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समिति प्रबंधकों की मनमानी..कोचियों पर मेहरबानी..किसानों की बनी परेशानी....! धान मंडियों में खुलकर लूटा रहे अन्नदाता..!

रायगढ़ जिले के जिला कलेक्ट्रेट में 29 जनवरी की शाम आम दिनों से हटकर कुछ अलग नजारा दिखा। यहां एक किसान ट्रैक्टर में धान भरी ट्रॉली को लेकर कलेक्ट्रेट के सामने खड़ा था। पूछने पर बताया कि सरकार द्वारा उसका धान नहीं खरीदे जाने कारण वह जिला कलेक्ट्रेट के सामने खड़ा था।

किसान का नाम सुधीर कुमार गुप्ता है। वह कोतरलिया का रहने वाला है। सुधीर ने बताया वह अपने पिता श्याम कुमार गुप्ता के साथ 25 जनवरी को कोतरलिया के तारपाली सोसाइटी में धान बेचने के लिए गए थे। जहां दोपहर 1:00 बजे की स्थिति में उसका एक ट्रिप धान बचा हुआ था। जहां प्रबंधक ने उसे कहा कि अगर 2:00 बजे तक आप अपना बाकी का धान ला सकते हैं तो आपके धान की खरीदी की जाएगी। उसके बाद हमारी जवाबदारी नहीं है। इसके बाद श्याम गुप्ता ने अपना धान उस दिन नहीं लाया। प्रबंधन द्वारा शुक्रवार 29 जनवरी को उन्हें अपना धान लाने के लिए कहा गया।

किसान के बेटे सुधीर कुमार का कहना है कि शुक्रवार 29 जनवरी को उसने प्रबंधक से दो बार बात भी की और शाम को 4:00 बजे अपना धान लेकर मंडी गया था। मगर प्रबंधक ने उसका धान लेने से इंकार कर दिया। कहा कि उसका टोकन नहीं कटा है। इसलिए उसका धान नहीं खरीदा जाएगा। जिसके बाद वह धान लेकर रात करीब 8:00 बजे सीधा जिला कलेक्ट्रेट पहुंच गया।

इस मामले में नायब तहसीलदार द्वारा समिति प्रबंधन से बात की गई। मगर प्रबंधक ने टोकन ना कटने का हवाला देते हुए धान लेने से इनकार कर दिया। किसान इसके बाद भी उस किसान ने हिम्मत नहीं हारी और वह रात भर कलेक्ट्रेट के सामने ही रहा और सुबह तक वही डटा हुआ है।

इसके साथ ही किसान ने समिति प्रबंधक के ऊपर गंभीर आरोप लगाए सुधीर ने बताया कि प्रबंधक द्वारा उसे बैकडोर से धान लेने की बात कही गयी। यानी की कम कीमत पर धान बेचने के लिए कहा गया। सुधीर के अनुसार, समिति प्रबंधक ने उससे कहा कि “अब तुम्हारा ध्यान तो बिक नहीं पाएगा, ले दे के बनाना पड़ेगा। कितने में अपना धान बेचोगे।

सुधीर ने बताया कि अगर वह इस तरह से धान बेचता तो उसे आधी कीमत ही मिलती और उसे 70 से 80 हज़ार का नुकसान होता। उसके बाद वह अपना धान से भरा ट्रैक्टर लेकर फरियाद के लिए जिला कलेक्ट्रेट पहुंच गया।

रायगढ़ जिले में किसानों की हालत पस्त कर रहे कुछ प्रबंधक:-

रायगढ़ जिले को यूं तो किसानों का गढ़ समझा जाता है। जहां जिले के सीधे-सादे किसान अपनी खून पसीने से फसल को सींचकर बड़ा करते हैं। लगभग 80% आम जनता का मुख्य आय का साधन कृषि ही है, अपने उपज मूल्य से ही किसान अपने वर्ष-भर की आजीविका के साधन पूरी करते हैं। लेकिन शायद ही कोई मंडी हो जहां किसानों को धान विक्रय करने में असुविधा न होती हो..!
हम यह तो नही कह रहे कि पूरे सेवा सहकारी समिति में ये हाल है, परन्तु अधिकांश समिति प्रबंधकों की शिकायत किसान अधिकारियों और मीडिया के समक्ष करते रहते हैं।

नोडल सिर्फ नाम के:-

प्रशासन इन महारथियों के अंकुश के लिए कृषि अथवा राजस्व कर्मचारियों को नोडल के रूप में रखता तो है पर नोडल का कार्य समिति में सिर्फ कुर्सी में बैठकर मूक दर्शक बनने से अधिक कुछ नही रहता। और उनके पास विभागीय काम का बहाना अलग.. कई किसानों को इस वर्ष पता भी नही था कि नोडल कौन है..! बेचारे तो प्रबंधक और फड़ प्रभारी को ही नोडल समझ बैठे थे। और हो भी क्यों न क्योंकि किसानों के धान को पास- फैल सब प्रबंधक ही तो करते थे, भला किसानों का इसमे क्या दोष...?

किसानों की मजबूरी:-

सारंगढ ब्लॉक के कुछ किसानों का तो यहां तक आरोप है कि उनके धान को पहले अमानक बताकर फैल कर दिया गया था और शाम को पैसे लेकर उसी धान को पास कर दिया। अब किसान के पास दो विकल्प बचता है या तो उस धान को वापिस लेकर विचौलियों को 1400 रुपये क्विन्टल में दे या तो कुछ रुपये देकर समर्थन मूल्य में बेचे, जिसमे से किसानों को पैसे देकर समर्थन मूल्य में बेचना फायदे का सौदा लगता है।

जब हमारे जिला ब्यूरो ने समिति में जाकर किसानों से इस सम्बंध में पूछताछ की तो किसानों ने बताया कि बारदाने तो दूर की बात है यहां तो किसानों से धान भराई और तौलाई तक का पैसा लिया जाता है..! हमाल मुकद्दम पर भी आरोप लगाया गया कि 200 से 500 ग्राम तक अधिक धान लिया जाता है। और जो किसान इनको चाय पानी के लिए पैसा देते हैं उनके धान की तौलाई पहले की जाती है।

क्या कहते हैं डी आर गोड़:-

जब इस सबन्ध में हमारी टीम ने डी. आर. से दूरभाष के माध्यम से बारदाना, और किसानों की समस्याओं के बारे में और किसानों से पैसा लेने की बात बताई तो उन्होंने कहा अगर ऐसा है तो मैं सभी से बात करता हूँ..यह गलत हो रहा है।


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