news-details

बसना : बरडीह का राधा माधव मंदिर छत्तीसगढ़ में ग्रामीण क्षेत्र का पहला मंदिर जहां 26 वर्षों से दिन और रात 24 घंटा हो रहा है भगवान का अखंड नाम जाप

दिन हो या रात, गर्मी हो या बारिश, ठंड हो या बसंत, आंधी हो या तूफान फिर भी नहीं रुकता भगवान का नाम

1 दिन के 24 घंटों में 24 भक्तों की एक-एक घंटे की होती है भगवान के नाम जपने की पारी

3.5 एकड़ क्षेत्र में फैला मंदिर परिसर, मुख्य राधा माधव मंदिर के अलावा पांच अन्य मंदिर भी स्थापित

ग्रामीणों के दान पर चलता है मंदिर का संचालन, दो दर्जन से अधिक अनाथ एवं वृद्धजनों का है आश्रय स्थल

मंदिर परिसर में निर्धन एवं दहेजमुक्त सोच वाले परिवारों के लिए विवाह मंडपम भी बना सामाजिक समरसता का प्रतीक

 सी.डी. बघेल, बसना

राष्ट्रीय राजमार्ग-53 फोरलेन पर बसना और सरायपाली के मध्य सिंघनपुर से तोषगांव जाने वाले मार्ग पर, मुख्य सड़क से महज तीन किलोमीटर दूर स्थित ग्राम बरडीह का राधा माधव मंदिर आज पूरे फुलझर अंचल ही नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के ग्रामीण क्षेत्र में आस्था, सेवा और आध्यात्मिक साधना का अद्भुत केंद्र बन चुका है। जहां यह संभवतः प्रदेश के ग्रामीण अंचल का पहला ऐसा मंदिर है, जहां 1999 में मंदिर निर्माण प्रारंभ हुआ और बैसाख शुक्ल पक्ष चतुर्दशी, गुरुवार, 18 मई 2000 से यानी पिछले 26 वर्षों से दिन-रात 24 घंटे भगवान के नाम का अखंड जाप बिना रुके निरंतर जारी है।

यहां हर पल “भजो श्रीकृष्ण चैतन्य, प्रभु नित्यानंदो, जपो हरे कृष्ण, हरे रामो, श्री राधे गोविंदो” की मधुर ध्वनि वातावरण को भक्तिमय बनाए रखती है। मौसम चाहे झुलसाती गर्मी का हो, मूसलाधार बारिश का, कड़ाके की ठंड का या तेज आंधी-तूफान का—मंदिर परिसर में हरिनाम संकीर्तन की यह अविरल धारा कभी थमती नहीं। अखंड चलती रहती है। यही इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता है, जिसने इसे श्रद्धालुओं की गहरी आस्था का केंद्र बना दिया है।

इस अखंड नाम-जाप की सबसे विशेष व्यवस्था यह है कि प्रतिदिन 24 घंटे के लिए 24 श्रद्धालुओं की एक-एक घंटे की पारी निर्धारित रहती है। मंदिर के पुजारी, प्रशिक्षित भक्तगण और आश्रम में निवासरत वृद्धजन बारी-बारी से इस सेवा को निभाते हैं। इसी अनुशासन, समर्पण और अटूट आस्था ने इस परंपरा को ढाई दशक से अधिक समय तक निरंतर बनाए रखा है। श्रद्धालुओं का मानना है कि भगवान के नाम का सतत उच्चारण वायुमंडल में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है, जिससे समस्त जीव-जगत पर ईश्वरीय कृपा बनी रहती है और लोककल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है।

मंदिर समिति के सचिव डॉ. गौतम गढ़तिया ने मंदिर की परिकल्पना, दान में मिली भूमि, जनसहयोग से बने आश्रम तथा मंदिर संचालन की जानकारी देते हुए बताया कि मंदिर स्थापना ओडिशा के बाबा नरसिंग दास की अगुवाई मंदिर का निर्माण हुआ था। अभी मंदिर समिति में अध्यक्ष संतोष साहू, कोषाध्यक्ष मधुसूदन पटेल, मैनेजर चतुर्भुज भोई, कार्यकारिणी सदस्य नरिहा प्रधान सहित 21 सदस्य समिति में है। 

उन्होंने आगे बताया कि ग्राम बरडीह, भदरपाली, गिधली, मोहका और मनकी सहित आसपास के श्रद्धालुओं की प्रेरणादायी भावनाओं से प्रभावित होकर ग्राम बरडीह के कृषक संकीर्तन प्रधान ने सड़क किनारे स्थित अपनी डेढ़ एकड़ कीमती कृषि भूमि मंदिर परिसर के लिए दान कर दी थी। 

वहीं लखपति प्रधान ने लेकरू भोई बरडीह से लगभग एक एकड़ भूमि खरीदकर सरोवर निर्माण हेतु दान दी। लखपति भोई के द्वारा जमीन खरीद कर मंदिर को दान करने से प्रभावित हो कर लेकरु भोई ने भी 12 डिसमिल जमीन मंदिर को दान कर दी। इसके अलावा सचिव गौतम गढ़तिया अपनी 10 डिसमिल कृषि भूमि मंदिर को दान कर दिए हैं। उक्त कृषि भूमि में उत्पादित धान हर वर्ष मंदिर को समर्पित करते हैं, जिससे प्राप्त चावल से आश्रम में प्रसाद तैयार किया जाता है।

