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बसना : कभी गलियों में गूंजते थे कार्तिक पुराण के गीत, अब बदलती जीवनशैली ने फीका कर दिया धार्मिक उत्साह

सी डी बघेल. कभी कार्तिक माह का आगमन होते ही गाँवों की सुबह भक्ति और श्रद्धा से सराबोर हो जाया करती थी। तालाबों की सीढ़ियों पर बच्चों की चहल-पहल, महिलाओं की आरती की ध्वनि और पुजारियों के स्वर में गूंजते कार्तिक पुराण के गीत—ये दृश्य गाँव के धार्मिक जीवन की पहचान हुआ करते थे। लेकिन अब यह परंपरा धीरे-धीरे अतीत की स्मृतियों में सिमटती जा रही है। आधुनिक जीवनशैली, समयाभाव और बदलती पीढ़ी की प्राथमिकताओं ने इस पवित्र परंपरा को लगभग विलुप्त कर दिया है।

एक समय था जब ब्रह्म मुहूर्त (सुबह 4 बजे) ग्रामीणजन तालाबों की ओर निकल पड़ते थे। बच्चे, महिलाएँ और बुजुर्ग सभी मिलकर स्नान कर शिव मंदिर एवं शिव चबूतरा के शिवलिंग में जलाभिषेक करते, अरवा चावल, धतूरा और बेल पत्र चढ़ाकर भगवान शिव से आशीर्वाद मांगते थे। इसके बाद तालाब का पवित्र जल घर लाकर तुलसी के पौधे में अर्पित किया जाता और घर के आंगन में पूजा-पाठ संपन्न होता। संध्या होते ही गाँव के चौपालों और गलियों में धार्मिक वातावरण बन जाता था। पुजारी, पंडित या कोई ज्ञानी व्यक्ति वेद-पुराण के श्लोकों का गान करते, फिर उनके अर्थ समझाते। ग्रामीण श्रद्धा से उसे सुनते और धर्म, संस्कृति व नैतिकता से जुड़ी शिक्षाएँ आत्मसात करते। 

लेकिन अब वही कार्तिक माह का आध्यात्मिक उल्लास केवल बुजुर्गों की यादों में रह गया है। वरिष्ठ नागरिक बताते हैं कि आज के दौर में लोग हर त्योहार को आधुनिकता के रंग में मना रहे हैं, लेकिन कार्तिक माह का पारंपरिक स्वरूप फीका पड़ गया है। पहले जहाँ पूरा महीना भक्ति, संयम और सेवा की भावना से भरा रहता था, अब केवल कुछ परिवार ही इस परंपरा को निभा पा रहे हैं। स्थानीय बुजुर्गों का कहना है कि “कार्तिक माह केवल धार्मिक नहीं, बल्कि आत्मिक शुद्धि का महीना है। यह हमें संयम, सेवा और श्रद्धा का भाव सिखाता है। 

लेकिन बदलते समय और सुविधाओं की दौड़ में नई पीढ़ी इन परंपराओं से दूर होती जा रही है। उन्होंने युवाओं से अपील की है कि वे घर के नल में नहाने की बजाय तालाबों या नदियों में कार्तिक स्नान करें, तुलसी पूजन और पुराण वाचन जैसी परंपराओं को जीवित रखें, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ भी भारतीय संस्कृति की इस पवित्र धरोहर से जुड़ी रहें। आज जरूरत है कि आधुनिकता के साथ हम अपनी जड़ों को भी संभालें, क्योंकि परंपरा ही वह धागा है, जो समाज को संस्कृति से जोड़े रखता है।

गौरटेक में आज भी जीवित है परंपरा

जहाँ अधिकांश गाँवों में कार्तिक पुराण वाचन की परंपरा विलुप्त हो चुकी है, वहीं ग्राम गौरटेक आज भी इस प्राचीन परंपरा को जीवित रखे हुए है। ग्रामवासियों के अनुसार, जब सन् 1955-56 में राम जानकी मंदिर की प्राण-प्रतिष्ठा हुई थी, तभी से यह परंपरा निरंतर चली आ रही है। मंदिर के ऊपरी तल में भगवान राम-जानकी की मूर्तियाँ स्थापित हैं, जबकि निचला तल कार्तिक माह के आयोजनों के लिए आरक्षित रहता है। कार्तिक माह प्रारंभ होने से पहले ही गाँव की महिलाएँ सजावट और तैयारी में जुट जाती हैं।

जैसे ही कार्तिक कृष्ण पक्ष शुरू होता है, प्रतिदिन शाम 7 बजे महिलाएँ मंदिर में एकत्रित होती हैं, जहाँ मंदिर के पुजारी कमलचंद त्रिपाठी उन्हें कार्तिक पुराण के गीत सुनाते हैं और उनके अर्थ समझाकर जीवन में भक्ति और धर्म के महत्व को बताते हैं। इसके साथ ही प्रत्येक सुबह कीर्तन-भजन मंडली द्वारा वाद्य यंत्रों के साथ भक्तिमय प्रभात फेरी निकाली जाती है, जो पूरे गाँव में आध्यात्मिक माहौल बना देती है। ग्राम गौरटेक की यह परंपरा न केवल धर्म की पहचान है, बल्कि ग्रामीण संस्कृति और आस्था का सजीव उदाहरण भी है।


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