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बस्तर गोंचा पर्व की नेत्रोत्सव पूजा पर छिड़ी बहस, राजपरिवार की मौजूदगी को लेकर आमने-सामने आए अलग-अलग पक्ष

जगदलपुर : बस्तर के प्रसिद्ध गोंचा महापर्व के दौरान भगवान जगन्नाथ की नेत्रोत्सव पूजा में बस्तर राजपरिवार के सदस्य कमल चंद्र भंजदेव की मौजूदगी को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। परंपरा के जानकारों और धार्मिक पदाधिकारियों के अलग-अलग दावों के बाद इस मुद्दे पर चर्चा तेज हो गई है।

दंतेश्वरी मंदिर के पुजारी पंडित प्रेम पाढ़ी ने दावा किया कि नेत्रोत्सव पूजा में राजपरिवार के सदस्य की उपस्थिति परंपरा के अनुरूप नहीं है। उनका कहना है कि बस्तर के अंतिम महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव भी इस पूजा विधान में शामिल नहीं हुए थे। उन्होंने यह भी कहा कि राजपरिवार को परंपराओं की सही जानकारी देने वालों को नियमों का पूरा ज्ञान होना चाहिए।

वहीं, सुकमा जमींदार परिवार के सदस्य कुमार जयदेव ने कहा कि उन्हें इस घटना की जानकारी मीडिया के माध्यम से मिली। उन्होंने कहा कि पूजा में शामिल होना अलग विषय है, लेकिन इससे परंपरा का उल्लंघन हुआ या नहीं, इसका निर्णय 360 घर आरण्यक ब्राह्मण समाज ही स्पष्ट कर सकता है। उन्होंने यह भी अपील की कि गोंचा महापर्व में सभी समाजों, विशेषकर मूल आदिवासी समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए, ताकि पर्व की गरिमा और वैभव और अधिक बढ़ सके।

कुमार जयदेव ने गोंचा रथयात्रा के दौरान एक वृद्ध महिला के घायल होने की घटना पर भी संवेदना व्यक्त करते हुए प्रशासन से पर्व के दौरान सुरक्षा व्यवस्था और अधिक मजबूत करने की मांग की।

आरण्यक ब्राह्मण समाज ने कहा- उपस्थिति से परंपरा भंग नहीं होती

इधर, 360 घर आरण्यक ब्राह्मण समाज के अध्यक्ष वेद प्रकाश पांडे ने परंपरा टूटने के आरोपों को खारिज किया। उन्होंने कहा कि नेत्रोत्सव पूजा का पूरा विधान परंपरागत पाढ़ी और पाणीग्राही द्वारा ही संपन्न कराया गया है। ऐसे में यदि राजपरिवार का कोई सदस्य पूजा में उपस्थित रहा, तो मात्र इससे परंपरा खंडित नहीं मानी जा सकती।

उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में शासन-प्रशासन और बड़ी संख्या में बस्तरवासी कमल चंद्र भंजदेव को महाराजा के रूप में सम्मान देते हैं और वे स्वयं भी उन्हें इसी रूप में देखते हैं।

हालांकि, उनके इस बयान को लेकर राजनीतिक और सामाजिक हलकों में भी चर्चा शुरू हो गई है। कुछ लोग इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजतंत्र की अवधारणा से जोड़कर देख रहे हैं। समाचार लिखे जाने तक इस पूरे मामले पर बस्तर राजपरिवार की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई थी।

परंपरा की अलग-अलग व्याख्याओं से बढ़ी चर्चा

नेत्रोत्सव पूजा को लेकर सामने आए अलग-अलग मतों ने बस्तर की धार्मिक परंपराओं को लेकर नई बहस छेड़ दी है। एक पक्ष इसे सदियों पुरानी परंपरा से जोड़ रहा है, जबकि दूसरा पक्ष मानता है कि पूजा का मूल विधान परंपरागत पुजारियों द्वारा संपन्न होने के कारण राजपरिवार की उपस्थिति से परंपरा प्रभावित नहीं होती। ऐसे में अब इस विषय पर धार्मिक और परंपरागत संस्थाओं की आधिकारिक व्याख्या का इंतजार किया जा रहा है।



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