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मासिक धर्म को मौलिक अधिकार की मान्यता, महिलाओं के स्वास्थ्य की दिशा में ऐतिहासिक कदम

भारत में महिलाओं की भागीदारी हर क्षेत्र में बढ़ रही है, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि महिलाओं के स्वास्थ्य की अनदेखी कर न तो समाज का भला हो सकता है और न ही देश का। मासिक धर्म एक स्वाभाविक जैविक प्रक्रिया है, इसके बावजूद आज भी यह सामाजिक वर्जनाओं से घिरा विषय बना हुआ है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का हालिया फैसला महिलाओं के स्वास्थ्य, गरिमा और अधिकारों की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम के रूप में देखा जा रहा है।

मासिक धर्म को मौलिक अधिकार की मान्यता

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मासिक धर्म स्वास्थ्य संविधान के तहत मौलिक अधिकार के दायरे में आता है। अनुच्छेद 21 के अंतर्गत महिलाओं को स्वास्थ्य और निजता का अधिकार प्राप्त है। अदालत ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया है कि सभी सरकारी और निजी स्कूलों में छात्राओं को निशुल्क बायोडिग्रेडेबल सैनेटरी नेपकिन उपलब्ध कराए जाएं और लड़कों व लड़कियों के लिए अलग-अलग शौचालयों की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।

महिलाओं के स्वास्थ्य पर सीधा असर

भारत में मासिक धर्म स्वच्छता आज भी एक जटिल चुनौती बनी हुई है। सामाजिक वर्जनाएं, आर्थिक सीमाएं और जागरूकता की कमी के कारण बड़ी संख्या में महिलाएं असुरक्षित विकल्पों का उपयोग करने को मजबूर होती हैं। इसका सीधा असर उनके स्वास्थ्य पर पड़ता है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, भारत में हर साल लगभग 60 हजार महिलाओं की मौत गर्भाशय ग्रीवा कैंसर से होती है, जिनमें से करीब दो-तिहाई मामलों का संबंध अपर्याप्त मासिक धर्म स्वच्छता से जोड़ा जाता है।

शिक्षा और आजीविका पर प्रभाव

मासिक धर्म स्वच्छता की कमी महिलाओं के सामाजिक और आर्थिक जीवन को भी प्रभावित करती है। कई किशोरियां और महिलाएं मासिक धर्म के दौरान स्कूल या कार्यस्थल से अनुपस्थित रहती हैं, जिससे उनकी शिक्षा और करियर पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इसके साथ ही सैनेटरी उत्पादों की अधिक लागत भी कई परिवारों के लिए एक अतिरिक्त बोझ बन जाती है।

सरकारी प्रयास और चुनौतियां

सरकार ने बीते वर्षों में मासिक धर्म स्वच्छता को बढ़ावा देने के लिए कई पहल की हैं। सैनेटरी नेपकिन पर जीएसटी में कमी, स्कूलों में नि:शुल्क वितरण और जागरूकता कार्यक्रम इसी दिशा में उठाए गए कदम हैं। हालांकि, जमीनी स्तर पर इन योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन और व्यापक पहुंच को लेकर अभी भी कई चुनौतियां बनी हुई हैं।

समाज की साझा जिम्मेदारी

मासिक धर्म स्वच्छता केवल सरकारी नीतियों का विषय नहीं है, बल्कि इसमें समाज की भी अहम भूमिका है। मासिक धर्म को वर्जित मानने की मानसिकता से बाहर निकलना होगा और महिलाओं को इस विषय पर खुलकर बात करने के लिए प्रोत्साहित करना होगा। जब तक सामाजिक और आर्थिक बाधाएं दूर नहीं होंगी, तब तक इस दिशा में स्थायी बदलाव संभव नहीं है।

मासिक धर्म एक स्वाभाविक प्रक्रिया

मासिक धर्म एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, लेकिन इसे एक मौलिक अधिकार के रूप में व्यवहार में लाना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला निश्चित रूप से एक मजबूत आधार प्रदान करता है, लेकिन एक स्वस्थ और समान भविष्य के लिए सरकार, निजी क्षेत्र और समाज-सभी को मिलकर निरंतर प्रयास करने होंगे। तभी महिलाएं सुरक्षित, स्वस्थ और आत्मनिर्भर होकर अपने सपनों को साकार कर सकेंगी।


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