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बहादुर कलारिन बाई - कलार समाज का पौराणिक इतिहास (छत्तीसगढ़)

बहादुर कलारिन बाई जी का नाम एक देवी की तरह लिया जाता है वे पुरे छत्तीसगढ़ के साथ कलार समाज के पौराणिक इतिहास का हिस्सा तो है ही साथ ही छत्तीसगढ़ के इतिहास में भी उनका नाम बड़े बड़े अक्षरों में अंकित है।

बहादुर कलारिन बाई जी के प्रचलित किस्से लोक कथाओ में सुनने मिलते है और छत्तीसगढ़ राज्य के बालोद जिले से 26 किलोमीटर दूर चिरचारी  गाँव में उनकी स्मारक वा मन्दिर स्थित है जो की छत्तीसगढ़ राज्य द्वारा संरक्षित है,
 
छत्तीसगढ़ में कलचुरी शासन ख़त्म हो रही थी , कई गाँव के लोग अपने रहने खाने के व्यवस्था के साथ अपनी जगह बदलने में मजबूर थे , उन्ही में से एक थे गौटिया सुबेलाल कलार जिनकी मदिरा की दुकान थी हालाँकि राजाओ के शेष काल अब भी बचे हुए थे , सुबेलाल गौटिया की बनाई शराब दूर दूर से लोग लेने व पीने आते थे ,
सुबेलाल की छोटे भाई के बेटी कलावती ही उनके पास मात्र परिवार के नाम पर थी और कलावती के पास चाचा सुबेलाल को छोड़ कोई नहीं था ,

सुबेलाल के साथ मदिरा दुकान में कलावती सहयोग करते हुए बड़ी हुई यौवन ने कदम रखा तो कलावती पर कई मनचलो की नजरे रहती ,

कलावती इनसे दो हाथ करने में नहीं घबराती थी , जवाब देना अपनी आबरू के समक्ष अड़े रहना तो जैसे बखूबी आता था इन्हे , सुबेलाल ने कलावती को खेल-खिलौनों से दूर रखते हुए लाठी; कटार और तलवार चलाना सिखाने लगा.कलावती को सुबेलाल सौन्दर्य के आलावा वह शौर्य कला में भी पारंगत करना चाहता था;  आँखे मृगनयनी के सामान थे; क्रोध में चेहरा चंडी के सामान हो जाता था. एक झलक पाने के लिए कई राजा और राजकुमार वेश बदलकर शराब खरीदने सुबेलाल की दुकान में आते थे; लेकिन कलावती के स्वाभिमान व्यवहार से वापस लौट जाते थे . 

सुबेलाल की मृत्यु के बाद मदिरा की दुकान चलाती कलावती को बहुत सारे राजाओ के प्रेम प्रस्ताव आये ,व कुछ समय बाद वे एक राजा के अथाह प्रेम में पड़ गयी जिनसे उन्हें एक पुत्र भी हुआ , राजा ने कलावती से छल किये व कलावती को अकेला छोड़ गया।


जीवन के इस स्थिति में अब कलावती अपने पुत्र के साथ जीवन निर्वाह करने लगी ,पर कलावती के बेटे को छल की बात खटकने लगी वह इसी खटास के साथ बड़ा होने लगा ,
खटास कब परिवर्तित हुई किसी को खबर तक नहीं हुई ,कलावती के बेटे ने राजाओ के बेटियों से शादी करके उन्हें छोड़ देता , उसने कई राजाओ की बेटियों के साथ शादी करके बदले के भाव में उन्हें छोड़ देता। ..

कलावती को जब इस बात का पता चला उन्होंने अपने बेटे को मारने की योजना बनाई क्यूंकि उनके बेटे की इस आदत से कई और महिलाओं के सम्मान को ठेस पहुँचती थी ,

सभी तरफ अपने ही बेटे को पानी ना देने का आदेश दिया , पानी ना मिलने पर अधमरे हालत में जब वह कुंवे के पास पंहुचा तो कलावती जी ने उसे धकेल कर खुद भी कुंवे में कूद गयी ,

आज कलावती को बहादुर कलारिन के नाम से जानते है , कलावती वो स्त्री थी जिन्होंने पूरी जिंदगी संघर्ष में निकले सौंदर्य ,पारंगत होने के बाद भी उनके जीवन में प्रेम ने छल के साथ प्रवेश लिए ,जिसका सबसे ज्यादा असर उनके बेटे पर हुवा , अंत में उन्होंने अपनी जिंदगी अपने बेटे के साथ खत्म कर ली।

 छत्तीसगढ़ के बालोद जिले से 26 किलोमीटर दूर चिरचारी  गाँव में उनकी स्मारक वा मन्दिरमें आज भी उनकी पूजा की जाती है , सिर्फ कलार समाज में नहीं बल्कि पूरी अलग जातियों में भी कलारिन बाई सम्मानित की जाती है।


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