संस्कृति विभाग, रायपुर के राज्य स्तरीय सम्मेलन में डॉ अनुसुइया ने की शिरकत
संस्कृति विभाग केअंतर्गत पुरातत्व, अभिलेखागार एवं संग्रहालय संचालनालय, रायपुर द्वारा महंत घासीदास स्मारक संग्रहालय के सभागार में 18 जून 2026 को “लोकसाहित्य के दर्पण में अतीत का प्रतिबिंब” विषय पर आयोजित दो दिवसीय राज्य स्तरीय सम्मेलन का शुभारंभ हुआ। लगातार 18 एवं 19 जून 2026 को आयोजित इस संगोष्ठी में प्रो (डॉ) अनुसुइया अग्रवाल डी लिट् प्राचार्य स्वामी आत्मानंद शासकीय अंग्रेजी माध्यम आदर्श महाविद्यालय महासमुंद बतौर वक्ता आमंत्रित की गई थी।
सम्मेलन के शुभारंभ सत्र में दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर एवं कांकेर राजपरिवार के वर्तमान प्रमुख डॉ. आदित्य प्रताप देव ने “Reflections of Pasts in Chhattisgarhi Folk Culture: Challenges and Possibilities” विषय पर मुख्य वक्तव्य प्रस्तुत किया। अपने व्याख्यान में उन्होंने छत्तीसगढ़ की लोक परंपराओं, लोककथाओं, लोकगीतों एवं सांस्कृतिक स्मृतियों में निहित ऐतिहासिक तत्वों की चर्चा करते हुए लोकसाहित्य को अतीत के अध्ययन का एक महत्वपूर्ण स्रोत बताया।
सम्मेलन के शुभारंभ सत्र में दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर एवं कांकेर राजपरिवार के वर्तमान प्रमुख डॉ. आदित्य प्रताप देव ने “Reflections of Pasts in Chhattisgarhi Folk Culture: Challenges and Possibilities” विषय पर मुख्य वक्तव्य प्रस्तुत किया। अपने व्याख्यान में उन्होंने छत्तीसगढ़ की लोक परंपराओं, लोककथाओं, लोकगीतों एवं सांस्कृतिक स्मृतियों में निहित ऐतिहासिक तत्वों की चर्चा करते हुए लोकसाहित्य को अतीत के अध्ययन का एक महत्वपूर्ण स्रोत बताया।
उन्होंने लोक परंपराओं के संरक्षण, प्रलेखन एवं अकादमिक अध्ययन की आवश्यकता पर भी बल दिया।शुभारंभ सत्र में विशिष्ट अतिथि के रूप में वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. सुशील त्रिवेदी, वरिष्ठ इतिहासकार आचार्य रमेंद्रनाथ मिश्र तथा संस्कृति विभाग के विशेष कर्तव्य अधिकारी श्री जितेंद्र सिंह उपस्थित रहे। अतिथियों ने अपने उद्बोधनों में लोकसाहित्य को समाज की सांस्कृतिक स्मृति का जीवंत दस्तावेज बताते हुए इसके संरक्षण एवं संवर्धन की आवश्यकता पर प्रकाश डाला। इस अवसर पर अतिथियों ने प्रकाशित स्मारिका का विमोचन किया।
कार्यक्रम के प्रारंभ में विभाग के संचालक डॉ. संजय कन्नौजे ने अतिथियों का स्वागत एवं सम्मान किया तथा स्वागत उद्बोधन प्रस्तुत करते हुए सम्मेलन की रूपरेखा एवं उद्देश्यों से उपस्थित जनों को अवगत कराया कथाएं और महत्ता थी।
द्वितीय दिवस के अकादमिक सत्र में डॉ अनुसुइया, सत्राध्यक्ष डॉ सत्मभामा आडिल, नारी का संबल पत्रिका की संपादक डॉ शकुंतला तरार, डॉ अरुण निगम एवम् डॉ विजय चौरसिया प्रमुख वक्ता थे।
