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घरेलू हिंसा के मामले में पुरुष भी पीड़ित : पुरुष आयोग बनाने की मांग

दुनिया के दूसरे देशों की तरह भारत भी घरेलू हिंसा की समस्या से जूझ रहा है. महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा को रोकने के लिए कठोर कानून भी बने हैं, लेकिन पुरुष भी घरेलू हिंसा का शिकार होते हैं.

घरेलू हिंसा या फिर महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा को लेकर न सिर्फ अक्सर बातें होती हैं बल्कि कठोर कानून भी बने हैं, बावजूद इसके इनमें कोई कमी नहीं दिखती. लेकिन इस घरेलू हिंसा का एक पक्ष यह भी है कि घरेलू हिंसा के पीड़ितों में महिलाएं ही नहीं बल्कि पुरुष भी हैं लेकिन उनकी आवाज इतनी धीमी है कि वह न तो समाज को और न ही कानून को सुनाई पड़ती है.

पारिवारिक मसलों को सुलझाने के मकसद से चलाए जा रहे तमाम परामर्श केंद्रों की मानें तो घरेलू हिंसा से संबंधित शिकायतों में करीब चालीस फीसद शिकायतें पुरुषों से संबंधित होती हैं यानी इनमें पुरुष घरेलू हिंसा का शिकार होते हैं और उत्पीड़न करने वाली महिलाएं होती हैं.

भारत में अभी तक ऐसा कोई सरकारी अध्ययन या सर्वेक्षण नहीं हुआ है जिससे इस बात का पता लग सके कि घरेलू हिंसा में शिकार पुरुषों की तादाद कितनी है लेकिन कुछ गैर सरकारी संस्थान इस दिशा में जरूर काम कर रहे हैं.

‘सेव इंडियन फैमिली फाउंडेशन‘ और ‘माई नेशन‘ नाम की गैर सरकारी संस्थाओं के एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि भारत में नब्बे फीसद से ज्यादा पति तीन साल की रिलेशनशिप में कम से कम एक बार घरेलू हिंसा का सामना कर चुके होते हैं.

इस रिपोर्ट में यह भी गया है पुरुषों ने जब इस तरह की शिकायतें पुलिस में या फिर किसी अन्य प्लेटफॉर्म पर करनी चाही तो लोगों ने इस पर विश्वास नहीं किया और शिकायत करने वाले पुरुषों को हंसी का पात्र बना दिया गया. 

लखनऊ में पीड़ित पुरुषों की समस्याओं पर काम करने वाली एक संस्था के संचालक देवेश कुमार बताते हैं कि लॉकडाउन के दौरान ऐसी समस्याओं के बारे में और ज्यादा जानकारी मिली है क्योंकि इस दौरान ज्यादातर पति-पत्नी साथ रहे हैं. देवेश कुमार बताते हैं, "

लोग कई तरह की समस्याएं लेकर आते हैं. मसलन, एक युवक इस बात से परेशान था कि उसकी पत्नी के किसी अन्य व्यक्ति से अवैध संबंध थे. मना करने के बावजूद संबंध जारी रहे. लॉकडाउन के दौरान ही उसे ये बातें पता चलीं. दोनों में विवाद हुआ और लड़की के घर वालों ने युवक को यह कहते हुए धमकाया कि यदि उसने कुछ करने की कोशिश की तो दहेज प्रताड़ना के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया जाएगा.” 

वहीं दिल्ली में एक परिवार परामर्श केंद्र की संचालिका रेहाना वसीम कहती हैं कि लॉकडाउन से लेकर अब तक बड़ी संख्या में पुरुषों ने घरेलू हिंसा की शिकायत की है. वो कहती हैं, "तमाम लोग हेल्पलाइन पर फोन करके, ईमेल के जरिए या फिर सोशल मीडिया के जरिए हर दिन शिकायतें करते हैं. एक दिन में दर्जनों शिकायतें आती हैं. घरेलू हिंसा के मामले में पुरुषों को सबसे ज्यादा दहेज कानून में फंसाने की धमकी दी जाती है.

पुरुष आयोग बनाने की मांग

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, देश में पुरुषों की आत्महत्या की दर महिलाओं की तुलना में दो गुने से भी ज्यादा है. इसके पीछे तमाम कारणों में पुरुषों का घरेलू हिंसा का शिकार होना भी बताया जाता है, जिसकी शिकायत वो किसी फोरम पर कर भी नहीं पाते हैं.

हालांकि ऐसा नहीं है कि पुरुषों के खिलाफ हिंसा की किसी को जानकारी नहीं है या फिर इसके खिलाफ आवाज नहीं उठती है लेकिन यह आवाज एक तो उठती ही बहुत धीमी है और उसके बाद खामोश भी बहुत जल्दी हो जाती है.

कुछ समय पहले यूपी में भारतीय जनता पार्टी के कुछ सांसदों ने यह मांग उठाई थी कि राष्ट्रीय महिला आयोग की तर्ज पर राष्ट्रीय पुरुष आयोग जैसी भी एक संवैधानिक संस्था बननी चाहिए. इन सांसदों ने इस बारे में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र भी लिखा था.

पत्र लिखने वाले एक सांसद हरिनारायण राजभर ने उस वक्त यह दावा किया था कि पत्नी प्रताड़ित कई पुरुष जेलों में बंद हैं, लेकिन कानून के एकतरफा रुख और समाज में हंसी के डर से वे खुद के ऊपर होने वाले घरेलू अत्याचारों के खिलाफ आवाज नहीं उठा रहे हैं.

पीड़ितों की मदद के लिए ऐप

पुरुष आयोग की मांग के समर्थन में जो तर्क दिए जाते हैं, उनमें सबसे बड़ा तर्क यह है कि महिलाओं को सुरक्षा देने के जो कानून बने हैं, उनके दुरुपयोग से पुरुषों को प्रताड़ित किया जाता रहा है. इन कानूनों में दहेज कानून यानी धारा 498-ए सबसे प्रमुख है.

सुप्रीम कोर्ट में वकील दिलीप कुमार दुबे कहते हैं, "अमेरिका के जिस कानून से प्रेरित होकर यह कानून बनाया गया, वह अमेरिकी कानून जेंडर निरपेक्ष है और उसमें पुरुषों की प्रताड़ना के मामले भी देखे जाते हैं. लेकिन हमारे यहां यह एकतरफा हो गया है. जबकि दहेज प्रताड़ना से संबंधित ज्यादातर मामले खुद अदालत की निगाह में गलत पाए गए हैं.”

करीब चार साल पहले घरेलू हिंसा या उत्पीड़न के शिकार पुरुषों की मदद के लिए एक स्वयंसेवी संस्था ने ‘सिफ' नाम का एक ऐप बनाया था जिसके जरिए ऐसे पुरुष अपनी पीड़ा दर्ज करा सकते थे. ऐसे पुरुषों को यह संस्था कानूनी मदद भी दिलाती थी.

संस्था के प्रमुख अमित कुमार कहते हैं कि इस ऐप के जरिए 25 राज्यों के 50 शहरों में 50 एनजीओ से कानूनी मदद के लिए संपर्क किया जा सकता है. उनका दावा है कि हेल्पलाइन जारी होने के 50 दिन के भीतर ही उन्हें 16,000 से ज्यादा फोन कॉल्स मिली थीं. अमित बताते हैं कि अब तक कई लोगों को कानूनी मदद दिलाई जा चुकी है और कई परिवारों की काउंसिलिंग कराकर उनकी समस्या को दूर किया गया है.





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