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रात में ड्राइविंग से डर लगना गंभीर बीमारी का संकेत

रात में वाहन चलाते समय घबराहट महसूस होना, सामने से आती तेज़ हेडलाइट्स से असहजता, या सड़क के किनारों को ठीक से न देख पाना—इन समस्याओं को अक्सर लोग थकान, उम्र बढ़ने या सामान्य नज़र की कमजोरी मानकर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। लेकिन डॉ. सिद्धार्थ सैन, सीनियर कंसल्टेंट, नेत्र रोग विशेषज्ञ के अनुसार, कई मामलों में यह ग्लूकोमा (काला मोतिया) का एक शुरुआती और अनदेखा संकेत हो सकता है। समय पर पहचान न होने पर यह बीमारी स्थायी दृष्टि हानि का कारण बन सकती है।

ग्लूकोमा क्या है?

ग्लूकोमा आँखों से जुड़ी एक गंभीर बीमारी है, जिसमें आँख की ऑप्टिक नर्व को धीरे-धीरे नुकसान पहुँचता है। यह नुकसान अक्सर आँखों के भीतर बढ़े हुए दबाव (इंट्राऑक्युलर प्रेशर) से जुड़ा होता है, हालांकि कुछ लोगों में सामान्य दबाव के बावजूद भी ग्लूकोमा विकसित हो सकता है। समस्या यह है कि शुरुआती चरणों में इसके लक्षण स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देते, इसलिए इसे “साइलेंट विज़न थीफ (Silent Vision Thief)” भी कहा जाता है।

रात में ड्राइविंग से डर क्यों लग सकता है?

विशेषज्ञ बताते हैं कि रात में ड्राइविंग के दौरान आँखों को कम रोशनी में तेज़ी से बदलते दृश्यों, सामने से आती तेज़ रोशनी और परिधीय (साइड) दृष्टि पर अधिक निर्भर रहना पड़ता है। ग्लूकोमा में सबसे पहले परिधीय दृष्टि प्रभावित होती है। इसके कारण:

सड़क के किनारे चल रहे पैदल यात्री या अचानक सामने आने वाले वाहन देर से दिखाई देते हैं

हेडलाइट्स की चकाचौंध से आँखों को समायोजित करने में अधिक समय लगता है

गहराई का आकलन (Depth Perception) कमजोर हो जाता है

अंधेरे से उजाले में आने-जाने पर दृष्टि की प्रतिक्रिया धीमी हो जाती है

इन सभी कारणों से व्यक्ति को असुरक्षा और डर महसूस हो सकता है, जिसके चलते वह रात में वाहन चलाने से बचने लगता है।


किन लोगों में जोखिम अधिक होता है?

कुछ लोगों में ग्लूकोमा होने की संभावना अधिक होती है, जैसे:

40 वर्ष से अधिक आयु के लोग

जिनके परिवार में ग्लूकोमा का इतिहास रहा हो

मधुमेह या उच्च रक्तचाप से पीड़ित व्यक्ति

लंबे समय तक स्टेरॉयड दवाओं का सेवन करने वाले लोग

मायोपिया (नज़दीक की नज़र की समस्या) या आँखों में चोट का इतिहास रखने वाले व्यक्ति

यदि इन जोखिम कारकों के साथ रात में ड्राइविंग को लेकर डर या परेशानी महसूस हो रही हो, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए।

अन्य लक्षण जिन्हें न करें नज़रअंदाज़

ग्लूकोमा से जुड़े कुछ अन्य संकेत भी हो सकते हैं, जैसे:

देखने के क्षेत्र में “सुरंग जैसा” एहसास

बार-बार सिरदर्द या आँखों में दबाव महसूस होना

धुंधली दृष्टि या रोशनी के चारों ओर रंगीन घेरों का दिखना

पढ़ते समय या स्क्रीन देखने पर आँखों का जल्दी थक जाना

समय पर जाँच क्यों ज़रूरी है?

ग्लूकोमा से हुआ दृष्टि नुकसान वापस नहीं आता, लेकिन समय पर जाँच और उपचार से इसकी प्रगति को रोका जा सकता है। नियमित आँखों की जाँच, विशेष रूप से आई प्रेशर मापन, ऑप्टिक नर्व का परीक्षण और विज़ुअल फील्ड टेस्ट के माध्यम से इस बीमारी का शुरुआती चरण में पता लगाया जा सकता है।

इलाज और प्रबंधन

ग्लूकोमा का इलाज मरीज की स्थिति और बीमारी की गंभीरता पर निर्भर करता है। इसमें शामिल हो सकते हैं:

आँखों के दबाव को नियंत्रित करने के लिए आई ड्रॉप्स

तरल के निकास को बेहतर बनाने के लिए लेज़र थेरेपी

गंभीर मामलों में सर्जरी

इलाज के साथ-साथ नियमित फॉलो-अप बेहद ज़रूरी होता है, क्योंकि ग्लूकोमा एक दीर्घकालिक बीमारी है।

क्या करें?

40 वर्ष की उम्र के बाद साल में कम से कम एक बार आँखों की जाँच कराएँ

यदि रात में ड्राइविंग से डर लगता है या दृश्य स्पष्ट नहीं दिखते, तो नेत्र रोग विशेषज्ञ से सलाह लें

डॉक्टर द्वारा बताई गई दवाएँ नियमित रूप से लें और बिना सलाह बंद न करें

स्वस्थ जीवनशैली अपनाएँ और ब्लड शुगर व ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखें

रात में ड्राइविंग से डर लगना केवल आदत या उम्र का प्रभाव नहीं हो सकता, बल्कि यह आँखों की एक गंभीर बीमारी का संकेत भी हो सकता है। ग्लूकोमा की समय रहते पहचान और उचित उपचार से दृष्टि को सुरक्षित रखा जा सकता है। याद रखें, आँखों की जाँच सिर्फ चश्मे का नंबर बदलने के लिए नहीं, बल्कि आपकी दृष्टि को बचाने के लिए भी बेहद ज़रूरी है।


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