जनप्रतिनिधियों ने लॉकडाउन के आदेशों को ताक में रखकर टमटोरा सरकारी गेस्ट हाउस में किया जमावड़ा...! सरपंचों को ना अधिकारियों का डर, न पुलिस प्रसाशन का भय...! सारंगढ़ में प्रत्येक नियम सिर्फ आम जनता के लिए..!
ऐसा लगता है कि कोरोना ने लॉक डाउन के बाद अपना प्रकोप बन्द कर दिया है...! शायद सारंगढ़ में बिल्कुल ही नही है तभी तो यहां ग्राम प्रतिनिधि धड़ल्ले से सभा कर रहे हैं, और अधिकारियों को खबर होने के पश्चात भी मूक दर्शक बने मौन सहयोग प्रदान कर रहे हैं।
एक हफ्ते का लॉकडाउन सारंगढ में खत्म हो गया मगर खतरा अभी टला नहीं है। शायद यही वजह है कि लॉकडाउन खोला तो गया है मगर कड़े नियमों के साथ।
इस लॉकडाउन में कई नियम बनाए गए हैं जैसे कि भीड़ इकट्ठा ना हो। जैसे कि कोई भी चार व्यक्ति से अधिक ज्ञापन देने के लिए ना आए। शादियों में अधिकतम 50 व्यक्तियों को मंजूरी मिली है।
मृत्यु होने के पश्चात अंतिम यात्रा में भी अधिकतम 20 लोगों की अनुमति है। उसके लिए भी आपको संबंधित अधिकारी से अनुमति लेनी होगी।
आदेश में दूसरे खंड के 18 भाग में यह भी है किसी भी सामाजिक, राजनैतिक, खेलकूद, मनोरंजन, शैक्षणिक, सांस्कृतिक, धार्मिक गतिविधियां एवं अन्य सामाजिक आयोजन पर प्रतिबंध रहेगा।
यह पूरा आदेश स्वतंत्र भारत के छत्तीसगढ़ राज्य के रायगढ़ जिले में आम नागरिक से लेकर खास तक सबके लिए है।
मगर लगता है कि ख़ास लोगो के लिए अवैधानिक छूट भी है, हम ऐसा क्यों कह रहे हैं, यह आपको हम जो बताने वाले हैं उससे समझ में आ जाएगा।
महामारी काल में आदेशों और नियमों की धज्जियां उड़ाते हुए खुलेआम डंके की चोट पर रायगढ़ जिले के सारंगढ़ ब्लॉक के अंतर्गत ग्राम टमटोरा गेस्ट हाउस में भव्य मीटिंग का आयोजन किया गया। गेस्ट हाउस के बाहर भारी मात्रा में बाइक खड़ी थी। लगभग आधा दर्जन के करीब चार चक्का भी देखने को मिली। यह सारी भीड़ इकट्ठा हुई थी एक संगठन के नव निर्माण के लिए! संगठन के व्हाट्सएप ग्रुप में आज दोपहर 1:00 बजे भारी से भारी संख्या में आने का आह्वान भी किया गया था और लगभग हुआ भी वैसा ही! मौके पर लगभग 100 आदमी जमा हुए थे। नियमों को ताक में रखकर आदमियों के साथ-साथ गाड़ियों का भी मेला लगा था।
यहां के आसपास के गांव के पंच-सरपंच मिलकर एक नए यूनियन का निर्माण कर रहे है। नियम कायदे कानून को ताक में रखकर डंके की चोट पर वहां एक बड़ी सभा का आयोजन हुआ। बताने वाले तो यह भी कहते हैं कि वहां पार्टी का तगड़ा इंतजाम भी था। जिसमें सारी सुविधाएं प्राप्त थी, जो एक वन भोज में होती हैं।
ऐसा नहीं है कि इस मामले की शिकायत लोगों ने नहीं की। कुछ पत्रकारों ने इसकी शिकायत जिले के उच्च अधिकारियों तक की। लेकिन सब ने पल्ला झाड़ लिया। हो सकता है, इसके पीछे एक बड़ी राजनीतिक वजह हो। क्योंकि ज्यादातर सत्ता पक्ष से ही संबंधित सरपंच यहां इकट्ठे हुए थे और एक अधिकारी वह भी सत्ता पक्ष की भीड़ से कैसे पंगे मोल ले ले?
हालांकि इस पूरे कार्यक्रम के लिए अनुमति जैसी कोई भी बात हमें किसी भी सक्षम अधिकारी से तो पता नहीं चली। मगर इस तरह के आयोजन से वह भी खासकर की जब महामारी का माहौल चल रहा हो। ऐसी महामारी जिसका साल भर होने को आया; इलाज तक नहीं मिला। जिसके लिए कड़े नियम कानून बनाए गए हो।
उस समय जनप्रतिनिधियों द्वारा इस तरह आदेश की धज्जियां उड़ाना समाज में गलत संदेश भेजता है और उस पर से शिकायत के बाद भी कोई कार्यवाही ना होना! लोगों का मनोबल भी तोड़ता है। मान लीजिए खुदा-ना-खास्ता इनमें से कोई एक संक्रमित हो और वह वहां उपस्थित बाकी लोगों को संक्रमित कर दें और ये संक्रमित लोग अपने गांव जाकर प्रसाद की तरह इसे बांट दे। इसकी जवाबदारी और जिम्मेदारी कौन लेगा..?