द्वितीय वक्ता के रूप में डॉ अनुसुइया ने अपने वक्तव्य में कहा कि लोकसाहित्य में अतीत, वर्तमान और भविष्य का पूरा तापमान स्पष्टतया उठता- गिरता दृष्टिगोचर होता है। किसी भी देश की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक चेतना का ज्ञान प्राप्त करने के लिए वहां के लोकसाहित्य का अध्ययन करना आवश्यक ही नहीं अपितु अनिवार्य भी है। उन्होंने यह भी कहा कि इसी लोक साहित्य के अंतर्गत छत्तीसगढ़ी लोकोक्तियां सम्मिलित है जो अभिव्यक्ति मूलक विलक्षणता से संपन्न होती है।
कार्यक्रम के प्रारंभ में विभाग के संचालक डॉ. संजय कन्नौजे ने अतिथियों का स्वागत एवं सम्मान किया तथा स्वागत उद्बोधन प्रस्तुत करते हुए सम्मेलन की रूपरेखा एवं उद्देश्यों से उपस्थित जनों को अवगत कराया कथाएं और महत्ता थी।
द्वितीय दिवस के अकादमिक सत्र में डॉ अनुसुइया, सत्राध्यक्ष डॉ सत्मभामा आडिल, नारी का संबल पत्रिका की संपादक डॉ शकुंतला तरार, डॉ अरुण निगम एवम् डॉ विजय चौरसिया प्रमुख वक्ता थे।
द्वितीय वक्ता के रूप में डॉ अनुसुइया ने अपने वक्तव्य में कहा कि लोकसाहित्य में अतीत, वर्तमान और भविष्य का पूरा तापमान स्पष्टतया उठता- गिरता दृष्टिगोचर होता है। किसी भी देश की सांस्कृतिक और ऐतिहासिक चेतना का ज्ञान प्राप्त करने के लिए वहां के लोकसाहित्य का अध्ययन करना आवश्यक ही नहीं अपितु अनिवार्य भी है। उन्होंने यह भी कहा कि इसी लोक साहित्य के अंतर्गत छत्तीसगढ़ी लोकोक्तियां सम्मिलित है जो अभिव्यक्ति मूलक विलक्षणता से संपन्न होती है।
यह आकार में भले छोटी होती है तथापि जनजीवन की लहराती विथिका में संचरण करती वे अनुभवी अभिव्यक्तियां हैं जो अपने आलोक से मनुष्य का निरंतर पथ प्रदर्शन करती हैं। इन्हीं लोकोक्तियां की उंगली थाम कर मानव समुदाय इतिहास के पन्नों को पलट सकता है। अपनी बात की पुष्टि करते हुए उन्होंने ऐतिहासिक व्यक्तित्व राजा भोज का उदाहरण देते हुए कहा कि लोक में एक लोकोक्ति बहु प्रचलित है "कहां राजा भोज कहां गंगू तेली" इस लोकोक्ति को पढ़- सुनकर लगता है कि दो लोगों के बीच की असमानता को व्यक्त करने के लिए यह लोकोक्ति बनी है किंतु इसके पीछे इतिहास का वह अध्याय है जिसके बारे में अधिकांश जन जानते ही नहीं।
यह लोकोक्ति एक ऐतिहासिक युद्ध के कारण बनी थी। 11वीं शताब्दी में प्राचीन भारत के परमार वंश में मालवा यानी आज के मध्य प्रदेश की धार नगरी के शासक हुए थे भॊजपाल। वर्तमान मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल का नाम उन्हीं के भॊजपाल से अपभ्रंश होकर पड़ा है। भॊजपाल का 'ज' हटकर अब भोपाल हो गया है। राजा भोज वहां के राजा थे जिन पर 11वीं शताब्दी में दो राजाओं क्रमशः कल्चुरी के राजा गांगेय और दक्षिण के चालूक्य राजा तैलंग ने एक साथ आक्रमण किया था। राजा भोज ने उन्हें एक साथ एक ही युद्ध में पराजित किया। इसी ऐतिहासिक विजय के कारण यह लोकोक्ति चल पड़ी थी।
राजा भोज का नाम तो यथावत रहा किंतु गांगेय का नाम अपभ्रंशित होकर गंगू और तैलप का नाम तेली बन गया और इस तरह जय- पराजय की कहानी पर यह लोकोक्ति प्रचलित हुई "कहां राजा भोज कहां गंगू तेली"। इसी तरह उन्होंने राजा भील, राजा नल, राजा रावण, आदि ऐतिहासिक पात्रों पर प्रचलित लोकोक्तियों के साथ-साथ ऐतिहासिक स्थानपरक लोकोक्तियां का भी उल्लेख कर अपने वक्तव्य को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया।
