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सरायपाली : बच्चों से लेकर बुज़ुर्ग तक रोज़ा रखकर कर रहे हैं अल्लाह की इबादत

सरायपाली : इन दिनों मुस्लिम समाज का पवित्र माह रमज़ान चल रहा है. मुस्लिम जनों के लिए इस माह का बहुत अधिक महत्व रहता है. इस माह बच्चों से लेकर बुज़ुर्ग तक रोज़ा रखकर अल्लाह की इबादत करते हैं. रमज़ान के इस मुबारक माह के संबंध में जब समाज के कुछ प्रबुद्ध जनों से चर्चा की गई तो उन्होंने इस प्रकार की जानकारी साझा किए.

मुस्लिम समाज के अध्यक्ष हाजी शाहिद हुसैन ने बताया कि रमज़ान के महीने में खुदा की ज़्यादा इबादत की जाती है. यह महीना आत्मा विश्लेषण करने का होता है. किसी की भावनाओं को ठेस तो नहीं पहुंची अथवा किसी के मन को तो नहीं दुखाया, इस विषय पर आत्ममंथन करते हैं. इस महीने में बुरे कार्यों को छोड़कर अच्छे कार्य करने की चाहत रहती है. उन्होंने बताया कि हदीस में सुना है कि रमज़ान के महीने में एक रुपए खर्च करने पर 70 रू का सवाब मिलता है. दिन भर भूखा रहकर गरीबों का भी ध्यान रखा जाता है, जिससे आपसी भाईचारा भी बढ़ता है.

वहीं सरायपाली के इमाम मौलाना अब्दुस्सत्तार अशरफी ने बताया कि रमज़ान का तीसरा और आखिरी अशरा 21 वें रोज़े से शुरू होकर चांद के हिसाब से 29 वें या 30वें रोज़े तक चलता है. यह अशरा सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है. तीसरे अशरे का उद्देश्य जहन्नम की आग से खुद को सुरक्षित रखना है. इस दौरान हर मुसलमान को जहन्नम की आग से बचने के लिए अल्लाह से दुआ करनी चाहिए. रमज़ान के आखिरी अशरे में कई मुस्लिम पुरुष और औरतें एअतिकाफ में बैठते हैं. बता दें कि एअतिकाफ में रहकर मुस्लिम पुरुष मस्जिद के कोने में 10 दिनों तक एक जगह बैठकर अल्लाह की इबादत करते हैं. जबकि महिलाएं घर में ही रहकर इबादत करती हैं. उन्होंने बताया कि हदीस शरीफ में है कि जिसने रमज़ान के आखिरी 10 दिनों का एअतिकाफ किया वह इंसान ऐसा है जैसा कि उसने दो हज और दो उमरे किए और इमामे हसन बसरी रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं. एअतिकाफ करने वाले को रोज़ाना एक हज का सवाब मिलता है. 

समाज के मीडिया प्रभारी जनाब खान ने बताया कि रमज़ान के महीने में अल्लाह पाक रोज़ी-रोटी में बरकत देता है. इस महीने बंदा सोंच भी नहीं सकता कि अल्लाह कहां से दे रहा है. रमज़ान के महीने में जहन्नम के दरवाजे बंद हो जाते हैं और जन्नत के दरवाज़े खुल जाते हैं. इस माह 1 खर्च करने पर अल्लाह 70 का सवाब देता है.

वहीं हाजी अब्दुल नईम लखानी ने कहा कि रोज़ा रखने से इंसान साबिर अर्थात सब्र करने वाला बनता है. आम दिनों में जब कोई थोड़ी देर के लिए भी भूखा प्यासा रहे तो परेशान हो जाता है, लेकिन इस महीने में जब रोज़ा रखते हैं तो अल्लाह रोज़ेदारों को सब्र की तौफीक अता फ़रमाता हैं.

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