
केवल पोस्टर और कार्यक्रम में चेहरे चमका रहे भाजपा नेता, जनता की समस्या से नही कोई सरोकार, किसानों को नही मिल रहा खाद
छत्तीसगढ़ के किसान इस समय खाद और यूरिया के लिए बेहद संघर्ष करते नजर आ रहे हैं, 2025 में विकसित भारत की कल्पना आप कुछ ऐसे कर सकते हैं कि, जमाखोरी और कालाबाजारी के जड़ों की गहराई इतनी है कि इसके खिलाफ आप आवाज नहीं उठा सकते. ऐसा नहीं है कि स्थानीय भाजपा नेता इस समस्या से अवगत नहीं है, परन्तु अपनी ही सरकार के खिलाफ आवाज कैसे उठायें ? ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह कालाबाजारी राजनैतिक संरक्षण में की जाती है ? किसान आज 266 रुपये का यूरिया 800 रुपये में खरीदने को मजबूर है, जहाँ कई किसानों को समय पर यूरिया तक नहीं मिल पा रहा है, तो वहीँ इन समस्याओं को नजर अंदाज करते मुख्यमंत्री दक्षिण कोरिया के दौरे पर हैं.
सरकार की बात करें तो सरकार लागातार कह रही है कि समिति में पर्याप्त खाद का भण्डार है, लेकिन किसान कहते हैं कि उन्हें खाद नहीं मिल रहा है ? ऐसे में सवाल यह भी है कि लोगों के बीच भ्रामक जानकारी फैलाने का कार्य कौन कर रहा है सरकार या किसान ? हलाकि बीजेपी के स्थानीय नेता इस मुद्दे को उठाने या इस पर कुछ कहने से बचते नजर आते हैं. यह जनप्रतिनिधि केवल पोस्टर और कार्यक्रमों में अपने चेहरे चमकाते नजर आते हैं. सोशल मीडिया में ये जनप्रतिनिधि लागातार इनकी समस्या देखते हैं, पढ़ते हैं, लेकिन अपनी प्रतिक्रिया इस प्रकार देते है कि जैसे कुछ हुआ ही ना हो, यदि कोई किसान अपनी समस्या को इसके सोशल मीडिया पोस्ट में कमेंट करता है तो उसका समाधान ना कर उसे किसी प्रकार कोई सान्तवना ना देकर वह पोस्ट ही डिलीट कर देते हैं. मानो सता और पद मिलने के बाद जनता की समस्या से उनका कोई सरोकार नहीं.
इसके पहले जब छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार थी, तब भी किसानों को खाद की समस्या आई थी, जिसमे कई बार किसानों ने आन्दोलन भी किया, महासमुंद जिले के बसना थाना अंतर्गत ग्राम सिंघनपुर में किसानों द्वारा चक्काजाम करने का भी प्रयास किया गया था. इस समय किसानों की समस्या के साथ कुछ नेता भंवरपुर से विद्याचरण चौधरी, पिथौरा छान्दनपुर से सोहन पटेल नजर आये थे. वर्त्तमान सांसद रूपकुमारी चौधरी का भी इस आन्दोलन को समर्थन मिला था. लेकिन समय बदला और आज आन्दोलन का समर्थन करने वाले सत्ता में पहुँच गए. लेकिन सत्ता में पहुंचने के बाद वे अब ऐसे समस्याओं को नजर अंदाज करते नजर आ रहे हैं.
मजबूरन अब भाजपा की सरकार में भी किसानों ने चक्काजाम करने का निर्णय लिया है, किसान 1 सितम्बर को चक्काजाम करेंगे, ऐसे नहीं है कि भाजपा के नेता क्षेत्र में दिखाई नहीं दे रहे इन समस्याओं के बीच भाजपा नेताओं के कार्यक्रम लगातार हो रहे हैं, फटाके फुट रहे हैं, लेकिन ये कार्यक्रम केवल अपने चेहरे चमकाने के लिए किये जा रहे हैं. यदि किसानों की समस्या से इन्हें कोई सरोकार होता तो एक कार्यक्रम किसानों के नाम कर उनकी भी खुले मंच से समस्या सुनते और समाधान करते. लेकिन ऐसा होने से रहा. ऐसे में अब किसानों को अपनी लड़ाई खुद लड़नी होगी.