अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस विशेष : घर का काम' करना बंद कर दें महिलाएं तो क्या होगा ? दुनिया भर में महिलाओं के आंदोलन में हुई वृद्धि, अर्थव्यवस्था में महिलाओं का योगदान?
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का आयोजन एक श्रम आंदोलन था, जिसे संयुक्त राष्ट्र ने सालाना आयोजन के तौर पर स्वीकृति दी. इस आयोजन की शुरुआत का बीज 1908 में तब पड़ा, जब न्यूयॉर्क शहर में 15 हज़ार महिलाओं ने काम के घंटे कम करने, बेहतर वेतन और वोट देने की माँग के साथ विरोध प्रदर्शन निकाला था.इसके एक साल बाद अमेरिकी सोशलिस्ट पार्टी ने पहली बार राष्ट्रीय महिला दिवस मनाने की शुरुआत की. लेकिन इस दिन को अंतरराष्ट्रीय बनाने का विचार क्लारा जेटकिन नाम की महिला के दिमाग़ में आया था. उन्होंने अपना ये आइडिया 1910 में कॉपेनहेगन में आयोजित इंटरनेशनल कांफ्रेंस ऑफ़ वर्किंग वीमेन में दिया था.
हालांकि, आधिकारिक तौर पर इसे मनाने की शुरुआत 1975 में तब हुई जब संयुक्त राष्ट्र ने इस आयोजन को मनाना शुरू किया. संयुक्त राष्ट्र ने 1996 में पहली बार इसके आयोजन में एक थीम को अपनाया, वह थीम थी - 'अतीत का जश्न मनाओ, भविष्य की योजना बनाओ.'महिलाएं समाज में, राजनीति में और अर्थशास्त्र में कहाँ तक पहुँची हैं, इसके जश्न के तौर पर इंटरनेशनल वीमेंस डे का आयोजन होता है, लेकिन इस आयोजन के केंद्र में प्रदर्शन की अहमियत रही है, लिहाज़ा महिलाओं के साथ होने वाली असमानताओं को लेकर ज़ागरूकता बढ़ाने के लिए विरोध प्रदर्शन का आयोजन भी होता है.
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस कैंपेन के मुताबिक़, "बैंगनी रंग न्याय और गरिमा का सूचक है. हरा रंग उम्मीद का रंग है. सफ़ेद रंग को शुद्धता का सूचक माना गया है. ये तीनों रंग 1908 में ब्रिटेन की वीमेंस सोशल एंड पॉलिटिकल यूनियन (डब्ल्यूएसपीयू) ने तय किए थे." इस साल अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की थीम है - #ChooseToChallenge.यह थीम इस विचार से चुना गया है कि बदलती हुई दुनिया एक चुनौतीपूर्ण दुनिया है और व्यक्तिगत तौर पर हम सब अपने विचार और कार्य के लिए ज़िम्मेदार हैं.
अभियान में कहा गया है कि "हम सब लैंगिक भेदभाव और असमानता को चुनौती दे सकते हैं. हम सब महिलाओं की उपलब्धियों का जश्न मना सकते हैं. सामूहिक रूप से, हम सब एक समावेशी दुनिया बनाने में योगदान दे सकते हैं."कुछ लोगों का मानना है कि महिला घर के काम के बदले में मुआवज़े के रूप में कुछ भी लेने की हक़दार नहीं हैं. वहीं, कुछ लोगों का मानना है कि जब महिला अपने करियर से जुड़े अवसरों को त्याग कर हर रोज़ घंटों घरेलू काम करती हैं तो उन्हें मुआवजा क्यों नहीं मिलना चाहिए. चीन की एक अदालत ने हाल ही में तलाक़ से जुड़े एक मामले में ऐतिहासिक फ़ैसला दिया है. कोर्ट ने एक व्यक्ति को निर्देश दिया है कि वह पाँच साल तक चली शादी के दौरान पत्नी द्वारा किए गए घरेलू काम के बदले में उसे मुआवजा दे. इस मामले में महिला को 5.65 लाख रुपये दिए जाएंगे.
