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सरायपाली : विद्यालय प्रांगण सिरबोड़ा एवं सिरशोभा में रंगोत्सव होली: संस्कार, नैतिकता और आध्यात्मिक चेतना का अद्भुत संगम

भारत भूमि अपनी सनातन सांस्कृतिक परंपराओं, आध्यात्मिक चेतना और उत्सवमय जीवन दृष्टि के कारण विश्व में विशिष्ट स्थान रखती है। यहां के त्योहार केवल उल्लास और मनोरंजन के अवसर नहीं होते, अपितु वे जीवन को संस्कारित करने वाले दिव्य संस्कारों की अनुपम धरोहर भी होते हैं। विशेषतः होली का पर्व भारतीय संस्कृति में प्रेम, समरसता, सदाचार और आध्यात्मिक जागृति का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि जब इस पर्व को विद्यालय जैसे ज्ञान-आलय में मनाया जाता है, तो यह केवल एक उत्सव न रहकर बालकों के चरित्र-निर्माण और नैतिक विकास का सशक्त माध्यम बन जाता है।

इसी पावन भावना के साथ विद्यालय प्रांगण सिरबोड़ा एवं सिरशोभा में होली का रंगोत्सव अत्यंत हर्षोल्लास, भक्ति और सांस्कृतिक गरिमा के साथ मनाया गया। सम्पूर्ण वातावरण सतरंगी उल्लास, मधुर संगीत और बालकों की निष्कलुष मुस्कान से आलोकित हो उठा। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो ज्ञान, प्रेम और भक्ति के रंग एक साथ मिलकर विद्यालय परिसर को आध्यात्मिक आभा से मंडित कर रहे हों।

इस पावन अवसर पर विद्यालय एवं विद्यार्थियों के प्रति सदा स्नेह और आशीर्वाद बनाए रखने वाले सेवानिवृत्त शिक्षक परम आदरणीय नलसाय सिदार महोदय जी की गरिमामयी उपस्थिति ने कार्यक्रम की शोभा को और भी दिव्यता प्रदान की। उनका स्नेहिल सान्निध्य विद्यार्थियों के लिए प्रेरणास्रोत सिद्ध हुआ, मानो गुरु परंपरा की अमर ज्योति आज भी सतत प्रज्वलित हो।

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता के रूप में प्रधान पाठक प्राथमिक धर्मेन्द्रनाथ राणा एवं दुर्वादल राम दीप ने अत्यंत ओजस्वी और आध्यात्मिक शैली में होली के पौराणिक एवं ऐतिहासिक महत्व का विस्तृत विवेचन प्रस्तुत किया। उन्होंने भक्त प्रह्लाद और होलिका की कथा के माध्यम से यह संदेश दिया कि सत्य, भक्ति और धर्म की सदैव विजय होती है, जबकि अहंकार, अत्याचार और अधर्म का अंत निश्चित है। उनके उद्बोधन में यह भाव स्पष्ट झलक रहा था कि होली का वास्तविक अर्थ केवल रंगों का खेल नहीं, बल्कि अपने अंतःकरण को द्वेष, ईर्ष्या और नकारात्मक प्रवृत्तियों से शुद्ध करना है।

उन्होंने विद्यार्थियों को सावधानियों के विषय में भी सरल और सहज शब्दों में अवगत कराया कि प्राकृतिक रंगों का उपयोग करें, जल की अनावश्यक बर्बादी न करें, किसी को जबरदस्ती रंग न लगाएं और सदैव अनुशासन तथा मर्यादा का पालन करें। उनके शब्दों में आध्यात्मिक संदेश निहित था कि जैसे होलिका दहन में बुराइयों का दहन होता है, वैसे ही हमें अपने जीवन की नकारात्मक वृत्तियों को भी त्याग देना चाहिए।

इसके पश्चात् शिक्षकगण – संस्था प्रमुख हीरालाल साहू, अनीता साहू, क्षीरोद्र चौधरी, महेश साहू एवं सहायक शिक्षक राजकुमार भोई ने क्रमशः होली पर्व के विभिन्न आयामों पर प्रकाश डाला। किसी ने इस पर्व के सामाजिक महत्व को रेखांकित करते हुए बताया कि होली सभी भेदभाव मिटाकर समरसता और भाईचारे का संदेश देती है, तो किसी ने इसके वैज्ञानिक और पर्यावरणीय पक्ष पर प्रकाश डालते हुए बच्चों को स्वच्छ और सुरक्षित होली मनाने की प्रेरणा दी। उनके सारगर्भित विचारों ने विद्यार्थियों के मन में सांस्कृतिक चेतना और नैतिक मूल्यों का बीजारोपण किया।

विशेष आकर्षण के रूप में विद्यालय में फूलों की होली का आयोजन किया गया, जिसमें विद्यार्थियों ने पलास और विभिन्न पुष्पों से एक-दूसरे को शुभकामनाएँ देते हुए प्रेम और सद्भाव का अद्भुत दृश्य प्रस्तुत किया। यह दृश्य मानो इस सत्य का साक्षात् उदाहरण था कि जब बालमन संस्कारों के रंगों से रंग जाता है, तब समाज में सौहार्द और शांति की सुगंध स्वतः फैलने लगती है।

कार्यक्रम के अंत में आदरणीय सेवानिवृत्त शिक्षक श्री नलसाय सिदार जी ने अपने आशीर्वचन में कहा कि ऐसे सांस्कृतिक और आध्यात्मिक आयोजन विद्यार्थियों के व्यक्तित्व निर्माण में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने बच्चों को सदैव सत्य, अनुशासन और संस्कारों के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी तथा शिक्षकों के इस प्रयास की सराहना की।

इस प्रकार विद्यालय प्रांगण सिरबोड़ा में मनाया गया होली उत्सव केवल एक पर्व न रहकर संस्कार, नैतिकता और आध्यात्मिक चेतना का अद्वितीय संगम बन गया। यह आयोजन विद्यार्थियों के हृदय में भारतीय संस्कृति के प्रति श्रद्धा, सदाचार के प्रति निष्ठा और समाज के प्रति जिम्मेदारी का भाव जागृत करने में सफल सिद्ध हुआ। वास्तव में, ऐसे कार्यक्रम ही बालकों के जीवन में सच्चे अर्थों में संस्कारों की नींव रखते हैं और उन्हें एक आदर्श नागरिक बनने की दिशा में अग्रसर करते हैं।


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