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राजकीय शोक पर एक निजी स्कूल में सांस्कृतिक कार्यक्रम कितना सही ?

मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने प्रदेश के राज्यपाल श्री बलरामजी दास टंडन के निधन पर गहरा दुःख व्यक्त करते हुए छत्तीसगढ़ में सात दिन के राजकीय शोक की घोषणा की है। श्री टंडन के निधन की सूचना मिलते ही मुख्यमंत्री आज दोपहर राजधानी रायपुर के अम्बेडकर अस्पताल पहुंचे और उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि दी।

मुख्यमंत्री के निर्देश पर सामान्य प्रशासन विभाग यह जारी किये गए पत्र के अनुशार इस अवधि में सरकारी भवनों और जहां नियमित रूप से राष्ट्रीय ध्वज फहराये जाते हैं, वहां ध्वज आधे झुके रहेंगे। साथ ही सरकारी स्तर पर कोई मनोरंजन अथवा सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित नहीं किए जाएंगे। 14 अगस्त को प्रदेश सरकार के सभी कार्यालय बंद रखे जाएंगे। राजकीय शोक में 15 अगस्त का दिन भी शामिल है, लेकिन स्वतंत्रता दिवस के राष्ट्रीय पर्व को ध्यान में रखकर राज्य सरकार ने 15 अगस्त को समारोह परम्परागत रूप से मनाने का निर्णय लिया है। परिपत्र में कहा गया है कि 15 अगस्त को राष्ट्रीय ध्वज आधा नहीं झुकाया जाएगा और सभी जिलों में सार्वजनिक ध्वजारोहण समारोह में मुख्य अतिथियों द्वारा ध्वजारोहण किया जाएगा। राष्ट्रीय धुन भी होगी और परेड द्वारा सलामी ली जाएगी। परेड निरीक्षण और मार्चपास्ट भी होगा। मुख्यमंत्री राज्य की जनता के नाम संदेश पढ़ेंगे, लेकिन पुरस्कार वितरण, सम्मान समारोह तथा सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित नहीं किए जाएंगे। परिपत्र में यह भी बताया गया है कि 15 अगस्त की शाम कोई सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं होंगे।

इस आदेश के बाद जिले में लोग राजकीय शोक को लेकर अपनी-अपनी बात रखने लगे. सरायपाली से पार्षद हरदीप सिंह रैना ने ट्विट किया है कि देश सेवा में लगे जवान जब शहीद होते हैं तो राष्ट्रीय पर्व पर कोई सांस्कृतिक कार्यक्रम रद्द नहीं होता. परंतु संवैधानिक पद पर बैठा कोई नेता खत्म हो जाता है तो राष्ट्रीय पर्व पर सांस्कृतिक कार्यक्रम व अन्य कार्यक्रमों को रद्द कर दिया जाता है जो शर्मनाक है.

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुशार कुछ लोगों का कहना है कि राजकीय शोक के बावजूद बसना के एक निजी स्कूल में आज सांस्कृतिक कार्यक्रम कराया जा रहा है जो कि गलत है उन्होंने इसका विरोध जताते हुए सरायपाली एसडीएम नुपुर राशि पन्ना से बात की और निजी स्कूल में कार्यक्रम होने की जानकारी दी. जिसके बाद उन्होंने स्टाप भेजकर इस कार्यक्रम को रोकने की बात कही.

इसके विरोध में आ रहे लोगों का कहना है कि शोक मनाना ना मनाना ये निजी संस्थानों के अपने-अपने विचार है पर एक स्कूल जैसी संस्था को शोक अवश्य मानना चाहिए. वहां से बच्चे देश के लिए आगे आते है भविष्य बनते है. आप अगर संविधान में बैठे एक व्यक्ति जो राज्य में सबसे उच्च है अपने राज्य के सभी विश्वविद्यालयों के कुलाधिपति, राज्य का संवैधानिक प्रमुख है आप उनके शोक में शामिल नही हो रहे है फिर आप क्या अपने छात्रों को राज्यपाल का महत्व समझा पायेंगे.



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