स्कूली बच्चीयों पर लाठीचार्ज, क्या अफसरों पर लगाम लगाने नाकाम रही सरकार ? या सरकार के खिलाफ नहीं उठानी चाहिए आवाज़, लोकतंत्र क्यों बन रही भीड़ तंत्र ?
छतीसगढ़ सरकार द्वारा चलायी जा रही अटल विकास यात्रा का
गुरूवार को दूसरा दिन था. मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की अटल विकास यात्रा
बलौदाबाज़ार जिला पहुँचने वाली थी. मुख्यमंत्री अपने 15 वर्षों का विकास लोगों को
बताते कि इससे पहले ही अमेरा गांव के पास सड़क पर अपनी मांगों को लेकर छात्र-छात्राओं
ने चक्काजाम कर दिया.
जिसके बाद मांगों के खिलाफ आवाज़ उठाने वालों को सड़क से हटने के लिए समझाया गया, नहीं हटने पर छात्रों पर लाठीचार्ज करने की धमकी दी गयी इस
धमकी के बाद छात्र तो सड़क से हट गए, लेकिन छात्राएं डटी रहीं और जिसके बाद एसडीएम ने
खुद एक डंडा लेकर छात्राओं को मारना शुरू कर दिया.
क्या अफसरों पर लगाम लगाने नाकाम रही सरकार ? या सरकार के खिलाफ नहीं उठानी चाहिए आवाज़.
अब सवाल ये उठता है कि क्या अफसरों पर लगाम लगाने नाकाम रही सरकार ? या सरकार के खिलाफ नहीं उठानी चाहिए आवाज़. देखा जाए तो
बीते 15 वर्षों से राज्य में लगातार डॉ. रमन सिंह की सरकार है फिर भी इस घटना को
देखकर तो यही लगता है कि या तो सरकार अफसरों पर लगाम लगाने में नाकाम है या तो
सरकार ये नहीं चाहती की कोई सरकार के खिलाफ आवाज उठाये. यह कोई पहली घटना नहीं है
इससे पहले भी छत्तीसगढ़ में ऐसी घटनाये हो चुकी है.
बीते 15 वर्षों की बात करें तो छत्तीसगढ़ की जनता के लिए जो अहम्
मुद्दे है उनमे रोजगार, सड़क, स्वास्थ और शिक्षा प्रमुख है. रोजगार के लिए छत्तीसगढ़ की
सरकार ने जनता के लिए कुछ खास नहीं कर पाई आज भी छत्तीसगढ़ के लोग पलायन के लिए
बहार जाने को मजबूर है जिसे लेकर बीबीसीहिंदी हिन्दी के 21 जुलाई 2018 में एक लेख
प्रकाशित की गई थी की “छत्तीसगढ़: मनरेगा में काम नहीं, जाएं तो जाएं
कहां”. साथ ही भारत सरकार की रिपोर्ट के अनुसार देश का सबसे गरीब राज्य छत्तीसगढ़
बतया गया है.
सड़कों की बात की जाए तो आज भी राज्य की कई ऐसी सड़के है जो अपनी बदहाली के आंसू रो
रही है कहीं सड़कों पे गड्डे की वजह से जान जा रही है तो कहीं पक्की से कच्ची हो गई
है सड़क. मगर जहाँ से विकास यात्रा गुजरती है वहां की सड़कें लीपापोती कर थोड़े समय
के लिए ठीक कर दी जाती है. जिसे देखकर ऐसा लगता है कि अच्छी सड़क अगर पाना है तो
राज्य का मुख्यमंत्री बनना पड़ेगा नहीं तो भूल जाओ.
स्वास्थ व्यवस्था का हाल ऐसा कि जिसे देखकर ये समझ नहीं आता
मरीज जाए तो जाए कहाँ सरकारी अस्पताल जहाँ डॉक्टरों की भारी कमी में चलते उसे रेफर
सेंटर बना दिया जाता है. तो वहीँ दूसरी तरफ इसे छुपाने के लिए स्मार्ट कार्ड शिविर
लगाया जा रहा है क्या यह अस्पतालों का निजीकरण नहीं है ? और महंगा इलाज करवा कर फायदा किसे हो रहा है अस्पतालों को
या जनता को ? क्या इसके बदले सरकारी अस्पताल बीते 15 वर्षों
में बेहतर नहीं कर सकती थी सरकार ?
शिक्षा के हालत ऐसे है कि आज भी बहोत से स्कूल में शिक्षकों
की कमी है बच्चे निजी स्कूल में जाकर महँगी शिक्षा प्राप्त करने को मजबूर है. क्या
यह सरकार की जिम्मेदारी नहीं की सभी को एक सामान शिक्षा उपलब्ध करा सके ? निजी अस्पताल और सरकारी अस्पताल या निजी स्कूल और सरकारी
स्कूल इन दोनों सरकारी स्थानों पे तो कोई जाना ही नहीं चाहता. और इन दोनों के बीच
का अंतर इतना कि जिसे देखकर ऐसा लगता है की सरकार से ज्यादा पैसा आज पूंजीपतियों
के पास है.
लोकतंत्र क्यों बन रही भीड़तंत्र
बीते कुछ वर्षों में लोकतंत्र को भीड़तंत्र में बदलते देखा जा रहा है. लोगों की
मांग और मुद्दा उठाने वाला कोई नहीं बचा सरकार मस्त है विपक्ष पस्त है और जनता
त्रस्त है. ऐसे समय में जनता ही सड़कों में आने पर मजबूर हो गयी है. वहीँ स्कूली बच्चीयों पर हुए लाठीचार्ज के मामले में महासमुंद
जिले में बसना के जाने माने आरटीआई कार्यकर्ता विनोद दास जी के सोशल मिडिया के एक
पोस्ट पर सवाल पूछा गया कि क्या आप भीड़तंत्र का समर्थन करते है तो उनका कहना था कि
“लोकतंत्र की दुर्दशा आपके सामने है. समझ सकते है समय और परिस्तिथि के अनुसार ये
सही भी है लेकिन जब अपराध सिद्ध हो”. जांच को लेकर उनका मानना है कि “तहसीलदार तो
सरकारी दामाद है फाइल नस्तीबद्ध हो जायेगा. बेहतर है वहीँ पब्लिक को ऑन द स्पॉट
फैसला करना चाहिए”. जिसका काफी लोगों ने समर्थन भी किया.
सरकार पर भी विनोद दास ने आरोप लगाते हुए कहा कि ऐसे सरकार से उम्मीद नहीं है वरना ऐसे अधिकारी को बर्खास्त कर देना चाहिए. इससे गलत संदेश जायेगा.