सुनील इस्पात एवं पॉवर लिमिटेड के चिमनी से निकलते जहरीले धुएँ... - CG Sandesh

सुनील इस्पात एवं पॉवर लिमिटेड के चिमनी से निकलते जहरीले धुएँ से सांस लेना हुवा मुश्किल...कृषि की निकल रही जान...! पर्यावरण विभाग सो रहा कुंभकर्ण की नींद...

आज हम उस गांव की बात करेंगे। जिस गॉव का प्रत्येक व्यक्ति स्वच्छ सांस लेने के लिए जूझ रहा है। प्रदूषण मानक की बात ही छोड़िये। जी हाँ ! यह हम नही कह रहे ये नीचे दिए गईं तस्वीरे खुद बोल रही है..

दरअसल ग्राम लाखा में स्थित सुनील इस्पात एंड पावर लिमिटेड से लगातार डस्ट उड़ रहा है। जिससे कि ग्रामीण परेशान है। फैक्टरी से निकले डस्ट की मात्रा इतनी ज्यादा है कि यहां के किसानो की खेती करने तक कि इच्छा समाप्त हो चुकी है। शाम 6:00 बजते ही इस उद्योग के द्वारा रात का खेल चालू हो जाता है और आँख मिचौली करते हुए चिमनी से मानकों की धज्जियां उड़ाते हुए लगातार दूषित एवं जहरीले धुंए को छोड़ना शुरू कर दिया जाता है। टेक्निकल शब्दों में कहें तो वह मशीन बंद कर दी जाती है जो इस काले धूएं के जहरीले तत्वों को हवा में जाने से रोकती है।

ग्रामीणों का कहना है कि बहुत ज्यादा मात्रा में कोयला का डस्ट सीधे गांव पर गिरता है और ग्रामीणों को लगातार परेशानियों का सामना करना पड़ता है। फैक्ट्री मालिकों को इससे पहले भी गांव की महिलाओं ने 4 से 6 बार जाकर अपनी समस्या बताई हैं। जिस पर फैक्ट्री वाले केवल जल्द से जल्द निराकरण का आश्वासन देते हैं, पर करते कुछ नहीं है।
वही आज शाम 6:00 बजे पुनः ग्रामीणों के द्वारा सुनील प्लांट से जहरीले, दूषित धुएं का रिसाव हुआ जिसे देखते हुए ग्रामीणों ने फैक्ट्री के सामने मोर्चा खोल दिया एवं फैक्ट्री बंद करने की धमकी भी दे डाली।

जिम्मेदार अधिकारी को किसी के से परवाह नही..

सबसे दिलचस्प बात तो यह है कि रायगढ़ में उद्योगो की संख्या वृहद होने के बाद भी जिला प्रशासन यहां की बढ़ती प्रदूषण समस्या को नजरअंदाज कर बैठी है। जबकि आज सेफ्टी, उद्योग अधिकारियों की समीक्षा बैठक जिला कलेक्टर भीम सिंह के द्वारा ली गई है पर पर्यावरण विभाग इस काले धुंए में के नशे में बेसुध है।

यहां के किसान अब डस्ट से इतना परेशान हो चुके है की खेती की चाह भी खत्म हो रही है! क्योंकि डस्ट से परिपूर्ण उनके सब्जी एवं फलों में लगे काले कोयले के दाग से मंडी में उन्हें उचित मूल्य भी कम मिल रहा है, साथ ही साथ पैदावार भी कम हो रही है जोकि अत्यंत दयनीय स्थिति है। इसके साथ ही विभिन्न प्रकार के रोगों का भी खतरा लगातार ग्राम वासियों को भयभीत किया हुआ है और पर्यावरण विभाग हमेशा की तरह मौन धारण किए हुए हैं!

इधर गली मोहल्लों की सफाई में व्यस्त.. उधर आबो – हवा का निकल रहा जनाजा
आप समझते होंगे कि स्थितियां कितनी गंभीर है कि इसके लिए लोगों को अपने घर से बाहर निकल कर सड़क पर आना पड़ा ! आंदोलन की स्थिति हो गई! इधर जिला प्रशासन स्वच्छ सड़क और रास्तों में मशगूल है और इधर यहां की आबोहवा अस्वच्छता की हद पार किए जा रही हैं। आखिर इस जहर को अपने सांस के जरिए लेने वाले यह ग्रामीण आंदोलन के सिवा और कर भी क्या सकते हैं..? क्योंकि एक कहावत है “सैंया भए कोतवाल तो डर काहे का”..! पर्यावरण विभाग और उद्योगों के जुगलबंदी इस कहावत को चरितार्थ करती है।


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