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मतदान करने के लिए यहाँ के ग्रामीणों को तय करना पड़ता है 40 किलोमीटर का सफर.

गरियाबंद जिले के आदिवासी विकाखण्ड मैनपुर के दुरस्थ वनांचल पहाडी के उपर बसे ग्रामों के विशेष पिछडी जनजाति के सैकडो कमार आदिवासियों को आजादी के 71 वर्षो बाद भी मतदान करने के लिए 40 किलोमीटर दुर्गम पहाडी रास्ता को पैदल तय कर कुल्हाडीघाट आना पड़ता है.

ग्रामीण इस उम्मीद के साथ मतदान करने आते है कि उनके चुने हूए जनप्रतिनिधि चुनाव जीतने के बाद उनके गांव तक पहुचने के लिए पक्की सडक, पेयजल, शिक्षा, बिजली, स्वास्थ्य जैसे मूलभूत सुविधाए उपलब्ध कराऐंगे लेकिन आजादी के 7 दशक बाद भी पहाड़ी के उपर बसे इन ग्रामो में न तो पक्की सडक का निर्माण हो पाया है और न ही पेयजल. इसके अलावा स्वास्थ्य शिक्षा जैसे बुनियादी सुविधाए पहुँच पाये है. बावजूद इसके ग्रामीण हर पांच वर्ष में चाहे ग्राम पंचायत का चुनाव हो या विधानसभा या फिर लोकसभा का चुनाव हो पुरी ईमानदारी के साथ लोकतंत्र के महापर्व में हिस्सा लेने के लिए अनेक परेशानियों को झेलते हूए मतदान करने पहुंचते है.  

इन ग्रामों के ग्रामीणों को मतदान के लिए दो दिन का समय लगता है. चुनाव के एक दिन पहले पुरें गांव के मतदाता पैदल पहाडी रास्ते के सहारे कुल्हाडीघाट लगभग 20 किलोमीटर पैदल सफर कर आते है और रात्रि विश्राम कुल्हाडीघाट में करते है साथ ही मतदान करने के बाद पुनः पैदल अपने ग्रामों के तरफ वापस जाते है. इस तरह उन्हे आना जाना लगभग 40 किलोमीटर पड़ जाता है.

दिलचस्प यह है कि घने जंगलो और पहाडियों के कारण सरकारी योजनाओ का लाभ यहाँ के ग्रामीणों को नही मिल पा रहा है बडे जनप्रतिनिधि तो दुर शासन के आला अफसर भी इन पहाड़ी ग्रामों में नही पहुँच पाते जिसके कारण इन ग्रामों में विकास की रौशनी अब तक नही पहुच पाई है.

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी गोद ग्राम पंचायत की है यह बदहाल स्थिति.

विकासखण्ड मैनपुर के कुल्हाडीघाट ग्राम पंचायत में 18 जुलाई सन् 1985 को देश के पूर्व प्रधानमंत्री स्वः राजीव गांधी एंव सोनिया गांधी पहुचे थे और ग्राम पंचायत कुल्हाडीघाट को गोद लिया था. राजीव गांधी के कुल्हाडीघाट पहुँचने के बाद कुल्हाडीघाट ग्राम का विकास तो हुआ लेकिन इसके आश्रित ग्राम जो दुर्गम पहाडियों के उपर बसा है ताराझर, कुरूवापानी,  मटाल, भालूडिग्गी जैसे ग्रामो में आज तक न तो सडक का निर्माण हो पाया है और न ही अन्य मूलभूत सुविधाए पहुच पाई है.

इन ग्रामो में सबसे ज्यादा परेशानी पेयजल को लेकर है,  इन ग्रामो में स्वास्थ्य, शिक्षा ,बिजली एक स्वपन बनकर रह गया है.

राशन सामग्री के लिए घोडे का करते है उपयोग

गरियाबंद जिले के आदिवासी विकासखंड मैनपुर क्षेत्र के पहाड़ी व दूर्गम स्थानो मे बसे कमार ग्रामो के लोगो को इस 21 वीं सदी मे राशन सामाग्री ले जाने के लिये घोड़े का उपयोग करना पड़ रहा है. दूर्गम रास्ता व सड़क के अभाव मे पिछले कई वर्षो से राशन सामग्री के लिये आदिवासी कमार जनजाति के लोगो का एकमात्र सहारा घोड़े ही है.  

कुल्हाड़ीघाट के शासकीय राशन दुकान मे चावल दाल मिटटी तेल लेने पहाड़ी गांव भालूडिग्गी से पहुंचे ग्रामीण पिलेश्वर, मनराखन, जागेश्वर, तुलाराम, देवचरण कमार ने बताया कि भालूडिग्गी पहाड़ी के उपर बसे ग्राम ताराझर ,कुरूवापानी, भालूडिग्गी, तक पहुंचने के लिये कोई भी सड़क का निर्माण सरकार द्वारा नही किया गया है, सुबह से जब राशन लेने के लिये कुल्हाड़ीघाट के लिये निकलते है तो शाम चार बजे पहुंचते है और उन्हे पैदल घोड़े के साथ आना पड़ता है.


गांव तक न तो सायकल पहुंच सकती है और न ही कोई अन्य वाहन इसलिये यहां के ग्रामीण घोड़े पाले हुए है घोड़े को लेकर वे राशन खरीदने कुल्हाड़ीघाट पहुंचते है जो वहां से लगभग 20 किमी है और सीधे खड़े पहाड़ी पर बसा गांव है.

सीधी चढ़ाई होने के कारण यहां पैदल जाना भी मुश्किल होता है, ऐसे मे राशन सामग्री चावल, दाल, मिटटी तेल, नमक को बोरियो मे भरकर घोड़े के पीठ मे लाद देते है और घोड़ा आसानी से उनके राशन सामग्री को पथरीले उबड़ खाबड़ पहाड़ी रास्तो से होकर घर तक पहुंचा देता है और हर माह यहां के ग्रामीण समूह मे राशन लेने घोड़े के साथ कुल्हाड़ीघाट पहुंचते है.

क्या कहते है सरपंच

ग्राम पंचायत कुल्हाडीघाट के सरपच बनसिंग सोरी ने बताया कि ताराझर, मटाल ,कुरूवापानी, भालूडिग्गी, पहाडी के उपर बसा है इन गांवों में पहुचने के लिए सडक नही है. इसलिए ग्रामीण घोडे के सहारे राशन सामग्री कुल्हाडीघाट से पहाडी के गांव तक ले जाते है.  सरपंच बनसिंह सोरी ने आगे बताया कि पहाडी के उपर बसे ग्रामों के लोग मतदान के लिए एक दिन पहले कुल्हाडीघाट पहुचते है तब कही जाकर दुसरे दिन मतदान करते है.



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