गांव गांव कुकुरमुत्ते की तरह सैकड़ों की तदात में पैदा होने लगे नेता - अनुराग नायक
संपादकीय| आजादी के पहले नेता कहलाना कभी गर्व की बात हुवा करती थी. उस समय देश के लिए मर मिटने का जज्बा और परोपकार का जुनून सवार रहता था और नेता भी गिने चुने हुआ करते थे. जो बड़े से बड़ा काम करके भी उसका प्रचार प्रसार नही करते थे देश को आजाद करने में अपनी जान तक गवा बैठे वो दीवाने.
लेकिन स्वतंत्र भारत में यही कोई आजादी के 50 दशक तक तो लगभग सब कुछ ठीक ठाक ही था. लेकिन उसके बाद तो गांव-गांव कुकुरमुत्ते की तरह सैकड़ों की तदात में नेता पैदा होने लगे, मानो उसके बाद तो जैसे कि राजनीति की गलाकाट प्रतिस्पर्धा ही शुरू हो गई.
नेताओं की बाढ़ सी आ गई, नए-नए राजनीतिक दल उगने लगे और फिर तरह-तरह की राजनीतिक घटनाये घटने लगी, रोज-रोज धरना प्रदर्शन हड़ताल, आंदोलन होने लगे हर कोई शक्ति प्रदर्शन को आमदा होने लगा और अपना जनाधार बढ़ाने सस्ती लोकप्रियता पाने के फेर में उचित अनुचित की परवाह किये बगैर नित नये नये तमाशे राजनीतिक सर्कस के गलियारों में देखने को मिला.
राजनीति की बगिया में तरह-तरह के नेता रूपी फूल अपनी सोच समझ के रंग बिरंगी खुशबु बिखेर रहे हैं. जो बनावटी कागजी फूल घासलेट की खुशबु लिये है. जो कि ज्यादा लुभावने हुए. और जो असली गुलाब की तरह कांटे लिए है जो नेता सच बोलते हैं उनकी नैया पार होने में सफल नही हो पाई.
सर्वविदित है सच कड़वा होता है और लोग सच सुनना नही चाहते. क्षेत्र में ऐसे भी नेताओं की कमी नहीं है जो सिर्फ पत्र लिखते हैं और करोड़ो रूपये का विकास हो जाता है उसके बाद नेताजी की फोटो अखबार में छपती है और उस विज्ञप्ति में नेताजी की महिमा मंडन के औपचारिकता विज्ञापन की मजबूरी के साथ पूरी होती है. जिसमें लिखा होता है कि नेताजी ने पत्र लिखा और क्षेत्र के विकास की मांग की थी जिसके बाद क्षेत्र में करोड़ो के विकास कार्य स्वीकृत हुए हैं.