news-details

सरायपाली : राष्ट्रीय पांडुलिपि अभियान के तहत दुर्लभ हस्तलिखित ग्रंथों का सर्वेक्षण किया गया

संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय पांडुलिपि अभियान 2026 की शुरुआत 16 मार्च 2026 से 15 मई 2026 तक किया जाना है। इस अभियान का उद्देश्य देश के विभिन्न हिस्सों में सुरक्षित दुर्लभ पांडुलिपियों का सर्वेक्षण,पंजीकरण और डिजिटलीकरण करना है इस अभियान के अंतर्गत महासमुंद जिला में कलेक्टर के मार्गदर्शन में समिति गठित कर सर्वेक्षण टीम का संभावित स्थानों पर जाकर पांडुलिपियों की पहचान की जा रही है तथा ज्ञान भारतम ऐप के माध्यम से उनका पंजीकरण एवं अपलोडिंग कार्य किया जा रहा है। 

पांडुलिपि को संरक्षक स्वयं या संस्था के प्रमुख तथा आम नागरिक जिन्हें पांडुलिपि की जानकारी है वह ज्ञान भारतम् ऐप में जानकारी अपलोडज कर सकते हैं। इसी क्रम में आज विकासखंड सरायपाली में पांडुलिपि के संरक्षकों से चर्चा कर उनके द्वारा सुरक्षित पांडुलिपि की सत्यापन के लिए सर्वेक्षक बीआरसी देवानंद नायक, भोलानाथ नायक,रविशंकर आचार्य, राजेश पटेल,दुष्यंत पटेल विकासखण्ड स्तरीय पांडुलिपि सर्वेक्षण समिति पहुंचे। उन्होंने देखा आज भी प्राचीन कहानी, इतिहास, धर्म ग्रंथ, अनुष्ठान विधि, लोकज्ञान और औषधीय ज्ञान जैसी महत्वपूर्ण विषय की पांडुलिपि को सहेज कर रखे ही नहीं बल्कि उनका उपयोग भी कर रहे हैं। 

सर्वे में प्रकाश मिश्रा झिलमिला 21, अमृतलाल प्रधान बाराडोली 19, प्रफुल्ल भोई पण्डापारा 5,किशोरी लाल पण्डापारा 4, कौशल प्रधान पण्डापारा 1, अंतर्यामी भोई पण्डापारा 30, लक्ष्मण सेठ पण्डापारा 15, गजेंद्र पारेश्वर केजुआं 1,नित्यानंद गौरमठ समिति तोषगांव 20,शिव नारायण साहू तोषगांव 1, सक्राजीत प्रधान तोरेसिंह 12,उद्धव भोई तोरेसिंहा 1, अमृतलाल पटेल जोगनीपाली 15,अलेख राम नायक केजुआं 4, जगन्नाथ मंदिर बलौदा 10, रघुवीर साहू छिंदपाली 4, मदन मोहन मंदिर छिंदपाली 10, फकीर मोहन प्रसायत 20, विश्वनाथ नायक केजुआं 2, सुशील महापात्र किसड़ी 7, इस प्रकार से कुल 202 पांडुलिपि प्राप्त हुए।

जिनमें उड़िया लिपि का प्रयोग हुआ है। इनमें भागवत पुराण, लक्ष्मी पुराण, दुर्गा ग्रंथ ,भृंगु संहिता, ज्योतिष ज्ञान, जनजातीय धार्मिक संस्कार पद्धति, जादू टोना, भूत पिशाच निवारण, जड़ी बूटी औषधि शास्त्र, पशु चिकित्सा तथा इतिहास से संबंधित विषय शामिल है कई ग्रंथ सचित्र हैं और उन्हें शाही कांटे अथवा धातु केए नुकीले औजार से उकेरा गया है जो सैकड़ो वर्षों बाद भी स्पष्ट दिखाई देता है इन दुर्लभ पांडुलिपियों से छत्तीसगढ़ और उड़ीसा की सीमावर्ती संस्कृति इतिहास और परंपरा की महत्वपूर्ण जानकारी सामने आने की बात स्पष्ट हुई है। इस प्रकार पांडुलिपि का इतिहास सैकड़ो वर्ष पुराना है।


अन्य सम्बंधित खबरें