इसके बाद मंदिर निर्माण की पहल प्रारंभ हुई, जिसमें ग्राम बरडीह, भदरपाली, गिधली, मोहका, मनकी, सिंघनपुर, बोहारपार, गौरटेक, बरबसपुर, भूकेल, बानीपाली, तोषगांव, बसना, सरायपाली सहित पूरे फुलझर अंचल के लोगों ने यथासंभव दान देकर इस आध्यात्मिक धाम को आकार दिया।

करीब साढ़े तीन एकड़ क्षेत्रफल में फैला यह विशाल मंदिर परिसर केवल मुख्य राधा माधव मंदिर तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां निताई गौर मंदिर, हनुमान मंदिर, दुर्गा माता का मंदिर, शिव मंदिर एवं गरुड़ स्तंभ मंदिर भी स्थापित हैं, जो इसे एक संपूर्ण आध्यात्मिक धाम का स्वरूप प्रदान करते हैं। मंदिर परिसर से लगे एक एकड़ क्षेत्र में निर्मित सरोवर (तालाब ) इसकी सुंदरता और पवित्रता को और बढ़ाता है। यहां श्रद्धालु प्रतिदिन स्नान-ध्यान के बाद परिसर में स्थित फूल वाटिका से पुष्प लेकर मंदिरों में पूजा-अर्चना करते हैं।

मंदिर परिसर में है 8 बड़े हाल वाले हैं वृद्धाश्रम , 15 , 20 , 30 रहते हैं वृद्धजन

राधा माधव मंदिर की पहचान केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दो दर्जन से अधिक अनाथ एवं वृद्धजनों का आश्रय स्थल भी है। यहां निवासरत वृद्धजन इस पावन भूमि को अपने लिए यज्ञ, पूजा, तप, कर्म, जनकल्याण और मोक्ष प्राप्ति का स्थल मानते हैं। उनके लिए यह स्थान किसी स्वर्गलोक से कम नहीं, जहां जीवन के अंतिम पड़ाव में उन्हें शांति, सम्मान और आध्यात्मिक संतोष प्राप्त होता है। मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार के दोनों ओर चार-चार विशाल हाल बनाए गए हैं, जहां वृद्धजन निवास करते हैं। 

पिछले 26 वर्षों से यहां 20 से 30 अनाथ एवं स्वेच्छा से आए वृद्धजन निवास कर रहे हैं। मंदिर समिति द्वारा उन्हें सुबह का नाश्ता, दो समय का पौष्टिक भोजन, रोटी, दाल, चावल एवं हरी सब्जियां उपलब्ध कराई जाती हैं। सभी के लिए पलंग, मच्छरदानी, ठंड के मौसम में शॉल, स्वेटर, मोजे तथा बरसात के समय छाता और चरण पादुका की व्यवस्था की जाती है। स्वास्थ्य खराब होने पर उनका समुचित उपचार कराया जाता है तथा आवश्यकता पड़ने पर वाहन की व्यवस्था कर सरकारी अथवा निजी अस्पताल में इलाज भी करवाया जाता है।

विशेष बात यह है कि मंदिर समिति की कोई स्थायी संपत्ति नहीं है। मंदिर का संपूर्ण संचालन ग्रामीणों और श्रद्धालुओं के दान व सहयोग से होता है, जो यहां की सेवा भावना और सामाजिक सहभागिता का जीवंत उदाहरण है।

परिसर में है दहेज मुक्त शादी मंडपम , अब तक 250 से ज्यादा वर वधु की हो चुकी है विवाह

मंदिर परिसर में निर्मित शादी मंडपम सामाजिक सरोकारों की एक प्रेरक मिसाल प्रस्तुत करता है। यहां निर्धन, गरीब और असहाय परिवारों के साथ-साथ दहेजमुक्त सोच रखने वाले वर-वधू पक्षों के बच्चों का राजी खुशी से विवाह सादगीपूर्ण वातावरण में संपन्न कराया जाता है। यह पहल समाज को दहेज प्रथा जैसी कुरीतियों से दूर रहने का सकारात्मक संदेश देती है। हर वर्ष 10 से 12 या 15 वर वधु का यहां विवाह होता है। अब तक यहां 250 से अधिक जोड़ों का विवाह संपन्न कराया जा चुका है।

मंदिर परिसर में भगवान के भोग के लिए पृथक भोग गृह, पाकशाला तथा निवासरत वृद्धजनों एवं श्रद्धालुओं के निःशुल्क भोजन हेतु सुसज्जित रसोईघर भी बनाया गया है।

मंदिर में हर त्यौहार को धूमधाम से मनाया जाता है। संपूर्ण छत्तीसगढ़ में बरडीह का राधा माधव मंदिर आज केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आस्था, सेवा, संस्कार और जनकल्याण का जीवंत केंद्र बन चुका है। 26 वर्षों से अनवरत गूंजता हरिनाम इस बात का प्रमाण है कि जब श्रद्धा सेवा से जुड़ती है, तो वह समाज के लिए प्रेरणा, लोकमंगल और मानवीय संवेदनाओं का सशक्त माध्यम बन जाती है।


अन्य सम्बंधित खबरें