क्या नेताओं की परीक्षाओं में पास हो पायेगी जनता ?
छतीसगढ़ में विधानसभा चुनाव के परिणाम आने में अब केवल 2 दिन या कहें कुछ घंटे ही बचे है. लेकिन नेताओं द्वारा दी गई इस परीक्षा में परिमाण के बाद जो जनता उनसे उम्मीदें कर रही क्या वे उसे पूरा कर पाएंगे ? अगर ऐसा हुआ तो यह जीत जनता की होगी. और नहीं तो समझ लीजिये नेता तो पास हो गया मगर मतदाता फेल !
छतीसगढ़ में इस बार के चुनाव में जैसा धनबल का उपयोग देखने को मिला है इस बात से शायद यह अंदाजा लगाया जा सकता कि चुनाव जीतना एक आम आदमी के लिए अब नामुनकिन सा हो गया है. नोटबंदी के 2 साल के बाद हुए इस चुनाव को देखकर ऐसा लगता है कि कालेधन के नाम पर की गई नोटबंदी केवल और केवल जनता के साथ छलावा था.
इस चुनाव के दौरान वोट के बदले अवैध रकम, शराब, उपहार जैसी मिलने की कई बातें सामने आई कई बार लोगों ने सोशल मिडिया के माध्यम से इसकी शिकायत की बावजूद इसके कार्रवाही के आभाव में धनबल ज्यादा मजबुत दिखाई देने लगा. वैसे चुनाव आयोग के कारण प्रशासन करोड़ों की धनराशि चुनाव के वक्त जब्त कर रहा है, लेकिन चुनाव में खपने वाली भारी भरकम धनराशि की तुलना में जब्त की जाने वाली यह राशि ऊंट के मुंह में जीरे के समान है.
इस लोकतंत्र में अब जनप्रतिनिधि बनने के लिए स्वच्छ छवि, जनता से मेल मिलाप करने वाले, लोगों की समस्याओं को उठाने वाले की कोई जगह नहीं है, अब तो राष्ट्रीय पार्टियों में भी करोड़ों रुपये लेकर टिकट की सौदेबाजी करने के आरोप लगाये जा रहें है. ऐसे में बिना धनबल के कोई आम आदमीं अब चुनाव लड़ने का केवल सपना ही देख सकता है.
चुनाव को लेकर प्रत्याशी कितने पैसे खर्च करें यह भी तय कर के रखा गया है और इसका हिसाब भी लिया जाता है लेकिन इसके बाद भी प्रत्याशी तय सीमा से अधिक खर्च कर जाते है. ऐसे में एक ऐसा प्रत्याशी जो धनबल का उपयोग नहीं कर सकता है उसे ना तो राष्ट्रीय पार्टी टिकट देना उचित समझती है और ना ही वो प्रचार कर के सभी लोगों तक पहुँच सकता है.
आज के दौर में प्रत्याशी को खुद मतदाता तक जाकर बार-बार उसे चुनाव चिन्ह बताना पड़ता है. और कम समय में एक निर्दलीय प्रत्याशी को अपना चुनाव चिन्ह लोगों तक पहुँचाने में बहोत कम ही समय मिलता है.
जो प्रत्याशी सक्षम होते है वो लोगों तक जाकर किसी ना किसी माध्यम से अपना चिन्ह लोगों के दिमाक में डाल देते है जहाँ कई लुभावने वादे भी किये जाते है. इन लुभावने वादे को देखकर जनता इनके पास आती है और शायद वोट भी दे देती है. लेकिन जनता नेता की परीक्षा में तभी पास हो पता है जब उसकी समस्या का समाधान हो, जनता से किये वादे पुरे हो.