नारायणपुर: विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस विशेष: जागरूकता कार्यक्रम से पता चला, स्पर्श क्लीनिक में होता है निःशुल्क मनोरोग इलाज
नारायणपुर: 40 वर्षीय रमेश (बदला हुआ नाम) मानसिक रूप से अस्वस्थ था। हमेशा खोया हुआ रहना, स्वयं की देखभाल जैसे-नहाना,कपड़े पहनना, भोजन करना, आदि की उसे जरा सी भी सूझबूझ नही थी। कानों में कई बार अजीब सी आवाजे सुनकर वह परेशान हो जाता था। सामाजिक रूप से वह अव्यवहारिक और असमान्य प्रवित्ति का था। एक दिन रमेश के गांव के ही एक सामाजिक कार्यकर्ता को मानसिक स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता कार्यक्रम के माध्यम से जब पता चला कि मानसिक रोगों का इलाज जिला अस्पताल के स्पर्श क्लिनिक में निःशुल्क होता है। तो उन्होंने रमेश के परिवार वालों को स्पर्श क्लीनिक के बारे जानकारी दी और उन्हें सलाह दी कि एक बार रमेश को इलाज के लिये जिला अस्पताल लेकर जाएं। अस्पताल आने के पश्चात मेडिसिन काउंसलिंग और साइकोथेरेपी के माध्यम से उसका इलाज प्रारंभ हुआ ।
साइकोसोशल इंटरवेंशन(मनोसामाजिक हस्तक्षेप) के दौरान परिवार वालों को बताया गया कि रमेश मे यह समस्या जेनेटिक या बायोलॉजिकल के कारण हो सकती है। प्रारम्भिक चरणों मे रमेश के साथ व्यवहारिक चिकित्सा पद्धति और सकारात्मक व्यवहार अपनाना होगा। 4- 5 सेशन के बाद मरीज में कुछ सकारात्मक सुधार आने लगे। साथ ही थोड़ी थोड़ी बातें भी करने लगा और दवाइयों के माध्यम से कानों में जो अजीब आवाज आती थी वह भी बंद हो गई।
जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम के नोडल अधिकारी डॉ.प्रशांत गिरी ने बताया, " जिले में मानसिक स्वास्थ्य के लिये गाँव- गाँव मे शिविर आयोजित किये जा रहे है। इसका परिणाम भी अब दिखने लगा है, सुदूर अंचल में रहने वाले ग्रामीण अब इस बीमारी को समझकर अपना और अपने करीबियों का इलाज करवाने आ रहे है। मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता लाने के उद्देश्य से ही आज 10 अक्टूबर के दिन को विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस की थीम “Mental Health in an Unequal World” (असमान दुनिया में मानसिक स्वास्थ्य) निर्धारित की गयी है। यदि मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति को समय रहते पहचान लिया जाए तो रोगी पूरी तरह से ठीक हो सकता है और सामान्य जीवन व्यतीत कर सकता है। एक व्यक्ति की मानसिक बीमारी केवल उसे ही नहीं बल्कि पूरे परिवार को प्रभावित करती है।"
क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट प्रीति चांडक ने बताया, “मानसिक रोग को आज भी लोग एक अभिशाप की तरह देखते हैं, जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है। यह ऐसी बीमारी है जो कभी भी किसी को भी हो सकती है। यदि आपके परिवार, मोहल्ले का कोई व्यक्ति अचानक अपने स्वभाव में परिवर्तन कर ले गुमसुम रहने लगे तो उसकी मनोदशा को समझें। उससे अच्छी-अच्छी बातें करें और मन की बात को जानने की कोशिश करें। उसे अकेला बिल्कुल न छोंड़े। समस्या का समाधान न होता दिखे तो उसे तुरंत नजदीकी स्पर्श क्लीनिक ले जाकर उसकी काउंसलिंग कराएं। यहां संबंधित व्यक्ति की पहचान पूरी तरह से गुप्त रखी जाती है।”