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महासमुंद: कमार जाति महिलाओं का बांस बना कमाई का ज़रिया, बनाती हैं मनमोहक सामग्रियां

महासमुंद: बाँस कला कलाकृति प्रदेश में ही नहीं बल्कि अन्य देशों में लोकप्रिय शिल्पों में से एक है। बांस शिल्प की कलाकृतियां शहर, गांव के साथ ही अधिकांश घरों में किसी न किसी रूप में देखने का मिल जाती है, यह सुलभ, सरल एवं लोकप्रिय है। स्थानीय ग्रामीण और यहां की आदिवासी महिलायें बांस शिल्प का उपयोग और महत्व को जानती और पहचानती है, वे बांस का काम प्रमुखता से करते है और बांस से अनेक उपयोगी एवं मनमोहक सामग्रियां तैयार करते है ।

महासमुंद जिले के विकास खंड बागबाहरा ग्राम पंचायत ढोड़ की महालक्ष्मी आदिवासी महिला स्व सहायता समूह द्वारा बांस से विभिन्न प्रकार की घरेलू सजावटी सामग्री गुलदस्ता, पेन स्टेंड की रिंग, लेम्प, आदि के साथ घरेलू उपयोगी सामग्री बांस का सूपा, टोकरी, चटाई बनाई जा रही है । बांस के प्रति यहां के लोगों की रूचि और उसका बेहतर उपयोग के कारण स्थानीय निवासी महिलाओं को राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत ग्रामोउधोग हस्तशिल्प से बांस शिल्प के साथ ही काष्ठ कला का भी प्रशिक्षण दिया गया है । कमार जाति की महिलायें बांस का उपयोग कर विभिन्न प्रकार की बांस की सामग्री गुलदस्ते सूपा,टोकरी आदि बनाकर अपनी आमदनी में इजाफ़ा कर रही है ।

समूह की अध्यक्ष जयमोतिन कमार और सचिव ऊषा बाई कमार बताती है कि उनके महालक्ष्मी आदिवासी (कमार) महिला स्व सहायता 10 महिलाएँ जुड़ी है । उन्हें 15 हज़ार रुपए का अनुदान मिला ।वही उन्होंने कच्चें माल एवं अन्य सामग्रियों के लिए कम्यूनिटी इन्वेस्ट फंड (सीईएफ) से 60 हज़ार रुपए और बैंक से 2 लाख रुपए का ऋण लिया ।जिसकी किश्त अदायगी समय ओर की जा रही है ।इसके अलावा वे दोनापत्तल,अगरबत्ती,मोमबत्ती सहित अन्य सामग्रियाँ बनाती है ।जिन्हें स्थानीय बाज़ार, हाटबाज़ार के साथ आसपास के मेला मड़ई आदि में बिक्री की जाती है ।

ज़िला प्रशासन द्वारा बांस शिल्प कला में रुचि रखने वाली और महिलाओं को प्रशिक्षण देकर उन्हें आर्थिक स्थित से और मज़बूत किया जा सके । बांस का सूपा, टोकरी, चटाई जैसे दैनिक उपयोग की वस्तुयें आदि बनाने का इच्छुक महिलाओं को भी प्रशिक्षण दिया जाएगा । ताकि वे कलात्मक चीजों के साथ ये चीजें बनाकर अपना बेहतर जीवन यापन कर सके। स्थानीय लोगों को निःशुल्क प्रशिक्षण दिया जाएगा। इससे उन्हें रोजगार के अवसर मिलेंगे ।       

जिले में कौशल विकास को बढ़ावा देने के लिए राज्य सरकार की पहल पर कौशल उन्नयन के स्वरोजगारोन्मुख कार्यक्रम चलाए जा रहे है। महासमुंद मुख्यालय सहित ग्रामीण इलाक़ों के स्थानीय निवासियों एवं आदिवासी महिलाओं को बाँस कला के साथ-साथ महिलाओं की अभिरुचि और स्थानीय बाज़ार माँग के अनुसार अन्य कला में प्रशिक्षण देकर हुनरमंद बनाया जा रहा है । आदिवासी महिलाओं को बांस के निर्मित विभिन्न प्रकार की घरेलू सामग्रियों के साथ सज़ावटी,गुलदस्ते आदि बनाने की कला सिखाई जाती है। महिलाओं को बांस के द्वारा बनाई जाने वाली विभिन्न सामग्रियों का प्रशिक्षण देकर लाभान्वित किया गया जा रहा है। इस प्रशिक्षण कार्यक्रमों में ख़ासकर आदिवासी महिलाओं की विशेष तौर पर भागीदारी रही। हाल ही में आदिवासी महिलाओं द्वारा बांस निर्मित, गुलदस्ते एवं अन्य घरेलु उपयोगी बांस से निर्मित सामग्री का निर्माण किया जा रहा है। जिन्हें वे स्थानीय बाजार, हॉट-बाजारों में बेच कर अपनी आय बढ़ा रही है। इनके द्वारा बनाई जाने वाली बॉस की सामग्रियों को अशासकीय संस्थाओं द्वारा भी क्रय किया जाएगा । जिससे उनकी मासिक आय में वृद्धि तो हो रही है, उसके साथ ही उनके जीवन स्तर में सुधार आ रहा है । मापदण्ड के आधार पर 18 वर्ष से 30 साल उम्र के साक्षर लोगों को उनकी अभिरूचि के अनुसार प्रशिक्षण दिया जाता है। प्रशिक्षण के दौरान उन्हें सूप, टोकरी, कंधे पर ढोई जाने वाली बहगी, मछली फंसाने वाला जाल के साथ ही घरेलू सजावट की वस्तुएं फूलदान, हैंडबैग आदि है। जिनका विक्रय इस संस्था और आसपास के बाजारों और मड़ई मेलों प्रदर्शनी के समय विक्रय किया जाता है।

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