छत्तीसगढ़ ग्रामीण इलाको में आज असली दिवाली - गोवर्धन पूजा क्य... - CG Sandesh

छत्तीसगढ़ ग्रामीण इलाको में आज असली दिवाली - गोवर्धन पूजा क्यों है ख़ास ?

वो जमाना ही अलग था जब दिवाली एक बहुत बड़ी त्यौहार के नाम से लोगो में ना ही सिर्फ चर्चित था बल्कि दिलो दिमाग में जगह बनाये हुए भी था, आज दिवाली का त्यौहार सिर्फ किताबो में ही बेहतर व उल्लास से भरा नजर आता है,

साथ बैठ कर जब बुजुर्गो से दिवाली की बात निकाली जाए तो वे जो बताते है, उसे सुन कर ही अंदाज़ा लगाया जा सकता है की हमारी पीढ़ी दिवाली के मौके पे ही नहीं बल्कि और भी कई त्योहारों में से उत्सव की नीव को पीछे भूलती जा रही है,

और त्योहारों के मामले में भारत कभी पीछे नहीं रहा है, आधुनिक रिवाजो में घुलते लोग काफी कुछ खोते जा रहे है . खैर बात करते है छत्तीसगढ़ के ग्रामीण इलाको में कई सालो से होने वाली परम्परागत दिवाली विधि की.

छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचल में आज के दिन को ही असली दिवाली कहा जाता है, गांवो में आठ दिन पहले ही दिवाली की तयारी मध्य में होती है, गांव के गौरा चौरा में गौरा जगाने का नियम होता है जिसमे हर धरम के व्यक्ति हिस्सा लेते है,

शहरो में जहाँ लक्छमी पूजा मुख्या पूजा होती है वैसी ही ग्रामीण इलाको में हर दिन के हिसाब से अलग अलग देवी देवताओ को पूजा जाता है , लक्ष्मी पूजा ( सुरोति ) के एक दिन पहले खेत या नदी की मिटटी लायी जाती व उसी मिटटी से गांव के गायता ( शीतला पुजारी ) या फिर गांव के मंदिर में उसी मिट्टी से गौरी गौरा की मूर्ति बना कर रखी जाती है,

लक्ष्मी पूजा के दिन, शाम रात तक गांव के बड़े बुजुर्ग व बाकी लोग बाजे गाजे के साथ पुरे गांव को घूमते है इसी दौरान गांव के बाकी लोग अपने घरो से कलश व दिए निकलते है और देखते देखते छोटा सा समूह एक बड़े समूह में तब्दील हो जाता है जिसमे सभी लोग गाने गाते हुए गायता ( शीतला पुजारी के घर ) या मंदिर जाते है. गौरा मूर्तियों को लाने.

मूर्तियों को गांव के गौरा चौरा में स्थापित कर के पूजा विधि की जाती है, व गौरी गौरा की शादी कराई जाती है, पूजा खत्म होने के बाद सभी लोग गौरा जगाने की लोकगीत गाते हुए रात भर साथ में नाचते गाते है  वा अगले दिन गोवर्धन पूजा के दिन गौरा मूर्तियों की विसर्जन की जाती है. 

गोवर्धन पूजा, छत्तीसगढ़ के सभी गांव में सबसे ख़ास है, और हो भी क्यों ना, धान का कटोरा के जाने वाले छत्तीसगढ़ में, गौमाता की विशेष स्थान है,  पहले जहाँ दिवाली के मौके में हर जाट धर्म के लोग बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते थे साथ में त्यौहार मनाते थे आज यही चीजे कम हो गयी है जिसका कारण है आपसी एकता की कमी. 

गांवो में गोवर्धन पूजा के दिन सारे गाय बैलो की सुबह से तिलक दिया कर के, उन्हें सुव्यस्थित तरीके से भोजन कराया जाता है,  व गांव के चरवाहे फिर इन्हे एकत्रित करते है, शाम को एक बैल या बछरू की पूजा की जाती है जिसे साहड़ा पूजा भी कहते है,  पूजा के बाद सारे गायो को छोर दिया जाता है, और छूटने पर गाय अपने अपने घरो में वापस आ जाते है. 

पुरे गांव को लोग इसके बाद खाने की तैयारी वा अपने आस पास मिस्ठान वितरित करते है, दियो के बत्तियों पर समय समय पर ध्यान दिया जाता है, बच्चे, बूढ़े, महिलाये सभी एक साथ अपने आँगन में फटाके फोड़ते हुए नजर आते हैं।  हालाँकि कई लोगो की शिकायत होती है की व कुछ लोग त्यौहार में दुरी बना कर चलते है इसकी वजह यह भी है की  लोगो को सब पता होते हुए भी वे उन नियम और प्रथा को नहीं दोहराना चाहते जिनसे आपसी मतभेद खत्म हो.  शिवाय इसके कई बुरी प्रथा पर लोग जरूर जाते जहा उनकी आधुनिकता पर सवाल खुद नहीं उठाते.

शहर की एक बड़ी भीड़ त्यौहार में गांव की तरफ जाते है, और गांवो में अपनों को इस मौके में रोकने का एक और उपाय मिला गांव में मनोरंजन के लिए सांस्कृतिक कार्यक्रम चालु करवाए गए, यह उपाय बहुउद्देशीय था,  साहड़ा पूजा, मातर पूजा जैसी चीजों के बारे में नई पीढ़ियों को जरूर बताये व इन्हे इनसे अवगत कराये क्योकि  आज दिवाली का त्यौहार सिर्फ किताबो में ही बेहतर व उल्लास से भरा नजर आता है.


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