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बसना : शीत ब्लास्ट थमने के बाद अब भूरा माहू का कहर, किसानों पर तिहरी मार

खाद की किल्लत और कीट प्रकोप से धान की फसल संकट में, बसना अंचल के किसानों की हालत बद से बदतर

सी डी बघेल। बसना

धान की फसल इस बार किसानों के लिए बड़ी मुसीबत बन गई है। खरीफ सीजन की शुरुआत में हुई भारी वर्षा और उसके बाद लंबे समय तक पड़े सूखे ने फसल की बढ़वार पर विपरीत असर डाला। एक ओर शुरुआती बारिश से खेतों में पानी भर गया, वहीं बाद के सूखे और तेज धूप ने पौधों को मुरझा दिया।

स्थिति तब और बिगड़ गई जब सहकारी समितियों में डीएपी और यूरिया खाद की भारी किल्लत ने किसानों की कमर तोड़ दी। मजबूरी में किसानों को बाजार से महंगे दामों पर खाद खरीदनी पड़ी, जिससे खेती की लागत कई गुना बढ़ गई। जैसे-तैसे जब हल्की बारिश से फसल में थोड़ी जान आई, तब शीत ब्लास्ट ने फसल को बुरी तरह झुलसा दिया। चार पांच दवा छिड़काव के बाद शीत ब्लास्ट का रोकथाम हुआ। अब मौसम के फिर से गर्म और उमस भरा होने पर भूरा माहू कीट का प्रकोप तेजी से फैल गया है। यह कीट पौधों का रस चूसकर उन्हें कमजोर कर देता है, जिससे बालियाँ सूख रही हैं और उत्पादन में भारी गिरावट आ रही है। किसानों का कहना है कि लगातार दवा छिड़काव करने के बावजूद नियंत्रण नहीं हो पा रहा।

बसना अंचल के बोरवेल सिंचित गांवों भूकेल, गौरटेक, सिंघनपुर, पौसरा, सेमलिया, मोहका, बरपेलडीह, बड़े-छोटे टेमरी, पीपलखूटा, बसना, छांदनपुर और टेमडा — में किसानों ने एक-दो बार कीटनाशक दवा का छिड़काव किया है। वहीं कम सिंचित क्षेत्रों जैसे तोषगांव, मनकी, पिलवापाली, भालूपतेरा, चिमरकेल और रसोड़ा में किसानों को तीन बार तक दवा डालनी पड़ी, फिर भी राहत नहीं मिली। नवभारत के बड़ेसाजापाली के सहायक संवाददाता जयप्रकाश निर्मलकर को बड़ेसाजापाली क्षेत्र के किसानों ने बताया कि पहले उन्हें उम्मीद थी कि फसल किसी तरह संभल जाएगी, लेकिन अब पौधे सूखने लगे हैं और कई खेतों में बालियाँ खाली रह गई हैं। बढ़ती लागत, महंगे खाद और लगातार दवा छिड़कने से खर्च बहुत बढ़ गया है, जबकि उत्पादन आधे से भी कम रह गया है। वरिष्ठ कृषक रामनिधि पटेल (ग्राम बनीपाली) ने बताया कि किसान आज भी खेती के हर चरण में संघर्ष कर रहा है। कभी बीज और खाद की कमी, तो कभी बारिश और बिजली की समस्या। कड़ी मेहनत और कर्ज के बावजूद किसान को उचित मूल्य नहीं मिलता। उन्होंने कहा पढ़ाई करते समय किताब में लिखा था कि “भारत का किसान कर्ज में जन्म लेता है और कर्ज में ही मर जाता है। यह अब कहावत नहीं, सच्चाई बन चुकी है। किसानों ने शासन से फसल बीमा सर्वे कराकर उचित मुआवजा देने तथा स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू कर खेती की लागत का डेढ़ गुना समर्थन मूल्य सुनिश्चित करने की मांग की है। कुल मिलाकर, इस वर्ष बसना अंचल के किसानों पर शीत ब्लास्ट, भूरा माहू और खाद संकट की तिहरी मार पड़ी है। यदि शासन और कृषि विभाग ने समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए, तो किसानों की मेहनत, पूंजी और उम्मीद — तीनों पर पानी फिर जाएगा।

एक सप्ताह में लाखों भूरा माहू का प्रजनन, धान की फसल हो जाती है चौपट

प्रगतिशील कृषक एवं किसान जनजागरण के उपाध्यक्ष सुशील भोई ने बताया कि इस वर्ष खरीफ सीजन में कीट और बीमारियों के लिए मौसम पूरी तरह अनुकूल रहा है। उमस, गर्मी और बारिश की कमी ने धान की फसल को कमजोर कर दिया, जिससे कीटों का प्रकोप तेजी से बढ़ा है।

उन्होंने बताया कि इस वर्ष धान की फसल में 40 से 60 दिनों की अवधि पर शीत ब्लास्ट ने व्यापक नुकसान पहुंचाया। कुछ किसानों ने तो तीन से चार बार तक दवा छिड़काव कर बीमारी पर नियंत्रण पाने की कोशिश की, लेकिन फसल की जड़ों और पत्तियों पर असर रह गया। ऐसे खेतों में जब बालियाँ निकलनी शुरू हुईं, तो उन पर स्वाभाविक रूप से फाल्स स्मट (बदरा) एवं भूरा माहू (कीट) का हमला शुरू हो गया। भूरा माहू का प्रजनन तंत्र बेहद तेज़ी से होता है। एक अकेला कीट तीन दिन में परिपक्व होकर पाँचवें दिन लगभग एक लाख अंडे देती है। यदि किसी एक बाली में मात्र पाँच भूरा माहू मौजूद हों, तो एक सप्ताह के भीतर उनका प्रजनन लाखों में पहुँच जाता है। यही कारण है कि सिर्फ सात दिनों में पूरा खेत कीटों से भर जाता है और फसल का रस चूसकर पौधों को सुखा देता है। भोई ने कहा कि यदि किसान समय रहते इन कीटों पर ध्यान नहीं दें, तो एक सप्ताह में ही फसल पूरी तरह से चौपट हो जाती है। बाद में दवा छिड़काव करने पर भी कीट पूरी तरह समाप्त नहीं होते, क्योंकि वे बाली के भीतर गहराई तक पहुँच जाते हैं। बसना और सरायपाली अंचल में धान की बोआई लाई चोपि (लइहारा) पद्धति से होती है जिसमें पौधे घने होते हैं और ऐसे खेत तूफानी बारिश के चलते धान के पौधे झुककर गिर जाते हैं जिनपर माहू लगने पर दवा छिड़काव किसानों के लिए चुनौतीपूर्ण कार्य होता है क्योंकि दवा पौधों के तने तक नहीं पहुंच पाता जहां माहू कीट छिपकर बैठते हैं।

आगे उन्होंने किसानों को सलाह दी कि धान की फसल में भूरा माहू के शुरुआती लक्षण प्रतिदिन खेतों का निरीक्षण करते रहें जैसे— मिट्टी में अम्लीय गंध ,पत्तियों का पीला पड़ना, बालियों का झुकना और पौधों का सूखना — दिखते ही तुरंत प्रभावी कीटनाशक का छिड़काव करें, ताकि नुकसान को रोका जा सके।


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