भारत की सर्वोच्च अदालत ने अपने फ़ैसले में लिखा था कि "घर का काम परिवार की आर्थिक स्थिति में वास्तविक रूप से योगदान करता है और राष्ट्र की अर्थव्यवस्था में योगदान करता है." लेकिन इसके बावजूद 'घर के काम' को जीडीपी में योगदान के रूप में नहीं देखा जाता है. यही नहीं, समाज घर के काम को वह अहमियत नहीं देता है जितनी नौकरी या व्यवसाय में किए गए काम को देता है.ऐसे में सवाल उठता है कि अगर महिलाएं 'घर के काम' छोड़कर नौकरी या व्यवसाय शुरू कर दें तो क्या होगा.
दुनिया की अधिकांश महिलाएं इस सवाल से जूझती हैं कि समाज एक गृहिणी के रूप में उनके द्वारा किए गए 'घर के काम' को वो सम्मान क्यों नहीं दिया जाता जो पुरुषों द्वारा किए गए काम को दिया जाता है.
जबकि एक गृहिणी के रूप में महिलाओं के काम के घंटे पुरुषों के किए गए काम के घंटों की तुलना में कहीं अधिक होते हैं.
सालों तक पत्रकारिता के साथ-साथ घरेलू काम से जुड़ी ज़िम्मेदारियां उठाने वाली कृतिका खुद इस सवाल से जूझ रही हैं.
वे कहती हैं, "मुझे कभी समझ नहीं आया कि लोग घर के काम को अहमियत क्यों नहीं देते? ऐसे माना जाता है कि घर का काम मतलब कोई काम ही नहीं. जबकि घर के काम आसान नहीं होते. घर पर अगर किसी को तय समय पर दवा देनी है, तो वो काम करना है, खाना तय समय पर बनना है, तो बनना है. इसमें किसी तरह की राहत नहीं मिलती."
आँकड़ों को देखें तो पता चलता है कि भारत में घर के काम में महिलाएं पुरुषों की तुलना में काफ़ी ज़्यादा काम करती हैं.
सर्वे के मुताबिक़, महिलाएं हर दिन घर के काम (अवैतनिक घरेलू कार्य) में 299 मिनट लगाती हैं. वहीं, भारतीय पुरुष दिन में सिर्फ 97 मिनट घर के काम में लगाते हैं.
यही नहीं, इस सर्वे में ये भी सामने आया है कि महिलाएं घर के सदस्यों का ख़याल रखने में रोज़ 134 मिनट लगाती हैं. वहीं, पुरुष इस काम में सिर्फ 76 मिनट ख़र्च करते हैं.
अंतरराष्ट्रीय संस्था ओक्सफेम के एक अध्यन के मुताबिक़, महिलाओं द्वारा किए गए 'घर के काम' का मूल्य भारतीय अर्थव्यवस्था का 3.1 फीसदी है.
साल 2019 में महिलाओं द्वारा किए गए 'घर के काम' की क़ामत से भी ज़्यादा थी. ये फॉर्च्यून दस ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर ग्लोबल 500 लिस्ट की पचास सबसे बड़ी कंपनियों जैसे वॉलमार्ट, ऐप्पल और अमेज़न आदि की कुल आमदनी से भी ज्यादा थी.इसके बाद भी भारतीय अदालतों को बार-बार गृहणियों के काम को आर्थिक मायने देने के लिए फ़ैसले देने पड़ते हैं.हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा है, "एक गृहिणी की आमदनी को निर्धारित करने का मुद्दा काफ़ी अहम है. यह उन तमाम महिलाओं के काम को मान्यता देता है, जो चाहे विकल्प के रूप में या सामाजिक/सांस्कृतिक मानदंडों के परिणामस्वरूप इस गतिविधि में लगी हुई हैं. यह बड़े पैमाने पर समाज को संकेत देता कि क़ानून और न्यायालय गृहणियों की मेहनत, सेवाओं और बलिदानों के मूल्य में विश्वास करता है."