कमरछठ पर गूंजा मातृत्व और आस्था का रंग, संतान की सुख-समृद्धि... - CG Sandesh

कमरछठ पर गूंजा मातृत्व और आस्था का रंग, संतान की सुख-समृद्धि के लिए माताओं ने रखा व्रत

रायपुर : छत्तीसगढ़ में बुधवार को माताओं ने अपनी संतानों की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और उज्ज्वल भविष्य की कामना के साथ हलषष्ठी यानी कमरछठ का व्रत रखा। सुबह से ही शहरों से लेकर गांवों तक पूजा स्थलों और मंदिरों में महिलाओं की भीड़ देखने को मिली। जगह-जगह महिलाओं ने सामूहिक रूप से सगरी बनाकर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की और हलषष्ठी माता से अपनी संतानों के कल्याण की कामना की।

राजधानी रायपुर के महामाया मंदिर सहित कई स्थानों पर कमरछठ को लेकर विशेष उत्साह देखने को मिला। व्रती महिलाएं हाथों में पूजा की थाली और पारंपरिक पूजन सामग्री लेकर पूजा स्थलों पर पहुंचीं। महिलाओं ने सगरी तैयार कर उसे फूलों से सजाया और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ पूजा-अर्चना की। पूजा के बाद हलषष्ठी माता की कथा का श्रवण कर संतान की दीर्घायु और परिवार की खुशहाली की कामना की गई।

दूधाधारी मठ में भी हुई सामूहिक पूजा

रायपुर के मठपारा क्षेत्र में भी कमरछठ पर्व श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया गया। माताओं ने अपने संतानों के कल्याण की कामना को लेकर व्रत रखा और श्री दूधाधारी मठ सत्संग भवन में सामूहिक रूप से हलषष्ठी व्रत की पूजा-अर्चना की। पूजा के दौरान भैंस के दूध, दही और घी सहित बिना हल चलाए स्थान से प्राप्त अनाज और साग-सब्जियों का उपयोग किया गया।

हलषष्ठी व्रत की पूजा पंडित राजीव लोचन त्रिपाठी, जय शुक्ला और अंकुश दुबे द्वारा संपन्न कराई गई। इस दौरान श्रीमती पांडे, श्रीमती सुधा ओझा, श्रीमती संध्या वैष्णव, श्रीमती पूजा, श्रीमती भावना, श्रीमती लक्की दुबे, श्रीमती सती साहू, श्रीमती रोशनी, श्रीमती बुटिया कर्ष सहित बड़ी संख्या में मोहल्ले की माताएं शामिल हुईं।

राजनांदगांव में जगह-जगह बनाई गई सगरी

राजनांदगांव शहर में भी कमरछठ का पर्व श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया गया। माताओं ने संतान की लंबी उम्र की कामना को लेकर व्रत रखा और शहर के अलग-अलग गली-मोहल्लों, चौक-चौराहों में सगरी बनाकर शिव पंचायत की पूजा-अर्चना की।

महिलाओं ने जमीन पर प्रतीकात्मक सगरी तैयार कर उसे फूलों से सजाया और विधि-विधान से पूजा की। पूजा के दौरान महिलाओं ने कथा सुनी और अपनी संतानों के सुखी एवं मंगलमय जीवन की कामना की। पूरे शहर में सुबह से ही कमरछठ को लेकर धार्मिक और उत्सवी माहौल देखने को मिला।

छुईखदान में भी दिखी पर्व की रौनक

छुईखदान में भी कमरछठ पर्व को लेकर खास उत्साह देखने को मिला। महिलाओं ने संतान की सुख-समृद्धि, अच्छे स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना के साथ व्रत रखा। नगर के अलग-अलग क्षेत्रों, गली-मोहल्लों और चौक-चौराहों पर सगरी बनाकर भगवान शिव परिवार और देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना की गई।

पर्व को लेकर बाजार में भी विशेष रौनक रही। बाजार लाइन से लेकर बस स्टैंड तक पूजा सामग्री की दुकानें सजी रहीं। पसहर चावल, दोना-पत्तल और अन्य पारंपरिक पूजन सामग्री की जमकर खरीदारी हुई। खास तौर पर पसहर चावल की मांग रही। ग्रामीण क्षेत्रों में भी पर्व को लेकर पहले से तैयारियां की गई थीं।

गरियाबंद में सैकड़ों महिलाओं ने की सामूहिक पूजा

गरियाबंद के पुराना मंगल बाजार चौक पर वार्ड क्रमांक 14 और 15 की सैकड़ों महिलाओं ने सामूहिक रूप से कमरछठ की पूजा-अर्चना की। सुबह से ही यहां महिलाओं की भीड़ जुटनी शुरू हो गई थी। पारंपरिक वेशभूषा में पहुंची महिलाओं ने सगरी बनाकर पूजन सामग्री अर्पित की और षष्ठी माता से अपनी संतानों के स्वस्थ, सुखी और दीर्घ जीवन की कामना की।

पूजा के दौरान भैंस के दूध, दही और घी के साथ लाई, महुआ, तिल और अन्य पारंपरिक सामग्रियों का उपयोग किया गया। महिलाओं ने पूजा के बाद कथा का श्रवण किया। इस दौरान पुराना मंगल बाजार चौक पूरी तरह भक्ति और आस्था के रंग में रंगा नजर आया।

बलराम जयंती से जुड़ी है हलषष्ठी की मान्यता

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई भगवान बलराम का जन्म हुआ था। इसी वजह से इस दिन को बलराम जयंती और हलषष्ठी के रूप में भी मनाया जाता है। भगवान बलराम का प्रमुख शस्त्र हल माना जाता है, इसलिए इस पर्व में हल और हल से जुती भूमि से प्राप्त अनाज के उपयोग को लेकर विशेष मान्यताएं हैं।

छत्तीसगढ़ में यह पर्व कमरछठ या खमरछठ के नाम से विशेष रूप से मनाया जाता है। मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से व्रत और पूजा करने से संतानों पर भगवान का आशीर्वाद बना रहता है और परिवार में सुख-शांति एवं समृद्धि आती है। इसी आस्था के साथ माताओं ने निर्जला व्रत रखकर भगवान शिव-पार्वती और षष्ठी माता की पूजा-अर्चना की।

छत्तीसगढ़ के अलग-अलग जिलों में कमरछठ के मौके पर देखने को मिला यह दृश्य केवल धार्मिक आस्था का नहीं, बल्कि लोक परंपरा, मातृत्व और सामूहिक संस्कृति का भी प्रतीक रहा। शहर से गांव तक सगरी पूजा और पारंपरिक रीति-रिवाजों के बीच पूरा प्रदेश कमरछठ की आस्था में रंगा नजर आया।


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