ऐतिहासिक स्थलों में सिरपुर, रतनपुर, आरंग, खल्लारी, मातिन, तरेंगा, नांदगांव, शिवरीनारायण, दूल्हा देव एवं शिवनाथ नदी, जोक नदी, महानदी आदि के बारे में भी बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी अपने वक्तव के माध्यम से प्रस्तुत की और बताया कि किस तरह छत्तीसगढ़ी लोकोक्तियां इतिहास के पन्नों को खोलने,पलटने, जानने और समझने में जन सामान्य की मदद करती हैं। सघन तालियों की गड़गड़ाहट के बीच उनके द्वारा प्रस्तुत शोध वक्तव्य को पूरी सभा की भरपूर सराहना मिली। कार्यक्रम के अंत में संस्कृति विभाग के द्वारा उपस्थित अतिथियों का शाल, स्मृति चिन्ह और पुष्पगुच्छ भेंट कर सम्मान और आभार प्रकट किया गया।
सम्मेलन के दोनों सत्रों में शोधार्थियों, शिक्षकों, साहित्यकारों एवं संस्कृति प्रेमियों की उल्लेखनीय सहभागिता रही तथा लोक साहित्य के माध्यम से अतीत को समझने की नई संभावनाओं पर सार्थक विमर्श हुआ।
दो दिवसीय इस सम्मेलन में प्रदेश के विभिन्न विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों तथा सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़े विद्वानों , शोधार्थियों एवं विषय विशेषज्ञों ने लोकसाहित्य और इतिहास के अंतर्संबंधों पर अपने शोधपत्र एवं विचार प्रस्तुत किए। सम्मेलन का उद्देश्य लोक परंपराओं में संरक्षित ऐतिहासिक स्मृतियों का अध्ययन, प्रलेखन तथा उनके संरक्षण के प्रति जागरूकता का प्रसार करना था।
इस अवसर पर आयोजन के नोडल अधिकारी डॉ.. पी.सी. पारख, उप संचालक, प्रभारी अधिकारी प्रभात कुमार सिंह, पुरातत्त्ववेत्ता सहित विभाग के सभी अधिकारी कर्मचारी उपस्थित रहकर आयोजन की व्यवस्था संभाले। कार्यक्रम का सञ्चालन डॉ. आकांक्षा दुबे और अरुण निर्मलकर ने मिलकर किया।
सम्मेलन के दोनों सत्रों में शोधार्थियों, शिक्षकों, साहित्यकारों एवं संस्कृति प्रेमियों की उल्लेखनीय सहभागिता रही तथा लोक साहित्य के माध्यम से अतीत को समझने की नई संभावनाओं पर सार्थक विमर्श हुआ।
दो दिवसीय इस सम्मेलन में प्रदेश के विभिन्न विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों तथा सांस्कृतिक संस्थाओं से जुड़े विद्वानों , शोधार्थियों एवं विषय विशेषज्ञों ने लोकसाहित्य और इतिहास के अंतर्संबंधों पर अपने शोधपत्र एवं विचार प्रस्तुत किए। सम्मेलन का उद्देश्य लोक परंपराओं में संरक्षित ऐतिहासिक स्मृतियों का अध्ययन, प्रलेखन तथा उनके संरक्षण के प्रति जागरूकता का प्रसार करना था।
इस अवसर पर आयोजन के नोडल अधिकारी डॉ.. पी.सी. पारख, उप संचालक, प्रभारी अधिकारी प्रभात कुमार सिंह, पुरातत्त्ववेत्ता सहित विभाग के सभी अधिकारी कर्मचारी उपस्थित रहकर आयोजन की व्यवस्था संभाले। कार्यक्रम का सञ्चालन डॉ. आकांक्षा दुबे और अरुण निर्मलकर ने मिलकर किया।
अन्य सम्बंधित खबरें