बसना : 27 लाख के ई-रिक्शे बने कबाड़, गांवों में गंदगी का अंबार, स्वच्छता योजना पर सवाल, जनपद की लापरवाही उजागर
- रूर्बन मिशन के तहत खरीदे गए 14 ई-रिक्शे वर्षों से जनपद परिसर में खड़े-खड़े हुए जर्जर, न गांवों को मिली सफाई व्यवस्था, न महिलाओं को रोजगार
बसना जनपद की 14 ग्राम पंचायतों के 33 गांवों को संभावनाओं से भरपूर भंवरपुर क्लस्टर का नाम देते हुए वर्ष 2016 में श्यामा प्रसाद मुखर्जी रूर्बन मिशन के प्रथम चरण में शामिल किया गया था। इस योजना का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक, सामाजिक एवं भौतिक आधारभूत सुविधाओं का विकास कर गांवों को शहरों जैसी सुविधाओं से जोड़ना है, ताकि लोगों को बेहतर जीवन-स्तर के लिए पलायन न करना पड़े।
इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए रूर्बन क्लस्टर की 14 ग्राम पंचायतों में ठोस एवं तरल अपशिष्ट प्रबंधन व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने तथा घर-घर कचरा संग्रहण के लिए ई-रिक्शा उपलब्ध कराने की योजना बनाई गई थी।
योजना के तहत गाड़ी वाला आया घर से कचरा निकाल शहरों की तर्ज पर प्रत्येक घर से कचरा एकत्र कर गांवों को स्वच्छ रखने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। जिला पंचायत महासमुंद ने 4 अक्टूबर 2022 को राज्य मिशन संचालक, रूर्बन प्रकोष्ठ, विकास आयुक्त कार्यालय इंद्रावती भवन नवा रायपुर के निर्देशानुसार रूर्बन क्लस्टर क्षेत्र की 14 ग्राम पंचायतों के लिए कुल 27 लाख 86 हजार रुपये की स्वीकृति प्रदान की थी।
इसके तहत प्रत्येक ग्राम पंचायत के लिए एक-एक ई-रिक्शा खरीदे जाने का आदेश जारी किया गया। इसके बाद जनपद पंचायत बसना ने 25 अक्टूबर 2022 को श्री साई सर्जिकल, बिलासपुर से प्रति ई-रिक्शा 1 लाख 98 हजार 500 रुपये की दर से 27 लाख 79000 हजार रुपये में 14 ई-रिक्शों की खरीदी की। योजना के अनुसार इन वाहनों का संचालन महिला स्व-सहायता समूहों के माध्यम से किया जाना था, जिससे गांवों में स्वच्छता व्यवस्था बेहतर होने के साथ-साथ महिलाओं को रोजगार का अवसर भी मिलता।
लेकिन यह योजना कागजों से आगे बढ़ ही नहीं सकी। खरीदे गए ई-रिक्शे आज तक संबंधित ग्राम पंचायतों को हस्तांतरित नहीं किए गए। परिणामस्वरूप लाखों रुपये की लागत से खरीदे गए वाहन वर्षों से जनपद पंचायत परिसर में खुले आसमान के नीचे धूप, बारिश और धूल झेलते हुए जर्जर हो चुके हैं। कई वाहनों की बैटरियां गायब हैं, टायर खराब हो चुके हैं और लोहे के हिस्सों में जंग लग चुकी है।
दूसरी ओर भंवरपुर, कुम्हारी, उमरिया, लोहड़ीपुर, जमदरहा, रूपापाली, पलसापाली, चिपरीकोना, खोगसा, उड़ेला, धनापाली, संतपाली, मेढ़ापाली और बरतियाभांठा सहित रूर्बन क्लस्टर की सभी ग्राम पंचायतों में स्वच्छता व्यवस्था बदहाल बनी हुई है। जगह-जगह कचरे के ढेर, दुर्गंध और अव्यवस्थित सफाई व्यवस्था ग्रामीणों की परेशानी बढ़ा रही है। इन गांवो के ग्रामीणों का कहना है कि सरकार कागजों में गांवों को स्वच्छ और विकसित दिखा रही है, लेकिन जमीनी हकीकत बिल्कुल अलग है।
उनका आरोप है कि जिम्मेदार अधिकारियों की उदासीनता के कारण लाखों रुपये की यह योजना दम तोड़ चुकी है। मामले ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर खरीदे गए ई-रिक्शे ग्राम पंचायतों को क्यों नहीं सौंपे गए? वर्षों तक जनपद परिसर में खड़े रहने के दौरान उनकी देखरेख की जिम्मेदारी किसकी थी? वाहनों की बैटरियां और अन्य उपकरण कैसे गायब हुए? और सबसे महत्वपूर्ण, जनता के पैसे की इस बर्बादी के लिए जवाबदेही किसकी तय होगी? अब बड़ा सवाल यह है कि क्या ये ई-रिक्शे दोबारा संचालन योग्य स्थिति में लाए जा सकेंगे या इन्हें चालू करने के लिए फिर से लाखों रुपये खर्च करने पड़ेंगे। ग्रामीणों ने मामले की उच्चस्तरीय जांच कर दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई तथा योजना को तत्काल धरातल पर उतारने की मांग की है। जनपद पंचायत और संबंधित विभाग की चुप्पी पूरे मामले को और अधिक संदेहास्पद बना रही है।
बसना के पूर्व विधायक राजा देवेन्द्र बहादुर सिंह ने कहा कि स्वच्छता जैसी महत्वपूर्ण योजना में गंभीर लापरवाही और अनियमितता सामने आई है। ई-रिक्शों की खरीदी के वर्षों बाद भी उनका वितरण नहीं होना योजना की विफलता को दर्शाता है। उन्होंने सवाल उठाया कि बैटरियां और अन्य सामान गायब होने के बावजूद शिकायत क्यों नहीं की गई। मोक्ष प्रदान ने पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच कर दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग की है।
मामले में बसना जनपद पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी पीयूष सिंह ठाकुर ने कहा कि ई-रिक्शों की खरीदी उनके कार्यकाल से पहले की गई थी। समय पर वितरण नहीं होने के कारण ये वाहन लंबे समय तक अनुपयोगी पड़े रहे, जिससे उनकी स्थिति खराब हो गई है। उन्होंने बताया कि पूरे मामले की जानकारी जिला पंचायत को भेजी जाएगी तथा आवश्यक दिशा-निर्देश प्राप्त होने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।
वहीं संबंधित ग्राम पंचायतों के सचिवों का कहना है कि वर्षों से खुले में पड़े रहने के कारण ई-रिक्शों की बैटरियां गायब हो चुकी हैं, कई वाहनों के कांच टूट गए हैं और उनकी स्थिति पूरी तरह कबाड़ जैसी हो गई है। उनका कहना है कि इन वाहनों को पुनः चालू हालत में लाने के लिए भारी मरम्मत खर्च की आवश्यकता होगी। जबकि उनके मरम्मत के लिए कोई राशि नही है।