनाव प्रत्याशियों का प्रचार की बात करे तो कितना बढ़िया पोस्टर लगा कर गाड़ियों में प्रचार कर रहे है । हाथ जोड़कर कितना मुस्कराता चेहरा वाला पोस्टर और माईक बाकायदा डीजे साउंड के साथ । कभी कभी ये सब देखकर दुख लगता है,बेचारे प्रत्याशी यदि जनता न मिले तो साउंड रिकार्डिग में जिंदाबाद जिंदाबाद के नारे के साथ अकेले ही गाड़ी ड्राइवर के सहारे प्रचार के निकल पड़ती है।जिन पोस्टर और लेखों में संघर्ष,जुझारू, मिलनसार, कर्मठ,हसमुख बहुमुखी प्रतिभा के धनी प्रत्याशी जन जन का साथ देने वाले और क्षेत्र का विकाश चाहने वाले चुनाव के बाद न जीतने वाले और न ही हारने वाले दोनो ही नजर नही आते।

कहाँ  रहते है पांच साल तक ये प्रतिनिधि अचानक चुनाव के समय बरसाती मेढक की तरह निकल आते है।बरसात खत्म होते ही जैसे मेढकों का पता नही चलता उसी तरह प्रत्याशी भी अपनी राह ले लेते है।जिन ब्यक्तियो को अपने घर के अलावा आसपास की गलियों और गांव तक कि सुध नही लेते वे चुनाव के समय प्रत्याशी बनकर पूरी ताकत झोकते हुए नियम को ताक में रखकर सारी हदें पार कर देते है। इस स्थिति को देखते हुए लोकतंत्र की रीढ़ निष्पक्ष चुनाव के बारे में सोचना नामुनकिन ही है।


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