मार्शल आर्ट के महान फनकार थे ब्रूसली - वरूण पांडेय : 20 जुला... - CG Sandesh

मार्शल आर्ट के महान फनकार थे ब्रूसली - वरूण पांडेय : 20 जुलाई को ब्रूसली के पुण्य तिथि पर विशेष

आज हम मार्शल आर्ट, कराते, कुम्फू नाम से जिस शैली का अनुसरण करते है, वह प्राचीन परम्परागत और शुद्ध शैली से काफी भिन्न है। इस शैली का विकास इस सदी के सबसे बड़े और प्रख्यात खिलाड़ी ब्रूसली ने किया। 20 जुलाई को ब्रूसली के पुण्य तिथि पर मीडिया से चर्चा के दौरान के जिला मुख्यालय के बिसाहूदास महंत उपनगर निवासी कराटे मास्टर वरुण पाण्डेय ने बताया कि ब्रूसली का जन्म 27 नवम्बर 1940 को संयुक्त राज्य अमेरिका के नगर सेनफ्रांसिस्को में हुआ था। उनके माता ग्रेस ली पिता हाई ली चीनी थे, ब्रूस ली की पत्नी का नाम लिण्डा था और वे सेनफ्रांसिस्का के चाइना टाउन नामक उननगर में रहते थे। उनके पिता रंगमंच के पेशेवर कलाकार थे। अतः शरीर के प्रति विशेष ध्यान रखने की प्रवृत्ति, योग व व्यायाम द्वारा शरीर के चुस्त-दुरूस्त व फुर्तिला बनाए रखने की भावना और प्रदर्शन प्रियता जैसे गुणो की उनमें भरमार थी। छः वर्ष की उम्र में ही बु्रसली ने फिल्मो में बाल कलाकार के रूप में काम करने लगे और 12 वर्ष के उम्र में उनके पिता ने मार्शल आर्ट प्रशिक्षण हेतु लिए उसे हांगकांग भेज दिया। 

साम्यवादी क्रांति के बाद चीनि परिवार चीन से आकर हांगकांग में बस गए और वे इन कलाओं की शिक्षा देकर अपनी रोजी रोटी चलाते थे। भाग्य से बू्रसली को एक यिप मैन नामक योग्य गुरू मिल गए और बू्रसली तन, मन, धन से मार्शल आर्ट्स प्रशिक्षण में वर्षो जुटा रहा। बू्रसली एक नजदीकी रोस्त का कहना था कि शुरूवात में बूसली बहुत लापरवाह कमजोर और डरपोक थे। जब सड़क पर कोई झगड़ा होता तो सबसे पहले वही भागते थे और अपने वरिष्ठ साथी विलियम चुंग को बुलाते थे, जो एक खतरनाक लड़का था। बाद में मार्शल आर्ट के अभ्यास से बू्रसली सबसे आगे निकल गये। वे वाशिंगटन विश्वविद्यालय से दर्शन शास्त्र में डिग्री प्राप्त थे। इनके लाइबे्ररी में 2000 से भी अधिक मार्शल आर्ट्स की पुस्तके थी। अगस्त 1964 से वे लगातार 9 बार विश्व चैम्पियन रहे। 

बू्रसली ने अनेक फिल्मों में प्रमुख हैरत अंगेज भूमिका निभाई जिसमें ब्लेड ड्रेगन, गेम ऑफ डेथ, इंटर ऑफ ड्रेगन, चाकुमास्टर, आदि प्रमुख है। एक रात ब्रूसली अपने करीबी दोस्त रेमोड चोव के साथ फिल्म की शूटिंग के लिए जा रहे थे कि रास्ते में बू्रसली अपनी कैरियर दोस्त बेट्टी टींग पेई के घर मिलने गए कि अचानक उसे ऐसा महसूस हुआ कि उसके शरीर में बिजली दौड़ रही हो, दिमाग चकरा रहा था। उसकी प्रेमिका ने उन्हे नींद की गोली खिला दी थी। ताकि वह कुछ समय आराम कर सकें और उठाकर पलंग पर लिटा दी। शीघ्र उन्हे अस्पताल ले जाया गया। परंतु डाक्टरो द्वारा लाख कोशिशे करने पर भी सफलता न मिली। बू्रसली की मृत्यु को पूरे विश्व के लोग झूठ समझते थे। विभिन्न समाचार के संपादको ने अपने अपने ढंग से मृत्यु के लिए तर्क प्रस्तुत किये, परिणाम यह हुआ कि बू्रसली की मृत्यु आज भी रहस्यमय बनी हुई है। 

उनकी मृत्यु 20 जुलाई 1976 को रात 11 बजे हांगकाग के एलिजाबेथ अस्पताल में हुई थी। इनकी शव यात्रा में 20000 लोग शामिल हुए और 13000 पुलिस वाले काफिले का घेरा बनाकर उन्हे अपनी अंतिम सलामी दी। लगभग निर्जीव हो चुकी मार्शल आटर््स, कराते, कुम्फू की इस कला को जीवन प्रदान करने का श्रेय बू्रसली को ही है। यद्यपि आधुनिक कुम्फू, कराते का जनक और आज तक सर्वश्रेष्ठ फनकार हमारे मध्य नही है। भरी जवानी में ही अचानक काल के क्रूर हाथो ने उनको हमसे छीन लिया। बू्रसली द्वारा की गई कराते, कुम्फू की सेवाओ के लिए न केवल मानव समाज उसे सदैव याद रखेगा बल्कि इस कला के पुजारी युग-युग तक उनसे प्रेरणा पाते रहेंगे। 

यद्यपि विश्वास नही होता परन्तु चरम सत्य तो यह है कि बू्रसली महज इसलिए लोकप्रिय नही हुआ कि वह कराते, कुम्फू का अद्वितीय फनकार थे, बल्कि अंतिम सांसे गिन रही इस कला को जन-जन में इसलिए लोकप्रियता प्राप्त कर पाई कि उसे बू्रसली जैसा सफल उद्धारक मिल गया। आज विश्व की अधिकांश युवा जुड़ो, कराते और कुम्फू के कला को सीखना चाहते है इसका एक मात्र कारण बू्रसली अभिनीत फिल्मे ही है। बू्रसली की वह सुस्ती-फूर्ती और मारक क्षमता ही हमें यह कला सीखने की प्रेरणा देती है। उनका नाम कला के इस दुनिया में सदैव अमर रहेगा।


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