बसना : शोध के दौरान गढ़फुलझर में मिली सिखों के प्रथम गुरु गुर... - CG Sandesh

बसना : शोध के दौरान गढ़फुलझर में मिली सिखों के प्रथम गुरु गुरुनानक देव जी के नाम 5 एकड़ जमीन, आगे की रणनीति बनाने 7 दिसंबर को गढ़फुलझर में होगी बैठक, अप्लसंख्यक आयोग के अध्यक्ष होंगे शामिल.

हेमंत वैष्णव. बसना ब्लाक के ग्राम गढ़फुलझर में 517 वर्ष पुराना इतिहास एक शोध में निकलकर सामने आया है. 517  वर्ष पूर्व सिखों के प्रथम गुरु गुरुनानक देव जी का आगमन बसना ब्लाक के ग्राम गढ़फुलझर में हुआ था, जहाँ गुरुनानक देव जी के नाम पर 5 एकड़ जमीन का पता चला है. साथ ही यहाँ गुरुनानक देव जी से जुडी बहोत निशानियाँ मिली है.

इसपर आगे की रणनीति बनाने 7 दिसंबर को सरदार महेंद्र सिंह छाबड़ा अध्यक्ष अप्लसंख्यक आयोग छत्तीसगढ़ शासन, रायपुर के सिख समाज छतीसगढ़ के पदाधिकारी सरदार अवतार सिंह ओबरॉय, रिंकू ओबरॉय, दिल्ली से देवेन्द्र सिंह आनंद और गुरुसिंह सभा सरायपाली, बसना, पिथौरा, झलप और महासमुंद के कमेटी अध्यक्ष और पदाधिकारी 11 बजे गुरुद्वारा नानकसागर गढ़फुलझर में बैठक करेंगे.

दरअसल आज से करीब 500 वर्ष पूर्व सन्‌ 1500 से 1506 के बीच गुरुनानक देव अपनी पहली यात्रा के दौरान वे छत्तीसगढ़ भी थे. गुरुनानक देव ने 24 साल में 2 महाद्वीपों के 60 प्रमुख शहरों की यात्रा की थी.

इस दौरान गुरुनानक देव बसना से 7 किलोमीटर दूर गढ़ फुलझर रियासत में उन्होंने 2 दिन बिताए थे. भैना राजवंश के मानसराज सागरचंद उनसे इतने प्रभावित थे कि जिस जगह गुरुनानक ठहरे. वह जमीन ही उनके नाम कर दी.

रिकॉर्ड में वह 5 एकड़ जमीन आज भी गुरुनानक देव के नाम पर दर्ज है. स्थानीय लोग इसे गुरु खाब के नाम से जानते हैं. इतना ही नहीं गढ़फुलझर के समीप एक गाँव का नाम गुरुनानक देव के नाम पर है. जानकारी के अनुसार रानी सागर के नाम से एक गाँव हुआ करता था जिसे गुरुनानक जी के प्रवास के बाद बदलकर नानक सागर कर दिया गया.

गुरुनानक जी ने यह यात्रा ऊँच नीच के भेदभाव व अंधविश्वाश को ख़त्म कर समानता और सद्भावना लाने के उद्देश्य से शुरू की थी. शोध में यह बात सामने आई है कि अमरकंटक से पूरी जाते समय यात्रा के दौरान गुरुनानक जी के कदम छत्तीसगढ़ के गढ़फुलझर के आलावा शिवरीनारायण में भी पड़े थे.

इतिहास में खो चुकी 517 साल पुरानी इस अहम कड़ी का खुलासा 8 माह की शोध के बाद हुआ है. राजधानी के रिंकू ओबेरॉय को फरवरी में जानकारी मिली थी कि गढ़ फूलझर में गुरु नानकदेब का आगमन हुआ था. इसके बाद ते समाज के जानकारों के साथ वहां गए. जहाँ 8 माह में भैना राजवंश के जीवित उत्तराधिकारियों और स्थानीय लोगों से संपर्क कर जानकारी जुटाई. और सरकारी रिकॉर्ड भी खंगाला जिसमें उन्हें गुरुनानक देव के नाम की 5 एकड़ जमीन मिली.

गुरुनानक देव एक परमात्मा का संदेश देने निकले थे, अपने जीवन की 5 यात्राओं के दौरान गुरुनानक जहां भी गए एक परमात्मा की बात की और सभी को उन्हीं की संतान बताया.

उनकी यह यात्राएं आज भी कई मसलों को हल करने का रास्ता बन सकती हैं. ख़ास बात यह है कि गुरुनानक देव इन यात्रों के दौरान पड़ने वाली सभी रियासत के राजाओं व बादशाहों से मिले और उन्हें ये बातें समझाई.

इन जगहों की यात्रा की...

पहली उदासी : अपनी पहली यात्रा के दौरान गुरुनानक देव पंजाब से हरियाणा, उत्तराखंड, दिल्ली, उत्तरप्रदेश, बिहार, असम, म्यांमार पहुंचे. यहां से वे ओडिशा, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश होते हुए वापस पंजाब लौटे थे.

दूसरी उदासी : पश्चिमी पंजाब (पाक), सिंध,  समुद्री तट के  इलाके घूमते  हुए गुजरात, महाराष्ट्र, केरल, तमिलनाडु से श्रीलंका पहुंचे. फिर आंध्र, ओडिशा, कर्नाटक, मध्यप्रदेश होते हुए लौटे.

तीसरी उदासी : गुरुनानक देव  हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, तिब्बत ( सुमेर पर्वत का इलाका ) होते हुए लेह-लद्दाख, कश्मीर, अफगानिस्तान (काबूल), पश्चिमी पंजाब होते हुए वापस आए थे।

चौथी उदासी : चौथी यात्रा में पग मदीना, बगदाद, जुमाबाद, ईरान, इसफाहान काबुल, पंजाब होते हुए करतारपुर वापस लौटे थे.

पांचवी उदासी : अपनी इस यात्रा में गुरुनानक देव ज्यादातर पंजाब के भीतरी इलाकों में ही भ्रमण किया और समानता का संदेश दिया. इस दौरान उनकी उम्र 54-55 साल के आसपास थी.

शोध में ये भी सहभागी : गुरुनानक देव जी के जीवन से जुड़ी इस अहम शोध में दिल्‍ली के देवेंद्र सिंह आनंद, अवतार सिंह ओबेरॉय, हमचक्कर गोबिंद, दुर्ग के हरविंदर सिंह, तेलीबांधा गुरुद्वारे के अध्यक्ष हरकिशन राजपत ने भी सहयोग किया है.




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