OLA, UBER, rapido ने कार मालिकों को बनाया डिजिटल मजदुर, क्या इस डिजिटल पूंजीवाद से बढ़ रही अमीर और गरीब के बीच की खाई
पूंजीवाद एक ऐसी आर्थिक प्रणाली है जिसमें संसाधनों, उद्योगों और संपत्ति पर सरकार के बजाय निजी व्यक्तियों या निजी कंपनियों का स्वामित्व होता है. इसके विरोध में कई बार तर्क दिए जाते हैं कि पूंजीवादी अपने मुनाफे के लिए मजदुरों का शोषण और पर्यावरण का विनाश करते हैं. जिसके चलते समाज में क्रांति और समाजवाद का जन्म होता है.
अगर इतिहास की बात करें तो 19वीं शताब्दी में जब यूरोप में औद्योगिक क्रांति आई, तब पूंजीवाद अपने चरम पर था. इसके परिणामस्वरूप समाजवाद एक वैचारिक आंदोलन के रूप में उभरा.
पूंजीवादी लोग अक्सर अपने मुनाफे के लिए लोगो का शोषण कर उनसे कई घंटों काम करवाते हैं, उसके बदले मजदूरों या कर्मचारियों को कभी भी उचित मूल्य नहीं नहीं जाता. जबकि उन मजदूरों या कर्मचारियों के बदले पूंजीवादीयों को कई गुना मुनाफा होता है.
अब 21 सदी में जमाना बदल गया है, हर कार्य आज डिजिटल हो चूका है. अब पूंजीवाद भी डिजिटल होने लगा है. और इस डिजिटल के ढांचे में काम करने वाले लोग डिजिटल मजदुर बन गए हैं.
लेकिन इतिहास बताता है कि जब भी पूंजीवाद चरम पर होता है तो क्रांति और समाजवाद का जन्म होता. तो इस बढ़ते डिजिटल पूंजीवाद में भी क्रांति और समाजवाद का जन्म होना निश्चित था.
इसका एक स्वरुप देखने को मिला ओडिशा के भुवनेश्वर में जहाँ ऑटो और निजी वाहन चालक, मालिकों ने OLA, UBER और rapido के खिलाफ आन्दोलन कर दिया. 17 अगस्त की तारीख को शुरू किये गए इस आन्दोलन के दो दिन शांति पूर्ण बीते, लेकिन 19 अगस्त को इस आन्दोलन ने आराजकता का रुप ले लिया.
आन्दोलन में शामिल लोगों ने 14 बस और निजी वाहन पर तोड़फोड़ की, इस दौरान पुलिस पर पत्थर भी फेके गए, राह चलते लोगों को परेशान किया गया. इससे करीब 10 लाख रुपये की सम्पति का नुकसान हुआ. कोई भी आन्दोलन में उपद्रव, पथराव और आम जनता को परेशान करना किसी भी न्यायसंगत आंदोलन का हिस्सा नहीं हो सकता. चालकों की मांगें कितनी भी सही क्यों न हों, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाकर क्रांति या समाजवाद का निर्माण नहीं किया जा सकता.
इसके बाद पुलिस ने भी आंदोलन करने वालों पर जमकर लाठियां बरसाई, 113 लोगों को गिरफ्तार किया, 354 ऑटो वाहन जप्त किये, जिनके परमिट कैंसल किये जाने की बात कही जा रही है.
वहीँ इस घटना के बाद आन्दोलन के मुख्या दीनबंधू नायक क्षमा प्रार्थना मांगते हुए कहा कि आदोलनकारियों के लिए गुंडा जैसे शब्द का इस्तेमाल लिया गया, जो कि आन्दोलनकारियों को बुरा लगा.
लेकिन क्या वजह थी कि इन ऑटो और निजी वाहन चालक, मालिकों को यह आन्दोलन करना पड़ा. दरअसल ये सभी OLA, UBER और rapido ऑनलाइन टैक्सी बुकिंग में मिलने वाले मुनाफे के खिलाफ हैं. इनका कहना है कि ये कंपनिया इन्हें जो पैसे दे रही है इससे इनका घर परिवार चलना मुश्किल हो गया है.
कई वाहन मालिकों ने कर्ज लेकर वाहन खरीदा है, जिसके बाद उन्हें ईएमआई चुकाने में भी दिक्कतें आ रही है. इनका कहना है कि कई बेरोजगार युवा इसे पार्ट टाइम समझकर इस काम से जुड़ गए हैं जो कम पैसे में परिवहन को तैयार हो जाते हैं, लेकिन जिनका परिवार बड़ा है, जो इसी के माध्यम से अपना जीवन यापन करते हैं उन्हें संकटों का सामना करना पड़ता है.
इस ऐप्स में वाहन चालक को रेटिंग दी जाती है, अगर कोई कस्टमर इनसे दुर्व्यवहार करे तो इनकी शिकायत कर दी जाती है, लेकिन कस्टमर जो चालकों से दुर्व्यवहार करते हैं उसकी कोई सुनवाई नहीं होती.
वहीँ अगर उपभोक्ता के दृष्टिकोण से देखा जाए तो ऐप्स के आने से पहले ऑटो, टैक्सी चालकों द्वारा मनमाना किराया वसूलना, मीटर से न चलना और यात्रियों से दुर्व्यवहार आम बात थी. जिससे उपभोक्ता भी अब इसे इस्तेमाल करने के लिए प्राथमिकता देते हैं.
अगर इसे समझा जाए तो यह डिजिटल पूंजीवाद का एक बेहद सटीक उदाहरण है, जिसमे OLA, UBER और rapido जैसी कंपनियों ने ना कार खरीदी, ना ऑटो खरीदे, ना उसने चालकों को वेतन पर रखा लेकिन फिर भी वह आज इन वाहन मालिकों से कई ज्यादा मुनाफा कमा रही है. और ये वाहन मालिक इनके लिए डिजिटल मजदुर बन गए हैं.
कुछ पूंजीपतियों ने देखा होगा कि ट्रेवल एजेंसी और लोकल ऑटो में भी मुनाफा है, जिसके बाद इन्होने OLA, UBER और rapido जैसी कंपनी एप्प के माध्यम से बाजार ले आई, शुरुआती दौर में इन कंपनियों ने नुकसान उठाकर यात्रियों को मुफ्त यात्राएं कराई, वाहन चालकों को भी लुभाने के लिए कई ऑफर दिए. जब इनका ऑनलाइन व्यापर जम गया इनके पास हजारों लाखों की संख्या में वाहन पंजीयन हो गए, लोगों को इनकी लत लगवाई और अब मुनाफा बटोरने में जुड़ गए. जिसके चलते अब वाहन चालक मालिकों को आर्थिक परेशानियों का सामना करना पड़ है. वाहन मालिक होते हुए इस डिजिटल सिस्टम ने उन्हें डिजिटल मजदुर बनने पर मजबूर कर दिया है, जहाँ उनका शोषण होने लगा है और इनकी मांगे सुनने वाला कोई नहीं है, और इस डिजिटल पूंजीवाद के खिलाफ नई क्रांति और समाजवाद का जन्म होता दिखाई दे रहा है.