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बसना के वेदभानु प्रधान ने गीता–वेद–उपनिषद कंठस्थ कर रचा नया कीर्तिमान

1,67,000 रुपया की पुरस्कार राशि के साथ महासमुंद जिले को गौरवान्वित किया

सी.डी. बघेल, बसना। बसना विकासखंड के ग्राम पलसापाली में जन्मे वेदभानु प्रधान, जो वर्तमान में गुरुकुल हरिद्वार में कक्षा 12वीं में अध्ययनरत हैं, आज पूरे महासमुंद जिले के लिए प्रेरणास्रोत बन चुके हैं। सरस्वती शिशु मंदिर बसना से प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद उनके माता–पिता एवं दादा–दादी ने उन्हें चरित्र निर्माण एवं संस्कार संवर्धन के उद्देश्य से पतंजलि गुरुकुल, हरिद्वार में प्रवेश दिलाया। यहाँ पाँच वर्षों तक कठोर तप, अनुशासन और ऋषि परंपरा के अनुरूप जीवन जीते हुए वेदभानु ने अद्भुत साधना और अध्ययन कर 25 ऋषिकृत ग्रंथों को पूर्णतः कंठस्थ किया। यही साधना उन्हें राष्ट्रीय पटल पर विशेष पहचान दिलाने में आधार बनी। अब शास्त्रीय कण्ठपाठ प्रतियोगिताओं में भी वेदभानु ने सर्वाधिक उपलब्धियाँ अर्जित कर नया कीर्तिमान स्थापित किया है। 

नवीनतम घोषित पुरस्कार राशि के अनुसार वेदभानु को प्रथम स्थान प्राप्त हुआ है और उन्हें कुल ₹1,67,000 की पारितोषिक राशि प्रदान की गई है। उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता, केनोपनिषद्, माण्डूक्य उपनिषद्, अष्टाध्यायी, शब्दरूप, धातुरूप, धातुपाठ, चाणक्य नीति, फिट्सूत्र, योगदर्शन, निघण्टु और ईशोपनिषद जैसी विधाओं में उत्कृष्ट कण्ठपाठ प्रस्तुत किया है। प्रतियोगिता के अन्य प्रतिभागियों — जय ₹66,500 रुपए, अनन्त कृष्ण 56,500 रुपए, युधिष्ठिर 53,500 रुपए और अर्जुन 46,000 रुपया प्राप्त कर विभिन्न शास्त्रों में दक्षता दिखाई । किंतु वेदभानु अपनी व्यापक विद्वत्ता और अद्वितीय कंठस्थ क्षमता के कारण शीर्ष स्थान पर रहे, जिससे महासमुंद जिले का गौरव और अधिक बढ़ गया है।

2 जून 2023 को आस्था चैनल पर बाबा रामदेव के लाइव योग शिविर के दौरान वेदभानु ने गीता, वेद और उपनिषदों के पूछे गए अध्यायों का अविकल पाठ कर सबका ध्यान आकर्षित किया था। यह क्षण उनके गुरुकुल, परिवार और महासमुंद जिले के लिए अत्यंत गौरवपूर्ण रहा। वेदभानु ने श्रीमद्भगवद्गीता, संपूर्ण यजुर्वेद, नौ उपनिषद, अष्टाध्यायी, धातुपाठ, लिङ्गानुशासन, निघण्टु, उणादिकोष, गणपाठ, व्यवहारभानु और मनुस्मृति जैसे अनेक शास्त्र कंठस्थ कर अपनी विलक्षण मेधा का परिचय दिया था। वेदभानु का पूरा परिवार गुरुकुल परंपरा और भारतीय संस्कृति के संरक्षण के लिए समर्पित है। उनके पिता ताराकांत प्रधान, माता सौदामिनी प्रधान—जो वर्तमान में शासकीय उच्चत्तर माध्यमिक विद्यालय अंकोरी में संस्कृत व्याख्याता हैं—तथा दादा–दादी ने सदैव उनके ज्ञानार्जन और संस्कार निर्माण में सहयोग दिया।

उनकी बहन उत्तर प्रदेश के चोटीपुरा गुरुकुल में अध्ययनरत है और उनके चाचा आचार्य दिलीप कुमार ओडिशा के नुआपाड़ा जिले में गुरुकुल हरिपुर का संचालन कर रहे हैं। वेदभानु का कहना है कि यदि वेदों को जीवंत रखना है तो वेद अध्ययन केंद्र, वेदशालाएं और वेदाचार्यों की संख्या बढ़ानी होगी। संस्कृत को केवल भाषा के रूप में पढ़ाने से काम नहीं चलेगा, बल्कि उसे शोध, ज्ञान और जीवन की केंद्रीय धारा बनाना होगा। भारतीय वैदिक साहित्य से दूर होना समाज को आर्थिक, सामाजिक और आध्यात्मिक रूप से कमजोर बनाता है। वेदभानु युवाओं को वैदिक ज्ञान–विज्ञान की ओर प्रेरित कर भारत को पुनः विश्वगुरु बनाने का संकल्प करते हैं। फुलझर अंचल सहित बसना क्षेत्र के ग्रामीणजन वेदभानु प्रधान के उज्ज्वल भविष्य और सतत प्रगति के लिए प्रभु से मंगलकामनाएँ कर रहे हैं। वेदभानु आज न केवल अपने गुरुकुल और परिवार बल्कि पूरे जिले के लिए प्रेरणा के प्रतीक बन चुके हैं।


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