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पीजी पोर्टल में शिकायत के बाद भी नहीं मिल रहा न्याय, जाँच प्रणाली में सुधार की आवश्यकता, आजादी के 79 साल बाद भी शिकायत के जाँच में स्वतंत्रता नही.

डिजिटल सुशासन बनाम जमीनी हकीकत

आज भारत की आजादी को 79 वर्ष पुरे हो चुके हैं और देश भर में 80वाँ स्वतंत्रता दिवस मनाया जा रहा है. आजादी के बाद से अब तक देश मे काफी कुछ बदलते देखा गया है. तकनीक के क्षेत्र में भी देश ने काफी तरक्की कर ली है. वहीँ इस देश में नागरिकों की समस्या के निवारण हेतु भी अब डिजिटल शिकायत प्रणाली उपलब्ध है. जिसमे नागरिक अपनी समस्या और भ्रष्टाचार के खिलाफ शिकायत कर सकें. 

इसी उद्देश्य से केंद्र सरकार ने एक केन्द्रीकृत लोक शिकायत निवारण और निगरानी प्रणाली ऑनलाइन स्थापित की है जिसके माध्यम से ऑनलाइन शिकायतें दर्ज की जाती है. इसका उद्देश्य नागरिकों को उनकी शिकायतों के निवारण के लिए मंच प्रदान करना है. यदि देश में किसी भी सरकारी संगठन के खिलाफ कोई शिकायत है, तो आप यहां अपनी शिकायत दर्ज कर सकते हैं जो तत्काल निवारण के लिए संबंधित मंत्रालय / विभाग / राज्य सरकार के पास भेज दिए जाते हैं.  इसी तर्ज पर छत्तीसगढ़ राज्य में जनशिकायत पोर्टल अथवा सीएम हेल्पलाइन भी संचालित किये जाते हैं.

अब इतना सब कुछ पढने में और सुनने में तो काफी कुछ अच्छा लगता है, लेकिन इसकी वास्तविकता कुछ और है. इस पोर्टल के माध्यम से शिकायत के बावजूद कई लोग वर्षों तक न्याय पाने का इंतज़ार करते हैं, समय की बर्बादी के अलावा कुछ नहीं रह जाता है. भले ही शिकायत दर्ज करने का तरीका बदल गया हो लेकिन जाँच का तरीक आज भी वहीँ पुराना है. आज हम आपको ऐसे प्रत्यक्ष उदाहरण देकर समझायेंगे की, किस तरह जाँच का यह तरीक पक्षपातपूर्ण बना हुआ है. और किस तरह के बदलाव की आवश्यकता है.

उदहारण के लिए छत्तीसगढ़ के दो शिकायतों का जिक्र करेंगे जिसमे पहले बात करते हैं, 14 अगस्त 2026 को स्वदेश नामक एक अखबार की जिसके रायपुर संस्करण पेज क्रमांक 09 पर फसल बीमा पर हो रहे भ्रष्टाचार का एक मामला प्रकाशित किया गया था. शीर्षक लापरवाही को लेकर था “7 दिनों में जांच के आदेश के बाद डेढ़ माह तक छाई हुई है खामोशी”, फसल बीमा में क्रॉप कटिंग का खेल 8 गांवों के उत्पादन आंकड़ों पर उठे सवाल.

खबर के अनुसार इस मामले मे भंवरपुर निवासी भोजराम प्रधान ने जन शिकायत पोर्टल इसकी शिकायत की थी. जिसमे आरोप लगाया गया कुछ चुनिंदा पटवारियों के कार्यक्षेत्र में लगातार औसत उत्पादन कम दर्ज किया जाता है. जिनके पूर्व वर्षों के फसल प्रयोग, बीमा भुगतान और धान खरीदी के रिकॉर्ड की भी जांच की जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि कहीं फसल बीमा का लाभ प्रभावित करने के लिए आंकड़ों में हेरफेर तो नहीं हुआ.

फसल बीमा को लेकर कई जगह से ऐसी ही खबरें सामने आते रहती है जिसमे बीमा कंपनियां, स्थानीय कर्मचारी पटवारी, कृषि विस्तार अधिकारी और बिचौलिए मिलकर जानबूझकर बहुत कम उपज दर्ज करते हैं. कागजों में उपज जितनी कम दिखाई जाती है बीमा कंपनी को उतना ही ज्यादा मुआवजा दिया जाता है. और आपस में बाँट लिया जाता है, यह फर्जीवाड़ा करोड़ों में किया जाता है, जिसके पुरे देश में छोटे-छोटे जगहों को निशाना बनाकर किये जाने की आशंका है. 

शायद इस भ्रष्टाचार में तार ऊपर से लेकर नीचे तक जुड़े रहते हैं, इसलिए कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो पाती, और शिकायत में बना ऑनलाइन पोर्टल भी इसकी जाँच में फेल हो जाता है. आखिर कैसे ऑनलाइन पोर्टल में भी शिकायत के बाद इस पर कोई कार्रवाई नहीं होती इसको विस्तार से समझते हैं.

इस मामले भोजराम प्रधान ने जन शिकायत पोर्टल पर इसकी शिकायत की थी, जिसके बाद पोर्टल उसे संबंधित विभाग के वरिष्ठ अधिकारी जैसे उप संचालक कृषि या कलेक्टर को भेजता है. वरिष्ठ अधिकारी उस जांच को नीचे उसी तहसीलदार, एसडीएम या कृषि अधिकारी को ट्रांसफर कर देते हैं, जिनके नीचे यह फर्जीवाड़ा पनप रहा होता है. यानी जो खुद इसमें लिप्त या जिम्मेदार है, वही अपनी खुद की जांच करता है. आप जरा खुद सोचिये यदि कोई व्यक्ति या विभाग अपने ही खिलाफ हुए शिकायत के मामले में खुद जांचकर्ता हो तो क्या वह सही जाँच करेगा क्या ऐसी उम्मीद रखी जा सकती है ? क्या यह जाँच और न्याय के सिधान्तो के खिलाफ नहीं है. अगर आरोपी ही जाँच करने लगे तो दोष कहाँ सिद्ध होगा और न्याय कैसे मिलेगा?

इसी तरह हमने भी CPGRAMS (PG Portal) और जनशिकायत पोर्टल पर नवंबर 2025 को छत्तीसगढ़ जनसंपर्क विभाग के खिलाफ विज्ञापन के नाम पर शासकीय राशि का दुरुपयोग करने की शिकायत की थी. लेकिन इन दोनों पोर्टल के माध्यम से जाँच के लिए फ़ाइल को छत्तीसगढ़ जनसंपर्क विभाग को ही सौंप दिया, 8 माह बाद भी कार्यवाही नहीं होने से cmhelpline.cg.gov.in पर भी इसकी शिकायत की गई. लेकिन इस पोर्टल पर भी वही हुआ और सारे दावे हमारे लिए गलत सिद्ध हो गए. शायद ये सभी पोर्टल केवल राशनकार्ड, पेंशन और ड्राइविंग लाइसेंस बनाने के उपयोग में आ रहे हैं.

यदि सरकार चाहती है कि वाकई में नागरिको द्वारा की गई शिकायत का निराकरण सही समय पर होना चाहिए तो उन्हें जाँच की इस प्रक्रिया में बदलाव करने चाहिए, शिकायतों की जाँच का अधिकार उस विभाग के पास न होकर एक पृथक व स्वतंत्र जाँच प्रक्रिया होनी चाहिए, एक निश्चित समय के भीतर निष्पक्ष जाँच होनी चाहिए, जाँच की गुणवत्ता जाँचने के लिए थर्ड-पार्टी एजेंसियों से रैंडम आधार पर भौतिक सत्यापन कराया जाना चाहिए. जाँच प्रक्रिया में पूर्ण रूप से पारदर्शिता होनी चाहिए एवं दोषियों को कड़ी सजा मिलनी चाहिए.

कई लोग आज न्याय नहीं मिलने और अपने साथ हो रहे भ्रष्टाचार को लेकर परेशान है, आज देश में चाहे वह परीक्षाओं में धांधली को लेकर जंतर-मंतर पर युवाओं का विरोध-प्रदर्शन हो, या फिर पीजी पोर्टल पर सामान्य शिकायतों के लिए भटकता आम नागरिक. हर जगह व्यवस्था की टालमटोल और आंतरिक जांच प्रणाली पर ही सवाल उठ रहे हैं. जनआक्रोश का पनपना यह साबित करता है कि जनता का भरोसा अब पुरानी जांच व्यवस्था से उठ रहा है

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले से अपने संबोधन में अगले एक साल के भीतर देश के 1 करोड़ युवाओं को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में कौशल प्रशिक्षण देने की घोषणा की है. लेकिन अब अब न्याय प्रक्रिया में सरकार को स्वयं प्रशिक्षण लेने की आवश्यकता है.

भ्रष्टाचार को बढ़ावा और मुख्यमंत्री के जीरो टोलरेंस निति को चुनौती देता जनसंपर्क विभाग, पीजीपोर्टल, जनशिकायत, सीएमहेल्पलाइन लाइनपर की गई शिकायत सब बेअसर


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